साहित्यकार कें एक्टिविस्ट बनब जरूरी नै, आजुक जरूरति अछि: दिलीप - मिथिमीडिया
साहित्यकार कें एक्टिविस्ट बनब जरूरी नै, आजुक जरूरति अछि: दिलीप

साहित्यकार कें एक्टिविस्ट बनब जरूरी नै, आजुक जरूरति अछि: दिलीप

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चर्चित कवि, उपन्यासकार, संपादक, एक्टिविस्ट ओ शिक्षक दिलीप कुमार झा एखन अपन कृति 'दू धाप आगाँ' कें ल' पाठकक सिनेह कें एन्जॉय क' रहल छथि. एकर दोसर संस्करण प्रकाशनक बाट पर छै. मैथिली भाषा-साहित्य सं जुड़ल विभिन्न बिंदु पर हुनका सं मिथिमीडिया लेल बातचीत केलनि अछि रूपेश त्योंथ.
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अपनेक उपन्यास 'दू धाप आगां' बेस चर्चा मे रहल अछि, ताहि लेल बधाइ! अपन छात्र जीवनक विषय मे किछु जनतब दी, कोना राजनीति शास्त्र पढ़ैत साहित्य दिस रुझान भेल?
धन्यवाद रूपेशजी! साहित्यक लुतुक हमरा काशी मे ध' लेलक. इन्टरमीडिएट स्तर पर हमर तीनटा साहित्य बिषय रहल अछि- संस्कृत, हिन्दी आओर अंग्रेजी. स्नातक सँ हम राजनीति विज्ञानक छात्र भ' गेलहुं. हम वास्तव मे राजनीति मे जाए चाहैत रही आ छात्रजीवन मे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे छात्र राजनीति मे सक्रिय रही, से सृजनात्मक स्तर पर. काशीस्थ बहुत पुरान संस्था मैथिल छात्र संघक पदाधिकारी सेहो रही.  एकटा  राष्ट्रीय छात्र संगठनक बीएचयू जिला इकाइक सचिव सेहो रही. ओतय ताहि समय मे छात्रसंघ भंग रहै, हम सभ छात्रसंघ बहाली, सत्र नियमितीकरणक लेल बड़का आन्दोलनक नेतृत्व कयने छी. हमर किछु मित्र मे सँ छलाह आनन्द प्रधान (पछाति बीएचयू छात्रसंघक अध्यक्ष), अफलातुन देसाइ, सुभाष गताड़े, उज्ज्वल रंजन झा, देवानन्द सिंह, ओमप्रकाश सिंह. शिक्षा पूरा केलाक बाद हम अपन गाम घुरि अयलहुं. नौकरी नै करबाक इच्छा रहितो पारिवारिक हालत कें देखैत नौकरी करबाक निर्णय लेलहुं आ सिविल सेवाक तैयारी मे लागि गेलहुं मुदा ताही बीच हमरा लोक सेवा आयोग द्वारा शिक्षक पद पर बहाली भ' गेल. हम नहियो चाहैत,नौकरी करय लगलहुं. हमर पदस्थापन नेपाल सीमा पर मधवापुर मे भेल. सोचि सकै छी, अस्सी चौराहाक लोक मधवापुर सन जगह मे कोना समय बितबैत होएत! साहित्ये संबल बनल. खूब साहित्य पढ़बाक अवसर भेटल. ओएह एकान्तवास हमरा मे कविताक बीज भरि देलक.

आरंभिक समय मे कोनो रचनाकार कें प्रोत्साहन, अवसर, मंच आदिक जरूरति होइ छै, तेहन सन कोनो अनुभव शेयर करी?
कहबे केलहुं अछि जे कोना हम साहित्य सागर मे टपान देलहुं. कविता लिखैत-पढ़ैत मधवापुरक एकान्तवास शेष भेल. 1997 मे हमर बदली मध्य विद्यालय रहिका मे भ' गेल. ओतुका वातावरण हमरा मे उर्जा भरि देलक. हम पहिल बेर 1997 मे विद्यापति समारोहक अवसर पर श्री उदयचन्द्र झा विनोद सँ कविता पढ़य देल जयबाक अनुरोध कयलियनि ओ हमर अनुरोध स्वीकार क' कविता पढ़बाक अवसर देलनि. ओहि कवि सम्मेलनक अध्यक्षता  बैद्यनाथ मिश्र यात्री क' रहल छलाह, जिनका पढ़ब हमरा सभ सँ बेसी नीक लगैत छल आ बाबा सँ काशी मे कएबेर भेंट त' रहय मुदा हुनका अध्यक्षता मे कविता पढ़ब से त' सोचनहुं ने रही.  मंच पर पहिल बेर कविता पढबाक अनुभव स्मरण होइए त' आइयो उत्साह सं भरि जाइ छी, नवतुरिए आबओ आगाँ.

लेखन आ क्रियाकलाप दुनू अपने समान रूप सं करैत आबि रहल छी. मैथिली सन भाषा मे एकटा साहित्यिक कें एक्टिविस्ट होएब की जरूरी छियै?
देखियौ, हम छात्र जीवन सँ मैथिलीक एकटा कार्यकर्ता छी. काशी मैथिली भाषा-साहित्यक गढ़ रहल अछि. सीताराम झा, यात्री आ किरणक कर्मभूमि रहल अछि. संविधानक आठम अनुसूची मे मैथिली शामिल हो ताहि लेल गतिविधि खूब चलैत रहैक. हमरा जनैत साहित्यकार कें मजबूरी मे एक्टिविस्ट बनय पड़ैत छैक मुदा बिडम्बना अछि हमर समाजक गैर साहित्यिक लोक जे संवेदना शून्य अछि. भाषा साहित्यक विकास सँ कोनो माने मतलब नै छैक, तेँ साहित्यकार कें एकटा एक्टिविस्ट होब' पड़ैत छै. भाषा कें बचाएब साहित्यकारक पहिल दायित्व छनि, ताहि सं साहित्यक सेहो अस्तित्व अछि. भाषा नहि त' फेर साहित्य कतय? तेँ हम 'पाठशाला मे मैथिली' अभियान चला रहल छी. ई एकबेर इसकूल सब मे लागू भ' जाइ त' चैन सँ साहित्यक काज करब.

भाषा-साहित्य केर जिक्र होइत मधुबनीक नाम अबिते अपनेक छवि अभरैत छै. एहन कोन काज-राज रहल जे ई सुनाम भेल अछि. विशेष क' नव साहित्यिक, नव एक्टिविस्ट लोकनि कें धियान मे रखैत बात राखी.
देखियौ, हमरा मजबूरी मे आबय पड़ल मधुबनीक भाषा साहित्यक गतिविधि मे. हम अनुभव करैत रहलहुँ जे मधुबनी मे मैथिली समाप्त भ' रहल अछि. साहित्यक स्तर पर त' मात्र हिन्दीक गोष्ठी होइत रहय एतय. मैथिलीक स्थिति बड कमजोर. तहन लागल जे जँ मधुबनी सँ मैथिली समाप्त त' फेर मैथिली कतय भेटती? तेँ हम एहि गतिविधि मे शामिल भेलहुं. हम एहि गतिविधि सँ अलग होब' चाहैत छी. फुलटाइम साहित्य लिख' चाहैत छी मुदा कियो निस्सन लोक एकर मोर्चा सम्हारि लेथि तहन ने! एखनुक स्थिति मे हर साहित्यकार केँ भाषाक रक्षार्थ किछु ने किछु साहित्यिक गतिविधि मे योगदान करबाक चाही. मैथिली भाषाक स्तर पर एखन संक्रमणक स्थिति मे अछि.

ग्रामीण अंचलक भ्रमण ओ भाषा-जागरुकता करैत अपने कें देखैत कलकत्ता मे बैसल हर्ष होइए. कतहु अपनेक नाओ संग जनकवि लिखल देखने छलहुं. वर्तमान समय मे जनकवि होएबाक की अर्थ भ' सकै छै?
गाम देहात मे अपना लोकक संग, जकरा लेल किछु लिखैत छी, किछु समय बितायब हमरा लेल आनन्दक क्षण अछि. अहाँ देखने हेबै हम ओहनो लोक कें कविता सुनबै छी जे कहियो साहित्य नहि पढने, सुनने अछि. नेना लोकनि मे अपन मातृभाषाक प्रति अभिरुचिक जाँच सेहो एकटा बात रहैत छैक एहि भ्रमण मे. जहांतक जनकविक बात छै, एकर अर्थ विद्वान लोकनि कहताह. जँ एकर अर्थ ई होइत होइ जे जनसामान्यक बात जनभाषा मे लिखि कविता कयनिहार कवि जनकवि कहाबय त' हम अपना केँ जनकवि मानैत छी. हँ हम ई दाबी नहि करैत छी जे हम पैघ कवि छी. हम अपना केँ एकटा बहुत मामूली कवि मानैत छी जे लोकक पीड़ा, भाषा भूमिक संवेदनाक बात लोकक भाषा मे लिखबाक चेष्टा करैत छी. से अपना स'ख सँ करैत छी.

जरूर पढू: मैथिली कें बचेबाक हेतु संघर्ष करय पड़त : किशोरीबाबू

अपनेक पहिल रचना कोन पत्र-पत्रिका मे कहिया प्रकाशित भेल छल? पहिल प्रकाशनक अनुभव केहन रहल से नवतुरिया रचनाकार कें देखैत बताबी.
हमर आलेख सभ बहुत पहिने सँ प्रकाशित होइत रहल अछि. मुदा हमर पहिल कविता रहिका सँ प्रकाशित स्मारिका मे छपल रहय 1998 मे, पलायन आ सामा शीर्षक सँ. आनन्द भेल रहय. मैथिली मे रचना छपबाक स्तर पर स्पेस बड कम छै तेँ  धरफरेबाक बेगरता नहि. काज करैत रही उदबेगक लेल त' सोशल मीडिया छैके!


साल 2011 मे अपनेक पहिल पोथी आएल छल कविता संग्रह 'अरुण स्तम्भ'. साहित्य जगत मे केहन प्रतिक्रिया रहल छल.
अपन पहिल पोथी 'अरुण स्तम्भ' अप्रत्याशित रूप सँ ल' क' चलि आयल रही. हमरा उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहि भेटल. आगाँ काज करबाक उत्सावर्द्धन लेल दूटा कविक नाम पर्याप्त छल. पहिल श्री उदय चन्द्र झा विनोद एहि पोथी पर समीक्षा लिखलनि (एकमात्र) जे घर- बाहर पत्रिका मे छपल. दोसर मैथिलीक वरिष्ठ आ महत्वपूर्ण कवि स्व.हरेकृष्ण झा हमरा डेरा पर बैसि क' दू घंटा धरि एक-एक कविता पर टिप्पणी देलनि. हम एहि सँ बेसी प्रतिक्रियाक उमीद नहि केने रही. पर्याप्त छल! (हिनक दोसर पोथी कविता संग्रह 'बनिजाराक देस मे' छनि)

कविता लिखैत नीक पहिचान भेटल तथापि गद्य दिस डेग बढ़ेबाक की प्रयोजन रहल? ताहू मे उपन्यास सन विधाक चयनक पाछू की उद्देश्य छल से स्पष्ट करी?
कविता लिखब हमरा लेल अनिवार्य अछि, गद्य लिखब मैथिलीक लेल! मिथिलाक जनसमस्या केँ उजागर करबाक लेल जरूरी काज बुझैत छी. तेँ फइल सँ अपना पाठक सँ गप करबाक लेल उपन्यास मे एलहुँ अछि. जेना पहिल उपन्यास पर प्रतिक्रिया अछि, ताहि सँ उत्साहित भेलहुँ अछि, आगाँ एहि पर आओर काज करब.

दू गोट बालिका पर आधारित उपन्यास 'दू धाप आगां' बेस चर्चा बटोरबा मे सफल रहल. समाज सुधार ओ व्यवस्था परिवर्तन कें ल' जे अपील उपन्यास करैत अछि, की ओकर आभास मिथिलाक धरती पर छै आ कि ई कविक औपन्यासिक कल्पना मात्र अछि?
'दू धाप आगाँ' उपन्यासक कथावस्तु मिथिलाक वास्तविक धरातल पर आधारित अछि. चर्चा त' भेल अछि मुदा अपेक्षित नहि. अहाँ लग टटका समस्या सँ सोझां-सोझी करैत कोनो एहन औपन्यासिक कृति नहि अछि जे परिवर्तनक बात करय. एकटा दृष्टान्त प्रस्तुत करबाक चेष्टा कयल अछि. एकर चर्चा मीडिया मे हेबाक चाही. अनुवाद सेहो होयबाक चाही. मैथिलीक मीडिया तेहन नहि छैक तथापि सोशल मीडिया पर एकर चर्चा बहुतो गोटे केलनि अछि. तिनका हम साधुवाद देइत छियनि. फइल सँ चर्चाक माँग करैत अछि ई उपन्यास!


>> मैथिली वीडियो (Maithili Video): मिथिमीडिया यूट्यूब चैनल SUBSCRIBEकरी.

एतेक कम समय मे 'दू धाप आगां' नबका संस्करण मे जा रहल अछि. स्पष्ट अछि जे पाठकक सिनेह भेटल अछि, की आलोचक लोकनि एकरा तहिना स्वागत केलनि अछि?
हँ, पाठक लोकनि एहि पोथी केँ सिनेह देलनि अछि, से गैरपरंपरागत पाठक. वास्तव मे मैथिलीक पाठक साहित्ये जगत तक सीमित छैक. तकरा तोड़बाक चेष्टा केलक अछि ई उपन्यास. तीन मासक भीतर एकर पहिल संस्करण खतम भेल अछि. दोसर संस्करण आबि रहल अछि. रूपेशजी, एकटा गप जानि क' आश्चर्य होयत जे मिथिलाक डेढ़ सय गाम मे (शहर मे रहनिहार नहि) ई पोथी पहुँचल अछि से अररिया, पुरनिया, बेगूसराय, वैशाली सँ मधुबनी धरि, भारतक अनेको नगर-महानगर मे सेहो. एखन धरि विधिवत एकेटा आलोचना एहि पर डा. शिवशंकर श्रीनिवास जीक आयल अछि जे मिथिला दर्शन पत्रिका मे छपल अछि. ओना प्रो. उषा किरण खान, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन, नारायण जी आदि मान्य साहित्यकारक संक्षिप्त टिप्पणी सँ हमर मनोबल बढ़ल अछि. कथाकार अशोक आ मंत्रेश्वर झा फोन पर फइल सँ गप क' हमर उत्साह बढ़ओलनि. सभसँ पैघ जे सैकड़ो पाठकक प्रतिक्रिया फेसबुक, चिट्ठी आदि माध्यम सँ जे भेटल ताहि सँ हम अभिभूत छी.
मैथिली साहित्यिक प्रकाशन-वितरण केर भारी समस्या रहल अछि. दूर-दूर धरि एकर कोनो ठोस समाधानो नै देखबा मे अबैछ. एकटा रचनाकार लेल पोथीक प्रकाशन कतेक कठिनाह ओ ओझराएल काज छी?
प्रकाशन त' एकटा पैघ समस्या छैक मैथिलीक लेल. व्यावसायिक प्रकाशकक मैथिली मे घोर अभाव रहलैक अछि, एखनो छैक तथापि शेखर प्रकाशन पटना प्रकाशनक क्षेत्र मे नीक काज क' रहल छथि, ओ विश्वविद्यालय, संघ आ राज्य लोक सेवा आयोगक पाठ्यक्रम सं सम्बन्धित पोथी छापि क' एकटा पैघ बेगरता कें शान्त क' रहल छथि. उचित मूल्य पर साहित्यिक कृति सेहो छापि रहल छथि. किसुन संकल्पलोक सुपौल  सेहो उत्कृष्ट पोथीक प्रकाशन क' रहल छथि. साहित्यिकी आ नवारंभ सेहो प्रकाशनक क्षेत्र मे महत्वपूर्ण काज क' रहल छथि. टाका ल' क' मैथिली मे पोथी छपनाय सेहो कम महत्वपूर्ण नहि छैक‌ मुदा साहित्यक नाम पर  अरकच बथुआ किछु छापि देब ई साहित्यक अपमान त' अछिये संगहि मैथिली साहित्यक अवमूल्यन सेहो अछि. प्रकाशक लोकनि कें एकटा विश्वसनीयता कायम करबाक चाही जाहि सँ लेखक आ पाठक दूनू कें ओहि प्रकाशन सँ  मोह होइ. लेखक कें छपबाक आ पाठक केँ पढ़बाक. सम्प्रति दूर धरि एहन कियो नहि देखा रहल छथि. उमेद करैत छी आगाँक.

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नवतुरिया सभ हमर साकांक्ष छथि. गद्य विधा मे कमजोर उपस्थिति चिन्तित करैत अछि. हिनका लोकनिक कविता भाषा आ शिल्पक स्तर पर मजगूत भेल अछि मुदा सम्प्रेषन एखनो कमजोर अछि.

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