मिथिला संस्कृति अनुपम, राखी पागक मान : डॉ बीरबल झा - मिथिमीडिया
मिथिला संस्कृति अनुपम, राखी पागक मान : डॉ बीरबल झा

मिथिला संस्कृति अनुपम, राखी पागक मान : डॉ बीरबल झा

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दिन प्रतिदिन भारी संख्या मे मिथिला सँ मैथिलक पलायन भ' रहल अछि. ई पलायन सुखे नहि, अपितु दुखे! मिथिला मे उद्योग धंधाक अभाव अछि.  एहि कारण सँ प्रतिवर्ष हजारक हजार संख्या मे लोक घर-द्वारि छोड़ि शहरक रुखि क' लैत छथि. ओ दिल्ली होइ कि मुंबई आकि देशक आओर कोनो कोन!

एहि बीच यादि अबैत अछि मिथिलाक पराती जाहि मे एकटा पत्नी अप्पन पति सँ आह्लादित स्वर मे गाबि क' कहैत छथिन - भोर भेलै हे पिया भिनुसरबा भेलै हे! उठू हे पिया पलंगिया तेजि कोइलिया बोलै हे!! संगहि यादि अबैत अछि दादा-दादीक पराती - कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ...

मिथिला मे सम्पूर्ण कार्य परंपरागत अनुराग सँ सम्पादित होइत अछि. एहि ठाम जन्म सँ मरण धरिक सभ संस्कारक आ सभ पाबनि लेल गीत होइत अछि. जन्मक समय सोहर गीत -  मिथिला कें कनक अटरिया जे चम चम चमकै रे, ललना रे ताहि बीच बबुआ जनम लेल महलिया उठे सोहर रे!



खेलौना गीत - भैया सुन्दर छथिन मोर, भौजी हमर गोर भेली हे, भौजी हे केलहुं अहाँ नीक सन काज जे बौआ बड्ड सुन्दर हे! बधैया गीत - कंगन लेब भौजी बौआ के बधाइ!

बच्चा'क तीन वर्ष उम्र मे मुण्डन संस्कार होइत अछि. एहि मे सभ विधिक गीतनाद अति सुहावन लगैत अछि. सभ पाबनि आ सभ संस्कार मे खास क' भगवतीक गोसाओनिक गीत - जय जय भैरबि असुर भयाओनि...सँ ल' क' आओर मांगलिक गीत - मरबा पर बैसल छथिन बरुआ भिखारी बनि क' आदि गीतनाद मंगलकारी होइत अछि. ई थिक मिथिलाक संस्कार!

हमरालोकनि अर्थाभावे दुनिया मे कतहु रही, परंच एहि संस्कार सँ विमुख नहि होइ. उपनयनक हजमाबला गीत मिथिलाक अलाबे कोनो राज्य आ देश मे नहि छैक. जेना गीत - हजमा रे नुहु नुहु कटिहें  बौआ के केस रे, बौआ बड्ड दुलारू रे ना! ई सब गीत मिथिलाक दर्शन थिक, जाहि सँ विमुख भेनाइ हमरा लोकनि लेल उचित नहि होएत आ नहि भ' सकैत छी!

मिथिला मे विवाह संस्कार आ गीतक अलगे आनन्द छैक. आ गीत मे गौरीक तँ विशेष अछि! मिथिला मे कहल जाइत छैक जे विवाह सँ विधे भारी! परिछनक गीत, चुमाओन गीत, जेना -चुमा दियनु हे ललना के धीरे-धीरे. ओठंगर गीत - चारू दुल्हा आजु बनहेलनि हे...! दुल्हा कें बुद्धि आ ज्ञानक जाँच आ परीक्षण लेल पान खुआओल जाइत अछि. बर अगर परिछन कालक पान नहि खाइत छथि तँ हुनका बुद्धिमान साबित कएल जाइत छनि. कारण जे परिछन कालक पान मे कनिया के ऐंठ सुपारी रहैत छैक.

मिथिला मे सोहाओनक लेल अनेक प्रकारक गीत छैक, जाहि मे किछु गीत जाति वर्गक अनुसार छैक. जेना - झरनी गीत - हाँ ये जी केओ गेल बाजू बंद केओ गेल पटना, केओ गेलै देश कलकतबे जी. विवाह मे लाबा छिड़ियाबै कालक गीत सेहो आनंदकारी आ मांगलिक गीत  छैक. गीत - चारू दुल्हा देत भावरिआ हे, कर सोहत सुपनि भ' ऊरिया हे. सभ पाबनिक आ सभ संस्कारक अलग-अलग गीत मिथिलाक संस्कृतिक दर्शन करबैत अछि.

दुनिया मे मिथिले एकटा एहन क्षेत्र अछि, जाहि ठाम गाइर पढ़बा मे  गीतक प्रयोग कएल जाइत अछि. एहि लेल डहकन गीत अछि. जकरा  सुनैत समधि रोमांचित होइत छथि. विवाहक समय मे बर कें एकटा विशेष परीक्षण लेल गीत गाओल जाइत छैक, जकरा परिछन कहल जाइत अछि. परिछनक एकटा विशेष उद्देश्य होइत छैक जे आजुक संभावित बर कतेक स्वस्थ छथि ताहि लेल हुनक नाक दबाओल जाइत अछि. जाहि संँ पता चलैत छैक जे बर के कोनो स्वांस सम्बन्धी बीमारी तँ नै!


भाषाविद ग्रियर्सन मैथिलीक प्रशंसा करैत लिखलनि - जखन दूटा मैथिलानी आपस मे कोनो रंजिशवश गारि पढ़ै छथिन तँ सूर्यदेव कें साक्षी बना क' अप्पन ह्रदयक व्यथा व्यक्त करैत छथि. आओर ओ दृश्य लगैत अछि जे कोरस मे गीत गाबि रहल छथि. एक पंक्ति याद अबैत अछि...हे उगलाहा नेने जइह...! शायद पलायन कें कारण ई विस्मरणीय  क्षण कुण्ठित क' रहल अछि.

अखनो यादि आबि रहल अछि दादा-दादीक पराती, छोटकी काकीक आँचर मे दीया राखि तुलसी चौराक पूजन गीत, जकरा सांझुका गीत सेहो कहल जाइत अछि. कोना बिसरबैक लाल भैया, नुनु काका एवं हुनक टोलिक संध्या वंदन, भजन कीर्तन खूब यादि अबैत अछि. झालिक़ झनझनाहटि, हारमोनियमक कर्णप्रिये ध्वनि एवं ढोलकक थाप!

मिथिला अपना आप मे एकटा दर्शन अछि. ई एक गोट जीवनक शैली अछि, जाहि ठाम विपन्नता मे सम्पन्नताक परिचय देल जाइत अछि. जँ  दुनिया मे ख़ुशीक विश्लेषण कएल जाए तँ मिथिला संस्कृतिक स्थान नम्बर वन रहत! हम कतहु रही, टोली बना क' रही आओर अप्पन संस्कृतिक रक्षा लेल अप्पन जीवनशैली सँ एकरा जोड़ने रही. एहि सँ मिथिला संस्कृति कें जीवनता प्रदान होएत संगहि विशेष अनुष्ठान जेना - विवाह, उपनयन, मुंडन आदि मे मिथिला पद्धतिक जरूर अनुकरण करी!

जाहिर अछि  अप्पन रोजी-रोटी लेल मिथिला सँ  बाहर रहनाइ शायद  मज़बूरी अछि. आओर एहि मज़बूरी कें दूर केनाइ अपना हाथ मे तत्काल नहि अछि. परञ्च अपना संस्कृति कें बचेनाइ अपने हाथ मे अछि!

मिथिला संस्कृतिक प्रतीक अछि पाग. देश मे रही आकि विदेश, पाग हर घर मे होएबाक चाही. मिथिला क्षेत्रक बाहर पागक प्रयोग सँ कौतुहलता बढ़तैक. मिथिला संस्कृतिक प्रति आकर्षण हेतैक. नव पीढ़ी मे संचार हेतैक आओर एहि सँ मिथिला कें बल भेटतैक. जहिना गाम घर मे नओत -पेहान देल जाइत छैक ओहि परंपरा कें शहर मे सेहो चिर स्थायी बनाओल जेबाक चाही। अगिला बेर नओत मे नहि बिसरब हमरा! 

— डॉ बीरबल झा

बीरबल बाबू ब्रिटिश लिंग्वा केर प्रबंध निदेशक, मिथिलालोक  फाउंडेशन केर चेयरमैन ओ सुपरिचित साहित्यिक छथि.

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