आधुनिक मैथिली गद्यक शिखर पुरुष 'हरिमोहन झा' - मिथिमीडिया
आधुनिक मैथिली गद्यक शिखर पुरुष 'हरिमोहन झा'

आधुनिक मैथिली गद्यक शिखर पुरुष 'हरिमोहन झा'

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मैथिली साहित्य जगत मे महाकवि विद्यापतिक बाद सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकार मे हरिमोहन झाक नाम पहिल स्थान पर गानल जाइत अछि. अपन हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली मे सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आ पाखण्ड पर चोट हिनकर रचनाक अन्यतम वैशिष्टय कहल जाइत अछि आ तेँ हिनका मैथिली साहित्यक 'हास्य सम्राट'क उपाधि सेहो देल जाइछ.

हिनक जन्म 18 सितम्बर 1908 ई. केँ वैशाली जिलाक कुमार वाजितपुर गाम मे भेल. हिनक पिता पं. जनार्दन झा 'जनसीदन' मैथिलीक स्वनामधन्य उपन्यासकार आ कथाकारक रूप मे प्रतिष्ठित छथि. 'जनसीदन'क 'निर्दयी सासु', शशिकला, कलियुगी सन्यासी वा बाबा ढकोसलानन्द प्रहसन, पुनर्विवाह, आदि मैथिली साहित्यक अनमोल धरोहर अछि. संस्कृत, बांग्ला, हिन्दी आ मैथिलीक विद्वान पं.जनार्दन झा 'जनसीदन'क पुत्र प्रो. झा मूलतः दर्शनशास्त्रक विद्वान रहथि आ पटना विश्वविद्यालयक दर्शन विभागक अध्यक्ष पदसँ सेवानिवृत भेल छलाह.

हिनक प्रकाशित कृति मे 'कन्यादान' (उपन्यास, 1933), 'द्विरागमन' (उपन्यास 1943), 'प्रणम्य देवता' (कथासंग्रह, 1945), 'रंगशाला' (कथासंग्रह, 1949), 'चर्चरी' (विविध, 1960), 'खट्टर ककाक तरंग' (व्यंग्य, 1948), एकादशी (कथासंग्रह) आदि प्रमुख अछि. हिनका मरणोपरान्त 1985 ई. मे 'जीवन यात्रा' (आत्मकथा, 1984) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ अलंकृत कएल गेलनि.

हरिमोहन बाबूक कथा आ उपन्यास आधुनिक मैथिली गद्य केँ लोकप्रियताक शिखर पर पहुँचओलक. आधुनिक कालक ई सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक मानल जाइत छथि. हिनक 'द्विगारमन' ततेक लोकप्रिय भेल जे दुरगमनिया भार मे अन्य वस्तुक संग साँठय जाय लागल. हरिमोहन झाक रचना बहुतो अमैथिल केँ मैथिली सिखौलक. 

उपन्यास आ कथाक अतिरिक्त एकांकी, प्रहसन, निबंध, कविता आदि आन-आन विधा मे सेहो हरिमोहन बाबूक विलक्षण रचना छनि. हिनक रचना केँ भारतक अनेक भाषा मे अनुदित कएल गेल अछि. डॉ. झा अपन कथाक माध्यमे वेद, पुराण, सांख्य, दर्शन आदिक अनेकानेक रुढ़िवादी सिद्धांत केँ तर्क, जीवनक व्यवहारिकता आ तीक्ष्ण व्यंगवाण सँ ध्वस्त करैत सहजहि भेटैत छथि. 

हिनक कथाक मूल उद्देश्य मनोरंजनक संगहि मैथिल समाज मे व्याप्त रूढ़ि विचारधाराक उद्घाटन करब थिक. 'खट्टरकाकाक तरंग' एकदिस जतय हास्य-विनोदक सृष्टि करैत अछि त' दोसर दिस ओही हास्यवाण सँ रुढ़ि पर जबर्दस्त प्रहारो करैत अछि. हरिमोहन झाक सभ रचना एक पर एक आ कालजयी अछि. एखनो हिनक पोथी मैथिली मे सभ सँ बेसी कीनल आ पढ़ल जाइत अछि. प्रो. डॉ. हरिमोहन झाक निधन 23 फरवरी 1984 ई. केँ भ' गेलनि.

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