ई देखियौ केहन 'होरीक सुआद' - मिथिमीडिया
ई देखियौ केहन 'होरीक सुआद'

ई देखियौ केहन 'होरीक सुआद'

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हमरा सबेर मे प्राय: देर सं उठबाक अभ्यास अछि. सबेर कें 7 बाजि चुकल छलैक तखने हमर पड़ोसी जे मारवाड़ी समाजक छथि, कनियां पर खिसिआए लागलथि जे हमरा मुंह मे पेशाब चलि गेल. ओ जाहि नाला पर ब्रश करैत छथि ओही नाला पर हुनकर कनियां पेशाब करैत छथिन. हम सोचलहुं कुरूर करबाक समय पानिक छींटा सं जे दुर्गन्ध निकलल होएत से गैस बनि हुनका मुंह मे चलि गेल हेतनि! ओहि लेल ओ तमसा गेल छलाह आ कनियां कें गरियाबए लगलाह.

कनियां कहलकनि जे हम रातिये मे पेशाब केने रही आ अखन अहांक मुंह मे कोना चलि गेल? ओ कहलखिन अहां कें बुझल नहि अछि जे हम एहि नाला पर ब्रश, कुरूड़ करैत छी! एहि बात लऽ कऽ दुनू मे खूब अराड़ि भेल. अंतत: हम कहलियनि दुनू गोटे भोरे-भोरे किएक माहौल खराब करैत छी? होलीक समय छै शांति बना कऽ राखू.
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जाहि मिथिलाक भूमि पर पाहुन बनि खेललथि होली श्रीराम
सिया नामक विशेषण लगा कऽ बढ़ेलथि जग मे अपन नाम
ओही धरती पर जन्म लेल कविगण कें हमहूँ करैत छिअनि
होलीक सुआद सं सम्मान, होलीक सुआद सं सम्मान
नहि कियो बुझबै एकरा अपन अपमान वा असम्मान
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पति महाशय कहए लगलाह जे देखू ने हम जाहि नाला पर कुरूड़ करैत छी ई ओहि नाला पर राति मे पेशाब केलक आ हमरा कुड़ूक करबाक समय मुंह मे ओ पेशाब चलि गेल. तखन हुनकर कनियां कहलनि आइ राति मे नहि, नाला पर हम काल्हिए राति मे पेशाब केने रही. आगा ओ बजली जे जखन झारखण्ड मे हम सब रहैत रही तऽ ओ भांग खाइत छलाह आ आजुक राति मे ठंढइ मे मिलाओल भांग बनेने रहथि से हमरो पिआ देलथि आ अपनो पीलथि. फेर हमरा लग आबि चुप्पे कहलथि राति मे भांगक नशा मे किछु नहि बुझलियै आ ठंढइक गिलासे मे पेशाब कऽ देलियै. जखन हिनका पियास लगलनि तखन ओ पानि बुझि ओकरा पी लेलनि. तकरे हिनका सुआद आबि रहल छनि, कल्हुका नाला पर पेशाब केलहाक नहि! हम चुपचाप आपस अपन घर आबि गेलहुं. 

फेर ओछानि पर आबि कऽ पडि़ रहलहुं. सोचैत रही जे ई सभ केहन लोक छथि से पता नहि! तखने फेर धियान आएल जे आइ कोकिल मञ्चक प्रोग्राम सेहो छैक आ मिथिला दर्शन मे जेबाक सेहो आवश्यक अछि. छुट्टीक दिन रहला सं अनेक तरहक काज सेहो माथ पर घुमि रहल छल तखने एकटा नव नम्बर सं फोन आएल - हम 'सागर' बाजि रहल छी. तकरा बाद फोन कटि गेल. हम चिंतित भऽ गेलहुं, कारण एकबेर लगभग 10 साल पहिने माएक संग गंगासागर गेल रही. संग मे किछु लोक आओरो गेल रहथि ओ लोकनि उत्तरपाड़ा मे डेरा रखने रहथि. गंगासागर मे भीड़क कारणे एक राति चेतना समितिक कैम्प मे रहए पड़ल. स्नान केलाक बाद हम सब दुपहरिया मे बिदा भेलहुँ कोलकाताक लेल, लेकिन अत्यधिक भीड़क कारणे वापस कैम्प मे जाइत रही, तखने बिÏल्डगक व्यवसायी लोकनि भेंट भेला जे अपन परिवारक संग गेल रहथि. हमरा बुझाएल जे हुनका सभ कें दिक्कत भऽ रहल छनि भीड़क कारण! हुनका लोकनिक मददि करक चक्करि मे हम अपने हेरा गेलहुं आ माय सब एक कात मे ठाढ़ भऽ गेली आ कबुला-पाती करय लगलीह जे बेटा कतए हेरा गेल! 



हमहूं बजरंग परिषदक कैंप मे जा कें माइक बला कें कहि घोषणा करेलहुं. लगभग चारि घंटाक प्रयासक बाद आखिर सबगोटे ओतहि भेटलथि जतय हेरायल रही. सागरजीक फोन सुनि हम ओही द्वारे डेरा गेलहुं जे सागरजीक कबुला-पाती पूरा नहि भेलनि जे हमरा ओ फेर याद कऽ रहल छथि! इएह सब हम सोचिते रही कि फेर ओही नम्बर सं फोन आएल, कहलथि हम लक्ष्मण झा सागर बाजि रहल छी. हमरा जान मे जान आएल जे ई सागर जी कविता, कथा आ साक्षात्कारक सागर छथि!

समय बहुत भऽ चुकल छल. सोचलहुं आब कोकिल मञ्चक प्रोग्राम मे आइ कनी सबेरे चलि जाइत छी. घर सं बिदा भेलहुं कि मछुआ पहुंचैत-पहुंचैत संत कवि श्रीआमोदजीक फोन आएल. अहां कें हम आइ तक कोनो काज नहि कहने छलहुं लेकिन आइ एकटा काज हमरा बड़ जरूरी भऽ गेल अछि. हमर मित्र राजीव रंजन जी कें एकटा गीताक आवश्यकता छनि. हुनका मैथिली भाषाक गीता पर बेसी विश्वास छनि, से अहाँ महेन्द्र हजारीक लिखल जे गीता छपने छिअनि ओएह अहाँ नेने आउ. ओ वैष्णव सम्प्रदायक लोक छथि. हम कहबो केलियनि जे आइ होलीयोक दिन वैष्णवे रहता की? की किछु आर? तखन ओ कहलनि हम नहि कहब से बात? फेर कहलनि हुनका घर मे मद्भागवतक कथा, पूजा एकदिना छनि, जाहि मे गीताक आवश्यता छैक से कनी जल्दी मेट्रो पकडि़ कऽ चलि आऊ.

अहाँक पहुँचब त' हम गीता लऽ कऽ ओतहि सँ ओला बुक कऽ कऽ हुनका घर जाएब. से कनी जल्दी सँ जल्दी आउ. हम कहलियनि, ठीक छैक आबि रहल छी. ताबति धरि हम मेट्रो लग पहुँच गेल छलहुँ. देखलहुँ जे मेट्रोक गेट पर भीड़ लागल छैक. लोक सभ सिर्फ मेट्रो मे अन्दर जाइत छैक आ बाहर नहि निकलैक. मेट्रो मे कोनो तकनीकी खराबी रहैक एक दिसक शायद! 

चन्दनजी सेहो ओतहि ठाढ़ भेटला. कहला कतय जाइत छी, हम पूरा बात कहलियनि. ओ हमरा कहला, हमरा देखै नहि छी, हमहूँ मेट्रो पकड़य लेल ठाढ़ छी! जे अंदर जाइ छैक से फेर आपस नहि अबैत छैक, हम चौकलहुँ! फेर कहला सरकार कहलकैए जखन उपर मे जमीन छैक तऽ माटिक नीचा मे किएक मेट्रो चलतै! धरती माताक अपमान किएक? देखै नहि छियैक बगल मे माटि कोड़ि रहल छैक, एतहि पटरी बैसा कऽ मेट्रो चालू करतैक उपरे मे. ताहि लेल कम सँ कम पाँच मिनट तक इन्तजार करए पड़त. 

हम एहि पाँच मिनटक अन्तराल मे बगल मे मजदूर सब जे माटि कोड़ि रहल छल आ ओतय कोना पटरी बैसतैक से देखए लगलहुँ. तखने एकटा मजदूर कहैत अछि - ऐ दिगे की देखछेन। साइडे थाकुन. एइ दिके आसले, केटे जाबेन. हम कहलियैक मेट्रोक पटरी कोना बैसबैत छी से हम देखय चाहैत छी. तखने हमरा कहैत अछि जे अपना के ओ भद्र लोक बोका बनाछिलो से हम सुन छिलम. अपनी की जानेन ना की मेट्रोर लाइन उपरे बसबे, आर पाँच मिनट मध्ये. निजे माथा खटान. ना बुझछेन, ताले जाहि मध्ये काज थाके ओहि मध्ये लोक संगे जिज्ञासा करुण, ताले भालो भावे बुझबेन. हम कहलियनि सरकार! साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत व्यक्ति छथि ओ कोना गलती कहता!

तखने देखलहुँ नबोनारायणजी, मिथिलेश जी आ रूपेश जीक संग बहुतो लोक मेट्रो सँ निकललथि. हम कहलियनि कोना एलियै यौ! चन्दन जी कहलनिहें मेट्रो मे अखन जे जाइ छै से वापस नहि अबै छैक. ताबत संत कवि श्रीआमोदजीक फोन आयल जे आब नहि आउ, हुनकर पूजा समाप्त भऽ गेलनि. सभहक संग हमहूँ कोकिल मंचक प्रोग्रामक लेल विदा भेलहुँ. 

रस्ते मे डॉ. अनमोल झाक फोन आयल जे सर अहाँ कतए छी! आब अहूँ तऽ पैघ कवि भऽ गेलहुँ अछि हमरा दूटा लघुकथा पठा दिअ. हमर गुरुजी आब रिटायर कऽ गेलखिनहें से आब लघु कथा पर 10 आदमी कें डॉक्टरक उपाधि देथिन, से अगर अहूँक भाग्य साथ देलक दऽ अहूँ डॉक्टर भऽ जाएब. हम खुश होइत डॉक्टर साहेब कें कहलियनि यौ हमरा मे थोड़ेक डॉक्टरक गुण अखनो अछि, कारण जखन हम बच्चे रही तँ हमर एकटा महींस पोसिया लागल रहए. तकर दूध लाबय हमहीं जाइ. एक बेर महींस के मोन खराब भेलै तँ डॉक्टर के देखलियैक सुइया दैत, ओहिना दोसर दिन सँ महींस कें हमहूँ सूइया दऽ दियै, डॉक्टर कें आबए के काजे नहि. खुश भेलौं जे सूई देबऽ आबिये गेल अछि, आब सिर्फ दबाइये लिखबाक सीखक अछि. सेहो कहुना कऽ सीखीये लेब! फेर आला, पैड लऽ कऽ हमहूँ चेम्बर खोलब. ताहि पर डॉक्टर साहेब कहला, से ड्रिग्री नहि भेटत, केवल नामक पहिले अहाँ डॉक्टर लगा सकैत छी.
  
बाते-बात मे रूपेश जी कहला यौ अजित आजाद कें अहाँ बंगला भाषा बला किताब छापि देलियनि. हम कहलियनि हँ छपि तऽ लगभग दू महिना पहिने गेलनि, लेकिन अखन तक लऽ नहि गेलाहें! ताहि पर हम फेर आजाद जी कें फोन लगेलहुँ. ओ उत्तर देलनि किताब छपि गेल अछि ने भाइ, हम लऽ जाएब वा नहि, ताहि लेल हम आजाद छी। ओना मिथिलेश जी हमर ओहि किताबक लेल संयोजक छथि अहाँ हुनको सँ गप्प कऽ सकैत छी. हम मिथिलेश जी कें कहलियनि आ मिथिलेश जी हमर मुँह देखैत रहि गेलथि. 

आपस मे गप्प करैत-करैत हम सब प्रोग्रामक हॉल मे पहुँचलहुँ. ओतय ढंठइ पीलाक बाद श्रीमती किरण जी नजदीक आबि कहैत छथि रविदिन अकासतर बैसकी छैक, अहाँ जरूर एबै, कारण जाहि दिन सँ हम संयोजक बनलहुँ अछि ओहिदिन सँ बैसकी में कवि लोकनिक आगमन कम भेल जा रहल अछि, हम कहलियनि रविदिन कऽ हमरा मिथिला दर्शनक काज करए पड़ैत अछि. हमरा चट्टे जवाब देली, यौ रवि दिन कऽ हमरा सरकार छुट्टी दैत अछि. आ अहाँ कें प्राइवेट सरकार अछि तैयो छुट्टी नहि भेटैत अछि. आब बुझलहुँ जे रवि दिन कऽ दोसर दिनक अपेक्षा देशक विकास कम किएक होइत छैक. हमहूँ सोचए लगलहुँ किरण जी ठीके कहैत छथि जे रवि कऽ विकास कम होइत छैक! कारण रवि दिन कऽ गाड़ी-घोड़ा सेहो कम चलैत छैक आ ऑफिस, दोकान सेहो सब बन्द रहैत छैक. 

ताबत हॉलक एकटा कात मे देखलहुँ जे किछु आदमी गोलिआएल छथि आ गीतक आवाज आबि रहल अछि. हमहूँ ओतए गेलहुँ. देखलहुँ जे किशोर कुमारक गीतक आयोजन छैक जे भोली बाबा गाबि रहल छथि. एकटा गीत समाप्त भेलाक बाद ओ भोजपुरी गीत गाबए लगलाह हम कहलियनि भाई ई गीत तऽ किशोर कुमारक नहि अछि ओ कहला गीत, गीत होइत छैक से बुझियौ. हमरा लेल सब किशोरे कुमार छथि. अहाँ बड फट-फट बजैत छी. हम अहाँ कें फेसबुक्र फ्राइण्ड सँ बाहर निकालि देब. रंजीत जी संग दैत सेहो कहलखिन ठीक कहैत छी बाबा अहाँ. नाटकक पुरस्कार हम सब लैत छी आ हिनका बुझाइत छनि जे हम बड्ड बुझैत छिऐक. हमहूँ फेसबुक पर बुरबकहा बला बात सभ लिखैत छी तऽ ने ई लाइक करैत छथि आ ने कमेन्ट. हमहूँ अहाँक संगे हिनका फेसबुक फ्राइण्डक लिस्ट सँ बाहर कऽ देबनि आ देखबैन जे के हिनका फ्रैण्ड बनबैत छनि. हम गुम्मे भऽ गेलहुँ आर फेर दू गिलास ठंढइ पीबि अपन माथ ठंढेलहुँ आ एकटा कोन मे बैसि गेलहुँ.


ठंढइ पीबैत काल शायद सुधा जी हमरा उपर पूरा ध्यान रखैत छलाह, जे ई कएक गिलास ठंढ़इ पीबि रहल छथि. ओहो लग आबि बजला रंजीत जी हम अहाँ सभहक विचार सँ सहमत छी. हम तऽ ठंढइ बनबै छी जे किछु बाँचि जाएत तऽ बाल्टी-दू बाल्टी घर लऽ जाएब. बगल मे सासुरक लोक सब छथि हुनका मे बाँटब, लेकिन ई तऽ असगरे समाप्त करबाक प्रयास मे छथि. अगिला बेर सँ हिनका हम नहि बजा सासुरेक 10 आदमी कें बजाएब. नबोनारायण जी किएक पाछा रहताह ओहो एलाह आ कहला हम हिनक सँ अपन साढ़ूक हाल-समाचारक बारे मे कम सँ कम 10 बेर रस्ता भरि मे पूछि लेलिअनि लेकिन ई अपने धुनि मे लागल छथि. जखन कि हम साल मे मात्र दूइये बेर होली आ दीयाबाती मे साढ़ूक हाल समाचार पुछैत छिअनि. हम नबोनारायण जी कें कहलियनि जे अहाँक साढ़ू हमर ग्रामीण छथि ओ होली भरि की-की करतूत करता तखन ने हम अहाँ कें होलीक बाद कहब, अखने किएक अपस्याँत भऽ रहल छी!

ओम्हर सँ भारती जी चुप्पे-चाप कहलथि सर आब अपने सब हावड़ा चलू, एहि बेर चौधरी जी फेरो लोकसभाक टिकट पर ठाढ़ भऽ रहल छथि से कहलनि अछि अहाँ कें एहिठाम लइये कऽ आबए लेल. फेर हमहीं एलेक्शन एजेंट बनबै ने हुनकर. हम पूछलियनि एहि बेर कोन पार्टी वा झंडा  लऽ कऽ ठाढ़ भऽ रहल छथि। भारती जी कहलनि जे एहि बेर बिना झंडे कें ठाढ़ हेताह, ने कोनो पार्टी रहतै आ ने कोनो छापक झंडा. जतेक नोटा भोंट भेटतै हुनके खाता मे जेतैक. बेसी भोंट भेटला पर ओ चुनाव आयोग कें कहि प्रधानमंत्री सीटक लेल सेहो दाबा करता. कारण मोदीजीक कतबो चलती छैक तऽ हुनका पार्टी सँ कतेको लोक ठाढ़ हेतैक आ ई एक मात्र लोक छथि जिनका पूरा देशक नोटाक भोंटक लाभ भेटतनि. 

हम सोचलहुँ आइ किनकर मुँह देखि कऽ उठलहुँ पता नहि. भरि दिन किछु ने किछु अनावश्यक होइते रहल. ताबत हावड़ा सँ घरक ऑफिस मे पहुँच गेल रही. देखलहुँ कनियाँ के एम्हरे आबि रहल छलीह. हम कहलियनि जे यै आइ की हम अहाँक मुँह देखि कऽ उठल छलहुँ की? कनियाँ जवाब देली से किएक! हम कहलियनि आइ भरि दिन कोनो नव तरहक हमरा संगे घटना घटैत रहल अछि, तें पुछलहुँ अछि. कनियाँ जवाब देलनि जे आइ तँ हम राति मे उपरका घर मे सुतल छलहुं तऽ अहाँ हमर मुँह देखब कोना? हम आब चुप्पे रहब उचित बुझलहुँ आ भोजनक पश्चात् फेर अपन ओछाइन पकड़लहुँ ई कामना करैत जे फेर दोसर दिन एहन नहि आबय! 

— लखनपति झा

लेखक मिथिला दर्शन'क सहयोगी संपादक छथि आ कविता लेखन-पाठन मे विशेष रुचि देखबैत छथि.

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