मैथिली कविता: भैया हमसभ जन-गण-मन छी! - मिथिमीडिया
मैथिली कविता: भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

मैथिली कविता: भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

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ठकि लेलक त' ठकि लेलक
हम ठका-ठका कें थाकल जन छी
भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

केओ धर्म केओ जाति ध' लूटल
केओ भाषा केओ माटि ध' लूटल
केओ क्षेत्र, केओ अगरा-पिछला
हमसभ दलित-ब्राह्मण-हरिजन छी
भैया हमसभ जन-गण-मन छी!
                                                             
केओ मुफ्त राशन सं लूटल
केओ द' मिठ भाषण लूटल
हुनक खेलौना हमर गरीबी
हम त' सभदीना निर्धन छी
भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

प्रजा बेलल्ला कखन की पाबी
तंत्रहि लग ताला आ चाभी
नेता छथि जन-जन पर हाबी
तैयो हम जनता-जनार्दन छी
भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

केकरा देखब आर के' बांचल 
लूटि देश कें सभ मिलि बांटल 
छद्म रूप देखि प्रजातंत्र कें
नोर सं डबडब भरल नयन छी
भैया हमसभ जन-गण-मन छी!

 विजय इस्सर 'वत्स'

विजय इस्सर मैथिलीक सुपरिचित कवि, गीतकार ओ संगीतज्ञ छथि. हिनक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य अछि.


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