मिथिला मे देवीपूजन केर पावनि कें दशमी रूप मे मनाओल जाइत अछि। एहि मे माँ शक्ति केर नौ स्वरूप केर आराधना होइत अछि आ दशम दिन जतरा मनाओल जाइत अछि। एहि तरहें दस दिनक ई पावनि दशमी कहबैत अछि। एहि ठाम माता केर 9 दिव्य स्वरूप केर विषय मे देल गेल अछि।
प्रथम देवी शैलपुत्री: माता केर पहिल स्वरूप
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
देवी शैलपुत्री केर अवतरण पर्वतराज हिमालय केर पुत्री रूप मे भेल छलनि। ओ वृषभ पर विराजमान छथि, हुनक मुखमण्डल पर आधचान सुशोभित छनि। माता हाथ मे त्रिशूल व कमल धारण कएने छथि। भगवती अपनेक समस्त मनोकामना पूर्ण करथि।
द्वितीय देवी ब्रह्मचारिणीः माता केर दोसर स्वरूप
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
देवी ब्रह्माचारिणी तप लेल जानल जाइत छथि। भगवान शिव कें पति रूप मे प्राप्त करबाक लेल कठोर तपस्या केलनि। माता श्वेत वस्त्र धारण केने छथि, हाथ मे कमंडल एवं जप केर माला छनि। आदिशक्ति माँ दुर्गा एहि ज्योतिर्मय स्वरूप मे संयम एवं सदाचार कें प्रतिबिम्बित करैत छथि।
तृतीय देवी चन्द्रघंटाः माता केर तेसर स्वरूप
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
देवी चंद्रघंटा केर मुखमंडल पर आधचान छनि। माता कें दसटा हाथ छनि आ ओ सिंह पर सवार छथि। माता केर ई स्वरूप सदा युद्ध लेल त्तपर रहैत अछि। तेसरे दिन, देवी चंद्रघंटा केर आराधना सँ शत्रु दमन होइत अछि। भक्त माता सँ निर्भयता, शान्ति आ समभाव प्राप्ति केर कामना करैत छथि।
चतुर्थ देवी कूष्माण्डाः माता केर चारिम स्वरूप
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
अष्टभुजा देवी कूष्माण्डा आदिशक्ति केर स्वरूप छथि। ओ सृष्टि केर रचयिता छथि जे अन्हार सँ इजोत दिस जएबाक आशीष देइत छथि। माँ दुर्गा केर एहि स्वरूप मे एक हाथ मे अमृत कलश छनि, ओतहि दोसर हाथ मे रक्त सँ भरल घैत छनि। माता केर एहि स्वरूपक पूजन सँ भक्त लोकनि कें शोक आ रोग सँ मुक्ति भेटैत छनि। संगहि सृष्टि मे निहित परमब्रह्म धरिक दुर्लभ ज्ञान कें जाग्रत करबाक इजोत भेटैत छनि।
