विद्यापति गीत: के' पतिआ लए जाएत रे


के' पतिआ लए जाएत रे
मोरा पिअतम पास
हिय नहि सहए असह दुख रे 
भेल साओन मास

एकसरि भवन पिआ बिनु रे
मोहि रहल न जाए
सखि अनकर दुख दारुन रे
जग के' पतिआए

मोर मन हरि हरि लए गेल रे
अपनेहुं मने गेल
गोकुल तेजि मधुपुर बस रे
कत अपजस लेल

विद्यापति कवि गाओल रे
धनि धरु मन आस
आओत तोर मनभाओन रे
एहि कातिक मास

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विद्यापति गीत: के' पतिआ लए जाएत रे - भावार्थ देखू 

एहि गीतक माध्यम सं महाकवि विद्यापति राधा केर विरह वर्णन केलनि अछि. कृष्ण गोकुल सं मथुरा चलि गेल रहैत छथि. एहन समय मे राधा अपन हालचाल कृष्ण धरि पहुंचेबाक लेल कोनो समदिया कें तकैत रहैत छथि. गीत मे राधा कहैत छथि जे हमर चिट्ठी हमरा प्रियतम लग के' लए जाएत! एहि साओन मास हमर हिरदए कृष्ण वियोग नहि सहि सकत. प्रियतम बिना असगर एहि भवन मे हमरा रहल नहि जाएत. 

राधा अपन सखी कें संबोधित करैत कहैत छथि जे अनकर दुख एहि दुनिया मे केओ नै पतियाइत अछि. प्रियतम हमर मोन हरण कइए लेलनि संगहि अपनो मोन लेने चलि गेलाह. राधा गोकुल छोड़ि मथुरा मे निवास करैत काल कृष्ण कें जे अपजस भ' रहल छनि, तकर चिंता सेहो करैत छथि. कवि विद्यापति जे कि एतय सखी रूप मे छथि राधा कें भरोस देइत छथि जे प्रियतम एही कातिक मास मे अओताह!

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रजनी पल्लवी केर स्वर मे सुनू - के' पतिआ लए जाएत रे


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