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साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार चन्दन ओ बाल साहित्य पुरस्कार अमलेंदु कें

साहित्य अकादेमी दिस सं प्रतिवर्ष देल जाएबला पुरस्कार मे सं दूटाक घोषणा आइ गोहाटी में भेल अछि. कविता संग्रह 'धरती सं अकास धरि' लेल युवा पुरस्कार चन्दन कुमार झा कें त' उपन्यास 'लालगाछी' लेल बाल साहित्य पुरस्कार अमलेन्दु शेखर पाठक कें देल जएतनि.

अकादेमी दिस सं मैथिली सहित मान्यताप्राप्त 24 भाषा मे उक्त पुरस्कारक घोषणा कएल गेल अछि. जूरी द्वारा अंतिम रूप सं चयन केलाक बाद अकादेमी अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी आइ दुपहरिया मे पुरस्कारक घोषणा केलनि.

बाल साहित्य पुरस्कार लेल जूरी मे इन्द्रकांत झा, प्रभास कुमार झा आ शशिनाथ झा आ साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार लेल जूरी मे वैद्यनाथ चौधरी, मन्त्रेश्वर झा आ डॉ योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' छलाह. दुनू गोटे कें पुरस्कार स्वरूप ताम्रफलक आ पचास हज़ार टका साहित्य अकादमीक एक समारोह मे 14 नवंबर कें देल जाएत.

मिथिमीडिया — MithiMedia 22 June 2017
कखन हरब दुःख मोर with The Pravesh Mallick effect

विद्यापतिक अमर कृति 'कखन हरब दुःख मोर' नव रूप, नव संगीतक संग आएल अछि. मैथिली फिल्म 'मुखियाजी' फेम संगीतकार प्रवेश मल्लिक अपन स्वर ओ संयोजन मे एहि गीत कें प्रस्तुत केलनि अछि.



बॉलीवुड फिल्म 'जय गंगाजल' मे संगीत द' चर्चित भेल संगीतक ई धुरंधर मैथिली संगीत मे सेहो नूतन प्रयोग ओ सरल-सहज प्रस्तुति लेल चिन्हल जाइत छथि. हिनक मैथिली म्यूजिक वीडियो 'नमरी लुच्चा' सेहो खूब पसिन कएल गेल छल.

सोशल मीडिया पर विद्यापतिक लिखल ई गीत प्रवेशक स्वर मे लोकक धियान आकर्षित क' रहल अछि. हिनका मिथिलाक 'ए. आर. रहमान' कहल जाइत अछि.

फिल्म निर्देशक विकास झाक वीडियो ओ विक्रम-निकितेश केर गिटार सहयोग सं ई म्यूजिक वीडियो बहुत नीक बनल अछि.

वीडियो देखी, सुनी. लाइक-शेयर करी आ मैथिली संगीत मे नूतन विहानक स्वागत मे संग आबी. जय मैथिली!

मिथिमीडिया — MithiMedia 23 May 2017
SOIMELA मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केलनि विभा रानी

बीतल रवि-सोम मने 23-24 अप्रील कें कलकत्ताक शिशिर मंच मे SOIMELA आयोजित भेल छल. एकर विशेष बात ई छै जे ई महिला लोकनि द्वारा आयोजित ओ संचालित होइ छै. 

SOI CREATIVE WOMEN संस्थाक ई कार्यक्रम लोक संस्कृति, आदिवासी संस्कृति, साहित्य पर आधारित छल जकर एहि खेपक थीम छल 'भूमिकन्या'. भूमिकन्या मने सीता मने मैथिली.

बंगाली महिला लोकनि द्वारा आयोजित एहि दू दिवसीय इवेंट मे दुनू दिन मैथिलीक सत्र राखल गेल छल. प्रख्यात साहित्यिक ओ रंगकर्मी विभा रानी दुनू दिन मैथिली कें प्रजेंट केलनि.


पहिल दिन मिथिलाक प्रसिद्ध डहकन #गालीगीत केर प्रस्तुति देलनि. विभारानी मैथिली गीतक गायन ओ प्रस्तुति सं दर्शक पर विशेष प्रभाव छोड़बा मे सफल रहलीह. मैथिली गीत पर बंगाली मानुष झूमि उठल.

दोसर दिन कहिनी ओ लोकोक्ति पर वैचारिक सत्र मे तीन अन्य आदिवासी भाषाक संग मैथिली दिस सं विभा रानी भाग लेलनि.

रंगकर्मी किरण झा, साहित्यिक राजीव रंजन मिश्र, आमोद झा, देवेन्द्र हजारी, रूपेश त्योंथ आदि भाषाकर्मी लोकनि विभा रानी सं भेंट क' विभिन्न बिंदु पर फइल सं चर्च-बर्च केलनि.  

मिथिमीडिया — MithiMedia 29 April 2017
'अहां मैथिल छी, मैथिली बजै छी की?'

शीर्षक पढि कने उटपटांग लागल होयत. मोने सोचैत होयब जे लगभग पांच कोटि लोकक ठोर पर जाहि अमिट, अतिपावन भाषाक राज अछि, जे भाषा भारतक संगहि नेपाल मे सेहो विशेष प्रतिष्ठित अछि, जे भाषा अपन विशाल आ अमूल्य साहित्यनिधिक बल पर भारतीय संविधानक आठम अनुसूची मे विराजमान अछि, जे भाषा जनकसुता जानकीक कंठ-स्वर सं निकलल अछि, ताहि भाषा पर कोन संकट आबि गेल? 

वा फेर सोचैत होयब जे हम बताह त' नहि भ' गेलहुं अछि? नाना प्रकारक सोच दिमागी समुद्र मे हिलकोर मारैत होयत. जं से सत्ते, त' अपन सोच कें कने स्थिर करी. असल मे ई प्रश्न आइ-काल्हि पद्मश्री उदित नारायण (झा) क' रहल छथि, सेहो पूरा तामझामक संग. 

मायक भाषा संग मोह जिनगी भरि बनल रहैत छैक. चाहे कतेको स्वार्थंधता वा दंभता केर गर्दा मोन-मस्तिष्क मे हो मुदा जखन भावनाक प्रबल प्रवाह होइत छैक त' लोक कें मोन पड़ैत छैक माय, मातृभाषा आ मातृभूमि. ओ प्रत्येक वस्तु जाहि मे मातृअंश हो, एक-एक क' मोन पड़य लगैत छैक. 

मैथिली मे गायन शुरू क' आइ सफलताक उच्चतम शिखर पर पहुंचल उदित नारायण कें कोनो एक भाषाक गायक नहि कहल जा सकैत अछि. भारतक अनेको भाषा मे ओ एक संग गबैत आबि रहल छथि. 

कोनो सफल व्यक्तिक संग विवाद ओहिना लागल रहैत छैक जेना नवकनियाक संग लोकनिया. उदित नारायण सेहो एकर अपवाद नहि छथि. खैर जे हो, ओ सच्चा मैथिल छथि आ मैथिलीक प्रेमी छथि. पद्मश्री हेतु चयनित होयबा काल हुनक नागरिकता हेतु विवाद उठल छल. कतेको लोकनिक कहब छलनि जे ओ नेपालक छथि. मुदा जे हो, ओ मैथिल छथि चाहे नेपालक मिथिलाक होथि वा भारतक मिथिलाक. ओना सभ विवाद कें एकात करैत भारत सरकार हुनका पद्मश्री सं सम्मानित कयलक. मिथिलाक लेल इहो गौरवक बात. 

आब अहाँ सोचैत होयब जे हम 'उदितायण' केर पाठ किएक क' रहल छी? असल मे, पुरहित कोनो आध्यात्मिक अनुष्ठान शुरू करयबा सं पहिने संकल्प करा लैत छैक, त' एखन धरि हम सैह क' रहल छलहुं. मुद्दाक बात आब.

पड़ोसियाक घर मे हुलकी देबाक बेमारी सं के' ग्रसित नहि अछि? से भोजपुरी टीवी चैनेल मे हुलकी-बुलकी देइत रहैत छी. कतहु , कखनो मैथिली सुनबा-देखबा लेल भेटि गेल त' नयन तिरपित भ' गेल. से साल भरि सं बेसिए समय सं भोजपुरी टीवी चैनेल महुआ लोकक मनोरंजन क' रहल अछि. एही पर एकटा संगीत आधारित कार्यक्रम आबि रहल छल- सुर-संग्राम. लोकगीतक श्रोता लेल बहुत नीक कार्यक्रम छल ओ. एहि रियलिटी शो मे मैथिली भाषी प्रतिभागी सभ सेहो छलाह. जेना पूजा झा (दरभंगा), रिमझिम पाठक (धनबाद), आलोक कुमार (खगड़िया). आलोक कुमार, मोहन राठौर (यूपी)क संगहि विजेता रहलाह. एहि शो मे तीन बेर उदित नारायण अतिथि जज बनि क' आयल छलाह. 

पहिल बेर जे जज बनि क' अयलाह त' प्रतियोगी प्रियंका सिंह (गोपालगंज) केर माय, जे ओहि दिन स्टूडियो मे उपस्थित रहथि, सं पूछि देलथिन जे मैथिली-उथली बजै छी की? असल मे हुनका ज्ञात नहि रहनि जे प्रियंका सिंह गोपालगंज सं छथि. उदित नारायण कें प्रियंकाक मायक पहिरावा देखि मिथिलानी होयबाक भ्रम भेल रहनि.

दोसर बेर मे ओ प्रतियोगी रिमझिम पाठकक उपनाम 'पाठक' देखि पूछि देलथिन- अहाँ मैथिली बजै छी की? रिमझिम लजाइत बजलीह- हं, थोड-बहुत. तकर बाद उदित नारायण हुनक गायिकी पर मैथिली मे कमेन्ट देलनि. एहि बात सं ई सिद्ध भेल जे हुनका ह्रदय मे मैथिलीक प्रति प्रगाढ़ प्रेम छनि. कारण, भोजपुरीक टीवी चैनेल पर मैथिली बजबाक हुनक छटपटाहटि सहजे देखल गेल. मुदा मैथिली के प्रोमोट करबाक लेल की कयलनि, आ की क' रहलाह अछि, से बेसी महत्वपूर्ण.

सक्षमे दिस संसार अपेक्षाक दृष्टि सं तकैत छैक. मैथिलीक अउनाहटि एही सं पता लगाओल जा सकैत अछि जे मैथिली अपना संसार मे जतेक हाथ-पयर मारबा मे सक्षम अछि, मारिये रहल अछि संगहि आन-आन भाषा-क्षेत्रक प्रिंट-इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे सेहो घुसपैठ क' रहल अछि. जेना हिन्दी चैनेलक धारावाहिक सभ मे मैथिली गीत ओ संवाद सुनबा-देखबा मे आबि जाइत अछि त' भोजपुरी चैनेल महुआ पर त' कतेको चिन्हार मैथिली कलाकार रोजगाररत छथि त' एही चैनेल पर कहियो-काल मैथिली गीत-सिनेमा देखबा लेल सेहो भेटि जाइत अछि. 

आब प्रश्न उठैत अछि जे आख़िर कहिया धरि घुसपैठे स' काज चलबैत रहब? समाचार पत्र, टीवी चैनल, सिनेमाक क्षेत्र मे ठोस काजक नितांत आवश्यकता अछि. कारण एहि सं भाषाक प्रसार व्यापक रूपे होइत छैक. मैथिली घेंट उठौलक अछि. कोलकाता सं मैथिली दैनिक पत्र (मिथिला समाद) आ दिल्ली सं टीवी चैनेल (सौभाग्य मिथिला) शुरू भेल अछि. एहि दुनूक आगां अपन प्रसार व्यापक करबाक चुनौती छैक. मिथिला क्षेत्रक लोक माछ खा शरीरे बलिष्ट आ दिमागे तेज होइत अछि त' पान खा स्वरक प्रखरता सेहो बनल रहैत छैक. संगहि एहि क्षेत्रक लोक मे मखान सं सादगी सेहो देखबा मे अबैछ. 

मैथिलीक चर्चा अबिते विद्यापतिक छवि दृष्टि पटल पर नाचय लगैछ. विद्यापति मैथिलीक प्राण छथि, ताहि मे कोनो दू मति नहि. मुदा हमरा लोकनि कहिया धरि विद्यापतिये सं काज चलबैत रहब? हमरा लोकनि के गोसाओनिक घर सं निकलि बाहरोक बसात लगयबाक चाही. आधुनिक युगक मांगक अनुरूप अनुकूलित होयब आवश्यक.

एकैसम शताब्दी मे मिथिलाक कराह-स्वर दरभंगा होइत सोझे दिल्ली पहुँचि रहल अछि त' मैथिलीक छटपटाहटि सहजहि अनुभव कयल जा सकैत अछि. आशा अछि मैथिल एहि बात के बुझैत अपन माय, मातृभूमि आ मातृभाषाक मान बढ़यबाक प्रबल प्रयत्न करताह. 

हमरा लोकनि कें संयुक्त प्रयास सं एहन मिथिलाक सृजन करबाक अछि, जकर गमक सं वातावरण गमगमा जाय, जकरा देखने नयन तिरपित भ' जाय आ जकरा सुनने कर्णपटल धन्य भ' जाय. हमरा लोकनि कें एहन बसात बहयबाक अछि, जकर अनुभव मात्र सं ओकर पहिचान कयल जा सकय. हमरा लोकनि कें एहन परिवर्तन अनबाक अछि जाहि सं कम सं कम मैथिल मैथिल कें चिन्हबा मे धोखा नहि खा सकथि. हमरा एहन मिथिला बनेबाक अछि जाहि सं कोनो उदित नारायण के ई नहि पूछय पड़नि जे 'अहाँ मैथिली बजै छी की ?' 

— रूपेश त्योंथ 

(साल 2009 मे मैथिली दैनिक 'मिथिला समाद' लेल लिखल आलेख)

#पेटारमेसं 

मिथिमीडिया — MithiMedia 28 April 2017
मैथिलीक प्रतिभा भोट केर मोहताज नहि!

कलर्स चैनल पर सिंगिंग रियालटी शो 'राइजिंग स्टार' मे 'रनर अप' रहल मैथिली एहि प्रतियोगिता मे सभ सं बेसी भोट हासिल केनिहार प्रतिभागी रहलाक बादो फाइनल मे बेनेट दोसांझ सं हारि गेलीह. खबरिक अनुसार बेनेट मात्र दू भोट सं विनर भेलाह. तथापि मैथिली संतोख केलनि अछि आ समस्त भोट देनिहार लोकनि कें आभार जतओलनि अछि. शो मे सेहो ओ अनेक बेर मैथिल लोकनि कें फराक सं धन्यवाद देब नै बिसरैत छलीह. 

संगीतक क्षेत्र मे बहुत कम समय मे अमिट छाप छोड़निहारि मैथिली ठाकुर मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी (उड़ेन)क छथि आ दिल्ली प्रवासी छथि. मैथिली कें संगीतक प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपन पितामह बच्चा ठाकुर आ पिता रमेश ठाकुर सं भेटल छनि.
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"Maithili Thakur अपन मातृभूमि, भाषा आ सकल समाज कें माथ उन्नत केलनि. लोक कें एक केलनि. किछु बात त' छै मैथिली मे, जे मैथिल कें हुनक हारि पचि ने रहल छै. #मैथिली संगीते नै सकल समाजक गहना छी. जीबू, जागू...अहांक भविष्य उज्ज्वल अछि." — रूपेश त्योंथ, संपादक 
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मैथिली एखन धरि संगीतक क्षेत्र मे कतेको विशिष्ट पुरस्कार प्राप्त क' चुकल छथि. राष्ट्रीय स्तरक गायन कार्यक्रम 'इंडियन आइडल जूनियर-2015' आ 'सारेगामापा' सहित कतेको रियलिटी शो मे अपन प्रतिभाक परिचय द' चुकल छथि. 'आई जिनियस यंग सिंगिंग स्टार' जीतलाक बाद यूनिवर्सल म्यूजिक द्वारा मैथिलीक 'या रब्बा' अलबम कें लोक सभ खूब पसिन केलनि अछि. एहि अलबम मे 'शैतानिया' टाइटल सांग कें यू-ट्यूब पर 16 लाख सं बेसी बेर देखल-सुनल गेल अछि.

उल्लेखनीय अछि जे सिंगिंग रियलिटी शो केर 'जज' मुख्य रूप सं दर्शक छलाह जे लाइव पसंदीदा प्रतिभागी कें मोबाइलक जरिए भोट देइत छलाह. एहि शो मे जज रूप मे शंकर महादेवन, मोनाली ठाकुर आ दिलजीत दोसांझ छलाह.

फाइनल रिजल्ट कें ल' मैथिल लोकनि ओ मैथिलीक फैन लोकनि सोशल मीडिया पर कलर्स चैनेल पर अपन तामस बहार केलनि. ई मैथिलीक फैन फोलोविंग कें देखा रहल छै. मैथिलीक पिता रमेश ठाकुर कहै छथि जे एहि प्रतियोगिता सं मैथिलीक पहिचान बेस विस्तारित भेलनि अछि.

मिथिमीडिया — MithiMedia 26 April 2017
सांस्कृतिक उन्मुक्तताक आकांक्षाक रूप मे कविता

'तीन कारण सं मानव विकासक सांस्कृतिक आयाम पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देब जरूरी. पहिल, सांस्कृतिक उन्मुक्तता मानव स्वतंत्रताक महत्त्वपूर्ण पक्ष होइत छै जाहि मे उपलब्ध वा उपलब्ध भ' सकएवला विकल्प कें अपनाक लोक कें इच्छित जीवन जीबाक क्षमता तथा अवसर शामिल छै. सांस्कृतिक उन्मुक्तताक उपलब्धता मानव विकासक अनिवार्य पक्ष छै आ एहि लेल सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अवसरक पार गेनाइ जरूरी, किएकि ई सभ अपने-आप मे सांस्कृतिक उन्मुक्तताक गारंटी नहि भ' सकैत अछि. दोसर, एहि बीच मे हालाँकि, संस्कृति आ सभ्यता पर काफी चर्चा भेल अछि तथमपि सांस्कृतिक उन्मुक्तता चर्चाक मुख्य बिंदु नहि बनि सकल आ सांस्कृतिक संरक्षण पर बेसी जोर रहलैक. मानव विकासक दृष्टिकोण, सांस्कृतिक परिक्षेत्र मे मानव विकासक महत्त्व कें बुझैत अछि. एकर बदला मे, चलैत आबि रहल युक्तिहीन परंपरा पर जोर देब, सभ्यताक दुर्निवार संघातक चेतावनी पर चर्चा मे जोर रहल अछि जखन कि मानव विकासक परिप्रेक्ष्य सांस्कृतिक परिक्षेत्र मे स्वतंत्रताक महत्त्व कें रेखांकित करैत अछि जाहि सं लोक सांस्कृतिक बचाव आ प्रसारक आनंद ल' सकए. महत्त्वपूर्ण मुद्दा पारंपरिक संस्कृतिक वैशिष्ट्यक संरक्षण नहि सांस्कृतिक विकल्प आ स्वतंत्रताक उपलब्धता अछि. तेसर, सांस्कृतिक उन्मुक्तताक महत्त्व मात्र सांस्कृतिक परिक्षेत्र मे नहि अछि बल्कि एकर संबंध सामाजिक, राजनीतिक आ आर्थिक परिक्षेत्रक सफलता विफलता सं सेहो प्रगाढ़ छै. मानव जीवनक विभिन्न आयाम दृढ़तापूर्वक अंतर्संबंधित अछि. एते धरि जे, गरीबी, जे एक तरहक आर्थिक अवधारणा थिक, ओकरो सांस्कृतिक संदर्भक बिना नहि बूझल जा सकैत अछि. वस्तुतः एडमस्मिथ, जिनकर काज मानव विकास कें प्रासंगिक बनौलक अछि हुनकर ई मानब छनि जे सांस्कृतिक अपवंचन आ आर्थिक गरीबी मे बहुत नजदीकी संबंध छैक.

सांस्कृतिक उन्मुक्तता आ सांस्कृतिक अपवंचन, एकरा सांस्कृतिक बहिष्करण (Cultural Exclusion) सेहो बूझल जा सकैत अछि, सं गप्प शुरू कएल जा सकैत अछि. सांस्कृतिक उनमुक्तता सांस्कृतिक संरक्षण सँ सर्वथा भिन्न छैक. रोजी-रोटी आ जीवनक अन्य प्रसंगक मादे मनुष्य भिन्न सांस्कृतिक वातावरण मे एनाइ-गेनाइक लेल बाध्य अछि. जाहि समाज मे जाइ ओकर सांस्कृतिक परंपरा कें सम्मान केनाइ अपनेनाइ स्वाभाविक. अवधीक प्रसिद्ध कवि तुलसीदास कहि गेल छथि- जहाँ बसइ सो सुंदर देसू! सुंदर देसू ठीक मुदा ओहू ठाम इएह बांछनीय जे अपन सांस्कृतिक पहचानक मिटा देबाक बुड़िबकै सं बचबाक चाही. सांस्कृतिक उन्मुक्तताक सवाल असल मे सांस्कृतिक परंपरा आ प्रसंगक चयनक थिक. आ हम त' कहब जे चयन सं बेसी ई अपन परंपरा आ सांस्कृतिक प्रसंग कें अन्य सांस्कृतिक प्रवाहक संग सम्मिलनीक वा सम्मिश्रणक थिक. विस्तार सं अन्यत्र, अखन त' एक टा उदाहरण. आइ हमरा सांस्कृतिक जीवन मे खाली अंगरेजी, हिंदी सन पैघ भाषाक माध्यम सं आबि रहल सांस्कृतिक उपादनक मात्रा नइ बढ़ि रहल अछि बरन पंजाबी, भोजपुरी आदिक आमद भ' रहल अछि. ई त' खुशीक गप्प एकर स्वागत करबाक चाही, चिंता तखन बढ़ि जाइत अछि जखन मैथिल संस्कृतिक उपादनक प्रवाह कें स्थगित देखैत छी. खाली मैथिल संस्कृतिक उपादनक प्रवाहक ई स्थिति नइ, बांग्ला, अवधी, ब्रभाषा आदि सनक पैघ संस्कृतिक स्रोतक स्थिति सेहो बहुत नीक नइ कहल जा सकैत अछि. आर-त-आर कहू त' असगर कोलावरी कतेक बाजार पीटलक? आखिर की बात छलैक जे सदैव ब्रजनारी कें संबोधित गीतक प्रवाह ब्रज क्षेत्र मे नहि भ' पूबे दिस भेल? किछु त' कारण हेतै! हमरा ई सवाल बहुत हरान करैत अछि, मुदा अखनि ओम्हर नइ. अखनि त' सांस्कृतिक उन्मुक्तताक सवाल असल मे सांस्कृतिक उपद्रव सं बचाव आ सांस्कृतिक परंपरा आ प्रसंगक चयनक सवाल थिक. आ हम त' कहब जे चयन सं बेसी ई अपन परंपरा आ सांस्कृतिक प्रसंग कें अन्य सांस्कृतिक प्रवाहक संग सम्मिलनीक वा सम्मिश्रणक थिक. एतबे जे, हमरा सभक मोन मे सांस्कृतिक उन्मुक्तताक सवालक मादे मैथिल परंपरा आ सांस्कृतिक प्रसंग कें अन्य सांस्कृतिक प्रवाहक संग सम्मिलनीक वा सम्मिश्रणक अवरुद्ध स्थिति होएबाक चाही. मैथिल संस्कृति बहुत समृद्ध अछि. मैथिली साहित्यक  समृद्धि पर गाहे-बगाहे चर्चा होइत रहैत अछि.

एडमस्मिथ कहने छथि जे गरीबी आ सांस्कृतिक अपवंचन मे करीबी संबंध छैक त' ओकरा अहू रूपे बूझल जा सकैत अछि जे आइ संस्कृतियो आर्थिक समृद्धिक एकटा औजार अछि. कहबाक जरूरत नइ जे विश्व आर्थिकीक एकटा पैघ अंश संस्कृतिक उपादान सं बनैत अछि. ई त' बुझना जाइत अछि जे संस्कृति आ आर्थिकी मे नजदीकी संबंध छैक त' की एहेन भ' सकैत अछि जे सांस्कृतिक रूप सँ समृद्ध समुदाय आर्थिक रूप सँ दरिद्र हो? ज' एहेन छै त' हमरा जनैत सांस्कृतिक संभ्रम (Cultural Illusion) सांस्कृतिक प्रज्ञा (Cultural Competence) कें गछारने अछि आ ताञ कतौ अबूझ गलती भ' रहल अछि. या त' सांस्कृतिक समृद्धि कें बढ़ा-चढ़ा क' मूल्यांकित कएल जा रहल अछि या आर्थिक दरिद्रता कें बढ़ा-चढ़ा क' सामने राखल जा रहल अछि वा दुनू गप्प भ' सकैत अछि. हम कहब जे मैथिलक संदर्भ मे दुनू गप्प भ' रहल अछि. ताञ कने सावधान रहबाक जरूरत अछि. पुरना समय मे मैथिल संस्कृति बहुत समृद्ध छल जेकर स्मृति हमरा खिहारि रहल अछि आ आर्थिक रूपे हम ओतेक दरिद्र नहि छी जेते हम अपना कें बुझि रहल छी. स्मृति खिहारि क' संप्रति कें गछारि लिए' ई एकटा भिन्न स्थिति आ स्मृतिक धरोहरि सं प्राण-रस ल' संप्रति प्राणवंत बनए ई सर्वथा भिन्न स्थिति. ई त' स्पष्टे जे पहिल पछुआ दैत छै त' दोसर अगुआ दैत छै. ताञ, पहिल सं दोसर स्थिति दिस बढ़नाइ चुनौती! एहि चुनौतीक मादे मैथिली साहित्यक महत्त्व कें अकानब मैथिली आलोचनाक एकटा जरूरी कार्यभार. आलोचनाक दोसर जरूरी कार्यभारक ठिकिएबाक क्रमे आगू बढ़वा सं पहिने देखनाइ उचित जे मैथिली साहित्यक वर्त्तमान स्थिति केहेन अछि! खास क' मैथिली कविता आ मैथिली आलोचनाक परिदृश्य! बहुत आसान उपाय अछि, एक वाक्य मे कहि देल जाए जे अति उत्तम! महो-महो! अहाँ सबके नीक लागत, साहित्यकार संतुष्ट हेता, हमरो मन प्रसन्न हएत. मुदा, ई एहेन समय अछि जे हमरा सभ कें आसान रास्ता कें छोड़ि कने कठिन रास्ता पर चल' पड़त. सब कें नीक नहियो लागि सकैत अछि, साहित्यकारो सब असंतुष्ट भ' सकैत छथि, अपनो मोन दुखी भ' जाएत. तैयो, हँ तैयो ई खतरा उठबैए पड़त. असगरे ई खतरा नहि उठाएल जा सकैत अछि. हमरा सब कें ई खतरा मिल क' उठाब' लेल तैयार रहबाक चाही. त' चलू, अपना दिस सं किछु कहबाक पहिने मैथिलीक प्रसिद्ध साहित्यकार गंगेश गुंजन जी सं बूझि लैत छी जे मैथिली साहित्यक वर्त्तमान स्थिति केहेन छैक. गंगेश गुंजनक शब्द मे, 'मैथिलीक वर्त्तमान, सपाट, स्थूल आ स्पंदनहीन काव्यालोचन, नव काव्यानुभवक युग सापेक्ष भार नहि उठा पाबि रहल अछि. ई समय तेहन अछि जे आइ, समीक्षक भूमिका सेहो सर्जकक सहरूपी भ' गेल अछि. आचार्य नलिन विलोचन शर्मा समीक्षा कें रचनाक शेषांश कहने छथि. मैथिली कें आइ ई परिवेश चाही. एखन त' मैथिली कविता वन कुसुम जकां, अपन अस्तित्व रक्षा आ विकास मे स्वयं संघर्षरत अछि. आब चुनौती ई जे, सपाट, स्थूल आ स्पंदनहीन काव्यालोचन कें गंभीर, सूक्ष्म आ स्पंदित कोना कएल जाए जाहि सं मैथिली कविता कें दिशा भेटैक.

पहिने साफ क' दी जे कवि, जे कोनो भाषाक कवि बहुत संवेदनशील होइत छथि आ कविता बहुत जटिल मानवीय अभिव्यक्ति ओकरा रचनाक बाहर सं प्रत्यक्षतः निदेशित नहि कएल जा सकैत अछि आ नञ त' हम ई गलती कर' जा रहल छी. हँ, ई मनोरथ जरूर जे आलोचना कें मैथिली कविताक संगी-सहचरी बना सकी. मैथिली कविता मे गति त' छै मुदा गतिक सापेक्षता मे दिशा नञ छै. दिशाक अभाव मैथिली कविता कें एकहि वृत्त पर घुमा दैत छैक. कहबाक प्रयोजन नञ जे, वास्तविक या अभिकल्पित गंतव्यक बोध गति कें दिशा दैत छैक. मैथिली कविताक वास्तविक किंबा अभिकल्पित गंतव्य की भ' सकैत अछि से ठिकियाब पड़त. एहि मे आलोचनाक किछु भूमिका भ' सकै छै की! अहाँ मे सं बहुतो जनैत हएब मुदा, प्रासंगिक रूप सं संकेत केनाइ जरूरी जे काव्य-शास्त्र आ काव्योलोचन मे अंतर होइत छैक.

सभ्यताक विकास क्रम मे निहित सत्ता-विमर्शक कारणे संस्कृति बहुत तरहक विपर्यय देखने अछि. मातृ-सत्तात्मक समाज पितृ-सत्तात्मक समाज मे बदलि गेल. मनुष्य पर मशीन का वर्चस्व बढ़ल. लोक वेदक पाछू-पाछू चल' लागल. शास्त्र आ सत्ता का जन्म संगे होइत छै. जेना-जेना साहित्य लोक-विमर्श सं बाहर आ सत्ता-विमर्शक अंगीभूत होइत जाइत अछि साहित्य पर शास्त्रीयताक दबाव बढ़ैत जाइत छैक. साहित्य पर शास्त्रीयताक गहन प्रभाव आ दबावक सुदीर्घ आ समृद्ध परंपरा छै. एहि प्रभाव आ दबाव सं बाहर निकलबाक क्रम मे आलोचनाक जरूरत कें बुझबाक चाही. मतलब साफ जे 'काव्य-शास्त्र' आ `काव्यालोचन' मे मूलभूत गुणात्मक अंतर छै. साहित्यक विभिन्न पक्षक संदर्भ मे काव्य-शास्त्रक अनुल्लंघनीय सीमा होइत छै. फेर कहब जे शास्त्र मे सत्ता अभिमुख होइत जेबाक तीब्र प्रवणता अंतर्निहित होइत छै. एहि प्रवणताक कारण शास्त्रक हृदय मे लोक-संवेदनाक लेल समुचित सम्मानक कोनो खास जगह नहि रहैत छैक. ई बात खाली साहित्य-शास्त्रेक संदर्भ मे नहि बरन धर्म-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र आ समाज-शास्त्रोक संग सेहो होइत छै. शास्त्र प्रतिमान गढ़ैत अछि आर आलोचना प्रतिपथ तकैत अछि. शास्त्र और लोकक बीचक द्वंद्व कें गहिया क' देखल जाए त' ई बात सहजे बुझबा मे आबि सकैत अछि जे एहि क्रम मे युगांतरकारी सामाजिक- राजनीतिक-सांस्कृतिक विवर्त्तनक जन्म होइत छैक आ युग-संक्रमणक अंतर्विरोधक दबाव भाषाक प्रति साहित्यकारक बेबहार कें बदलि दैत अछि. अकारण नहि संस्कृतक अगाध पंडित कें देसिल बयना मीठ लागय लगैत छनि! अपन दायित्व-पालनक बास्ते आलोचना कें सहयोजी आ गतिशील होब' पड़ैत छै. विज्ञान आ तकनीकक नवोन्मेषक ई समय सांस्कृतिक प्रक्रियाक नवोन्मेषक समय सेहो छैक. मैथिली साहित्य कें आइ सहयोजी आ गतिशील आलोचनाक जरूरत छै, विचारशील आ दिशा-संधानी आलोचनाक जरूरत छै. सावधानी ई जे, आजुक समय विचारक दुनिया मे घोंघाउज चलि रहल छैक. कोनो विचार आँखि मुनिक अपना लेबा मे खतरा सब समय रहैत छै, अखन त' आर बेसी. ओना त' आँखिगर लोक कहियो आँखि मुनिक कोनो प्रस्ताव कें स्वीकार नहि करैत अछि. मुदा आँखि पर खतरो त' शुरूए सं रहल छै. जखन श्रीकृष्ण कोनो तरहे अर्जुन कें नहि प्रबोधि सकलाह त' हुनकर आँखिये बदलि देलखिन. ई नहि कहखिन जे हम अहाँक आँखि छीनै छी, कहलखिन जे हम अहाँ कें दिव्य आँखि दैत छी -- 'न तु मां शक्यसे द्रष्टुमननैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमेश्वरम। ई त' ओहि समय भेल रहै! अजुका कठिन समय मे विचारशील आ दिशा-संधानी आलोचनात्मक दृष्टि कें सक्रिय रखनाइ की एतेक सहज काज छी! ई काज सहज भ' सकैत अछि यदि सहज-सुमति कें हम सब मिलि क' साधि सकी. हमरा जनैत, एहि समय मे मैथिली आलोचनाक इएह भूमिका भ' सकैत अछि. त' केहेन कठिन समय अछि, की कहैत छैथ पंकज पराशर, 'एहि चतुर समय मे / जखन कि भविष्यक नक्शा बनाओल जा रहल हो / भूमंडलीकरण आ उदारीकरणक नेओं पर / लालटेमक मद्धिम रोशनी मे तल्लीनता सं पढ़ैत / मनोहर पोथी / हमर भागिन हमरा भरि दैए घोर संत्रास / व्यर्थता बोध सँ.

ई संत्रास, ई व्यर्थता बोध साधारण नञ किएक त' अतीतक गछारक बीच मे फँसल लालटेमक मद्धिम रोशनी मे भविष्यक जे नक्शा स्पष्ट भ' रहल अछि ओकर अंतर्निहित संकेत जे भूमंडलीकरण आ उदारीकरणक पोथी स' संस्कृतिक मनोहर पोथीक पृथकता सं एहि संत्रास आ एहि व्यर्थता बोधक नाभिनाल संबंध छैक. एकटा फूल खिलाइ छै त' ओकर पाछू प्रकृतिक कतेको ज्ञात-अज्ञात प्रक्रिया एकहि संगे सक्रिय रहैत छैक! आ मनुखक जन्मक पाछू त' बुझले जा सकैत अछि प्रकृतिक संगहि संस्कृतियोक कतेको ज्ञात-अज्ञात प्रक्रिया सक्रिय रहैत छैक! मुदा एक समय जेना ई प्रक्रिया विच्छिन्न हुअ लगैत छै, तैयो कि एतेक सहजहि! कहैत छैथ वियोगी जी, 'बहुत मनसुआ सँ देने छल हेती जन्म / कतेको रास नियार-भास / कतेको कतेक आस-मनोरथ / घुमड़ैत रहैत छल हेतनि हुनका चतुर्दिक / ओहि नव मास मे, जा हम हुनका गर्भ मे रही. /..../ कोना हम मानब जे माइ हमर मरि गेली / आ छोड़ि गेली संग! // जा हम जीबैत छी / कोन उपायें छोड़ी ओ हमर संग?

मिथिलावासी त' सब दिन सं घर छोड़ि बहराएबाक परिस्थिति स' गुजरैत रहल छथि. कतेक बेर त' घर छोड़ि बहरेलाक बादो ओ सांस्कृतिक रूपे घरे मे रहैत रहलाह आ अनेक बेर घर छोड़ि घुड़मैया मे लागि गेला मुदा घर सं बहराएबाक गप्प केदार कानन लधैत छथि त' कने गंभीर गप्प कहैत छथि, घर सं बहरेनाइ किएक एते जरूरी, 'मुदा कतेक जरूरी अछि / बहराएब घर सं / अपन एकांतक जंगल सँ / प्राण लेल / जीवन लेल / कतेक बेगरता अछि / हमरा बहरएबाक। जरूरी अछि, बहराएब घर सं मुदा डर ई जे 'एहिना छुटैत अछि राग-रंग / गीत-लय-ताल / प्रेम, जे नहि क' सकलहुँ एखन धरि / सभ सँ बेसी / सभ सँ बेसी मोन लागल रहत / तकरा पर'7 । जरूरी अछि, बहराएब घर सं मुदा राग- रंग, गीत-ताल-लय आ प्रेम कें छूटि जेबाक डर! ओना त' कोनो समुदायक सदस्यक मोन मे एहि जरूरियात आ एहि छूटि जेबाक डर सं उत्पन्न द्वंद्व स्वाभाविक मुदा मैथिलक गृहबोधक निजत्व एहि द्वंद्व कें एक भिन्न तरहक वैशिष्ट्य द' दैत छै! एहि खास तरहक द्वंद्व कें रहितो घर सं बहरेनाइ जरूरी एहु लेल जे, 'बन्न कोठली मे घुटन अछि / चीत्कार अछि / उत्तेजना अछि / मुदा अखनो बचल थोड़े आस अछि / आ बन्न कोठली मे / अखनो शेष अछि प्राण-रस / शेष अछि / खिड़की खोलि लेबाक विश्वास. सुस्मिता पाठकक खिड़की खोलि लेबाक साहस असल मे मैथिलक सांस्कृतिक साहसो थिक. ज' एकरा संगहि मैथिल महिलाक विश्वासक संगे एकरा जोड़िक बुझबाक कोशिश करी त' आइ दुनियाक महिला खिड़की सं आकाश कें देखैक सीमा कें तोड़ि कम-सं-कम अंगनाक खुजल जमीन सं आकाश कें देखैक विश्वासी छैथ. मुदा सुस्मिता खिड़की खोलि लेबाक विश्वासक शेष रहबाक गप्प कहैत छैथ त' ई मैथिल जीवन एकटा विश्वसनीय प्रसंग बनि जाइत अछि. किएक त' प्राण-रस कें सोखि लेबाक आ विश्वास कें तोड़ि देबाक स्थिति चाहे जेते बढ़ि गेल हो, कोठली गाहे जते निमुन्न हो मुदा भरोस कें बचा रखवाक मनुखक क्षमता अजेय होइत अछि. नारीक सामाजिक पारिवारिक विशिष्ट संदर्भ मे ज्योत्सना चन्द्रमक मोन ठीके कहैत छनि जे 'नारी कें मानलनि सभ / वशीकरणक प्रतीक / केहेन विडंबना! केहन अछि ई त्रासदी / इएह नारी / रहलि सदा वशीभूत'9। नारीक वशीभूत रहबाक ई स्वर एहेन विडंबना कें असल मे मनुख जातिक विडंबनाक रूप मे पढ़बाक चाही. आ ई कम पैघ गप्प अछि जे एहि विडंबनाक रहितो कुमार शैलेन्द्र ओकर सपना मे देखैत जे 'ओकर आँखि मे फुलाइ छै सपना / बंशीवट पलाश सन / साँझक पनिसोखा सन / कखनो गामक भोर सन'10। घर सं मनुखक संबंध दुतरफा होइत छैक. मनुख घर मे रहैत अछि. ई जतबा सत्त ततबे इहो सत्त जे घर मनुखक मोन मे रहैत छैक. जखन मनुख घर सं बाहर होइत अछि तखन मनुखक मोन मे बसल घर बेसी जाग्रत भ' जाइत छै आ ओकरा जरूरी बुझाइत छै,'पोचाड़ा करेनाइ / आ कि ढौरनाइ घर कें / वास्तव मे / ढौरनाइ भ' जायत छैक विचार कें... / घरक कोन-कोनक नव रूप / मोन कें दैछ नव स्वरूप ! आ ताञ असल मे पोचाड़ा करेनाइ आ कि ढौरनाइ घर कें, वास्तव मे, ढौरनाइ भ' जायत छैक विचार कें. की ई कहैक आवश्यकता जे मैथिल संस्कृतिक विशिष्ट संज्ञा मे घर मात्र वास्तु नञ विचार सेहो होइत अछि. मैथिल जतबा घर मे रहैत अछि ओहि सं बेसी घर ओकरा मे रहैत छै. घरक विचार आ विचारक घर मे मैथिलक आवाजाही मैथिल मोनक अपन वैशिष्ट्य छैक. एहि वैशिष्ट्य मे नव्यताक आग्रह ओकर प्राण छैक.

सांस्कृतिक उन्मुक्तताक संबंध सांस्कृतिक विकल्पक चयन सं जुड़ल अछि आ विकल्पक अभाव मैथिलक जीवन मे अवसरक संकुचन सं जनमैत छैक. अवसरक संकुचन मिथिलाक भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, ऐतिहासिक आ किछ हद तक सांस्कृतिक संरचनाक मूल वक्तव्य बनि विकल्पक न्यूनताक सूचना अछि, ताञ पंकज पराशरक एहि वेदना कें नजरि गड़ा क' बूझ' पड़त कि 'विकल्प हमरा लग कम अछि / आ इतिहास आँखि गुराड़ि रहल अछि /मुदा यात्रा स्थगनक कोनोटा सुझाव / आब निर्थक छि'12। यात्रा पर बहरेनाइ बहुत जरूरी! कम-सं-कम भौगोलिक स्थिति आ सामाजिक समरक संकेत करैत सारंग कुमारक पीड़ा बहुत किछ ध्वनित क' दैत अछि, 'नहि अछि समुद्र / नहि अछि पहाड़ / नहि अछि हमरा लग कोनो महानगर / मुदा ओहू सं पैघ / सोझाँ मे अछि ठाढ़ एक टा महासमर!'13 केहेन अछि ई सामाजिक समर! कहैत छथि रमेश, 'देसी सरकार, विदेसी बेवहार. रन्ना पीठ पर, रन्नू सरदार. लास मे रस्सा कोसी सरकार. बचल-खुचल दाना, फलां गिरोह. फलां गिरोह, माइ चिल्लां गिरोह. पासमान-पहलमान, गिरोहे-गिरोह. बिहार सरकार, राइफलवला घोड़ा / सरकारे-सरकार, सरकारे-सरकार. जोर लगा क' हइसा! सरकार कें घीचू हइसा! परशासन घीचू हइसा! लोक कें घीचू हइसा. चन्नर-भन्नर हइसा! चन्दायण आइ. बी. हइसा! वीरपुर आइ. बी. हाइसा! दिवारी-थान मे दूध आ लावा, बीयर-बार मे हइसा! रमेश सांस्कृतिक आंतरिक गतिमयताक (Internal Dynamics) राग-रंग, गीत-ताल-लय आ प्रेमक संगहि प्रशासनिक विद्रूपता कें सामने रखैत सामाजिक समर कें जाहि तरहें कविता मे अनैत छैथ ओ अवसरक संकुचनक सामाजिक समरक गाथा बनि जाइत अछि. एहि सामाजिक समर कें पार पबै लेल चाही आमू-चूल सामाजिक परिवर्त्तन! की, क्रांति! मुदा अनका कपार पर चढ़ि क' क्रांति नञ भ' सकैत अछि ताञ देवशंकर नवीन चेताबैत छथि 'अहाँक महफा पर कोना औतीह हमर मीता / लेनिनग्राद सं मोहनपुर'15. संकेत साफ जं मीता हमर आ मोहनपुर हमर त' महफो हमरे हेबाक चाही. नञ खाली महफा कनहो हमरे रहबाक चाही! अखन त' मीता रूसल छैथ आ मोहनपुर दूर अछि ताञ विनय भूषणक शब्द मे बाबाक समाद मोन राखि. की कहने छलाह बाबा! 'बाबा कहने छलाह / नदी माए थिकी / जुनि करियह एकर पानि केँ मलीन। / बाबा कहने छलाह / आकाश कें रखियह निर्मल. पानि नदी केँ होए कि आँखिक, पानि केँ मलीन होम सं बचेनाइ आ कि आकाश कें रखनाइ  निर्मल त' कठिन अछिए संगहि शुद्ध पर्यावरणक चिंता सं बहुत आगूक सांस्कृतिक चेतना अछि. नञ मात्र सांस्कृतिक चेतना एहि मादे सांस्कृतिक प्रतिज्ञा आ प्रेरणा सेहो! दशक मे बान्हिक कविता कें बुझनाइ आलोचनाक अपन परिसरगत विवशता भ' सकैत अछि मुदा एकरा संवेदनाक सीमा मानि लेनाइ उचित बेबहार नञ. सांस्कृतिक उन्मुक्तताक उपलब्धता मानव विकासक अनिवार्य पक्ष छै आ कविता सांस्कृतिक उन्मुक्तताक आकांक्षाक पहिल अभिव्यक्ति; मैथिली कविता कें एहू तरहे देखबाक हम आग्रही. हमर अपन बहुत रास कथ्य-अकथ्य व्यक्तिगत सीमा अछि, जे कहब से थोर. एहि लेल हम क्षमायाची. नवम दशकक मैथिली कविताक पाट एतबे नञ. मुदा हम इत्यादि मे नामावली देबा स' हरदम बचैत रहल छी. हमरा अंदाज अछि, डरो जे बहुत किछु महत्त्वपूर्ण छूटि गेल मुदा ई हमर सीमा मैथिली कविताक नञ.फेर कोनो अन्य अवसर पर ओकरा समेटि सकब त' हमरो नीक लागत.

— प्रफुल्ल कोलख्यान

आलेख संदर्भ : नवम दशकक मैथिली कविता

#पेटारमेसं 

मिथिमीडिया — MithiMedia 22 April 2017
भारतीय लेखकक ऑनलाइन Who's who

साहित्य अकादेमी भारतीय लेखकक जनतब ऑनलाइन क' देलक अछि. अकादेमी द्वारा निकालल जाएबला Who's who केर पांचम संस्करण 2015 सं ऑनलाइन रूप मे उपलब्ध अछि. 

एतय मान्यताप्राप्त भाषा सबहक अधिक सं अधिक लेखकक जनतब एकठाम राखल गेल अछि. एकर परिवर्द्धन अकादेमी समय-समय पर करैत अछि. जनतब ऑनलाइन-ऑफलाइन दुनू तरहें जुटाओल जाइत अछि. 

सर्चक ऑप्शन देल अछि जाहि माध्यम सं विभिन्न फ़िल्टर उपयोग क' लेखकक विषय मे जानकारी लेल जा सकैत अछि.


मैथिली भाषा सं फ़िल्टर कएला पर एखन गोट 96 रिजल्ट देखा रहल छै. माने एतेक रास मैथिली लेखकक जनतब सूचि मे छै. 

एहि सूचि कें बढ़ेबाक हेतु अपने सेहो मैथिली लेखकक जनतब ऑनलाइन वा ऑफलाइन माध्यम सं जमा क' एकर संवर्द्धन मे योगदान क' सकैत छी.

सूचिक लिंक ई अछि : http://bit.ly/2ovv8Zm

मिथिमीडिया — MithiMedia
मैथिली लघुफिल्म 'THE SUSPECT'क इंतजार

'मिथिला मखान' फेम निर्देशक नितिन चंद्रा मैथिली मे लघुफिल्म ल' क' एलाह अछि. The Suspect नामक ई फिल्म आगामी 5 मइ कें यूट्यूब चैनेल 'neobihar' पर रिलीज होएत. 

पोस्टर जारी करैत नितिन कहै छथि जे फिल्म दरभंगा मिर्जापुर निवासी अब्दुल रहीम अंसारी केर कथा कहैए जे मुंबइ चाकरी लेल गेल रहैए आ ओकरा 24 घंटाक भीतर आतंकवादी घोषित क' देल जाइत अछि. पुलिस-प्रशासन ओ मीडियाक उजाहि मे की कोना होइए से फिल्म मे देखाओल गेल अछि.

ज्ञात हो जे हिनक मैथिली फिल्म मिथिला मखान कें पछिला साल राष्ट्रीय अवार्ड भेटल छलनि. ई बिहारक क्षेत्रीय भाषाक फिल्मक विकास लेल कटिबद्ध छथि. मैथिली मे पहिल लघुफिल्म ल' क' आबि रहल छथि. 



फ़िल्मक ट्रेलर काल्हि (22 अप्रील) भोरे 7 बजे जारी कएल जाएत. फिल्मक अपडेट लेल Subscribe करी - https://www.youtube.com/neobihar

मिथिमीडिया — MithiMedia 21 April 2017

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