महालया अमावस्या (Mahalaya Amavasya) : पितृपक्ष केर अंतिम दिन महालया अमावस्या होइत अछि। एहि दिन पितर सभक स्मरण कएल जाइत अछि आ हुनका लोकनिक आत्माक शांति लेल तर्पण अर्पित कएल जाइत अछि। मान्यता अछि जे एहि दिन पितृपक्षक समापन होइत अछि आ देवीपक्षक प्रारंभ होइत अछि। संगहि, ई दुर्गापूजाक आगमनक संदेश सेहो देइत अछि।
महालया आ तर्पणक संबंध महाभारतक महान योद्धा कर्णक कथा सँ सेहो जोड़ल जाइत अछि। जनश्रुति अनुसार, कर्ण जीवनभरि दान-पुण्य कएलनि, मुदा अपन पितर सभक लेल तर्पण नहि कएलनि। बाद मे हुनका अपन अंतिम गति केर उपरान्त पुनः धरती पर आबि पितर सब हेतु तर्पण कर्म करए पड़लनि। पितृपक्ष केर अंतिम दिन छुटल-फुटल सब पितर हेतु लोक तर्पण कर्म करैत छथि।
बंगाल मे महालया केर भोर बीरेंद्र कृष्ण भद्र केर स्वर मे प्रसिद्ध ‘महिषासुरमर्दिनी’ चंडीपाठ सुनबाक परम्परा अछि। वर्ष 1931 मे आकाशवाणी कोलकाता सँ प्रसारित कार्यक्रम महालया अमावस्या कें घर-घर मे लोकप्रिय बना देलक। एहि दिन चंडीपाठक स्वर सुनिते लोकसब कें दुर्गापूजाक आगमनक अनुभूति होइत अछि।
महालया एक दिस पूर्वज सभक स्मरण आ कृतज्ञताक दिन अछि, तँ दोसर दिस देवी दुर्गाक स्वागतक शुभारंभ। एहि तरहें, ई अतीतक स्मृति आ भविष्यक उल्लासक बीच एकटा भावनात्मक सेतु बनि गेल अछि।
मिथिला मान्यता अनुसार, पितरपक्षक बाद सँ पितर लोकनि दीयाबाती दिन धरि पृथ्वी पर भ्रमण करैत छथि। दीयाबाती कें सांझ मे हुनक वंशज लोकनि जखन ऊक फेरैत छथि तखन मंत्र द्वारा कहैत छथि, यमलोक सँ महालया मे जे पितर लोकनि आएल छी, से एहि इजोत मे यमलोक गमन करथि।
यमलोकं परित्यज्य आगता ये महालये।
उज्ज्वलज्ज्योतिषा वर्त्म प्रपश्यन्तो व्रजन्तु ते।।
तखन ओ लोकनि अपन वंशज लोकनि कें हुनक कर्मानुसार आशीर्वाद करैत अपन लोक प्रस्थान करैत छथि। एहि प्रकार सँ महालया एकटा महत्वपूर्ण दिवस बनि जाइत अछि।
