लक्ष्मीनाथ गोसाँइ एकटा बहुभाषी बहुलार्थी कवि


लक्ष्मीनाथ गोसाँइ एकटा साधक, संत रूप मे विख्यात भेलाह। ताहि रूपें बाबाजी लक्ष्मीनाथ मिथिलाक गाम-गाम मे सर्वमान्य छथि। ई सर्वमान्यता हुनक कवि स्वरूप कें कनेक बिसरा देल गेल। इहो सत्य जे हुनक बनाओल भजन आइयो मिथिलाक गामेगाम खूब प्रचलित छै। विद्यापतिक बाद साइते कोनो कवि कें ई सौभाग्य भेटल जे ओ सभटा संस्कार मे अपन कविताक मादे उपस्थित होथि। तथापि हिनक कविताक आलोचनात्मक पक्ष पर, कविताक स्वभाविक मूल्यांकन सभ पर लोक सबहक ध्यान एखनो नहि गेल अछि। कवि लक्ष्मीनाथ जे कतेको भजन मे, गीत मे एकटा प्रगतिशील मानुस विवेक ठाढ़ करबाक गप्प करैत छथि, ताहि पर कोनो काज नहि कऽ हमरा लोकनि हुनकर भजन केर कीर्तन मे लीन रहलहुँ। ओना ई भजन-कीर्तन सेहो हमर समाजक लोकपक्ष छी जाहि पर धियान देब आवश्यक अछि। 

मिथिलाक समाज कविपूजक अछि, कोनो कविक एहन पूजा आन ठाम प्रायः नहिए देखाओत। दक्षिण भारतक किछु कवि कें अपवाद मानल जाए तखन। तथापि तुलनात्मक रूपें मूल्याकन करी तऽ जे स्थान संत तिरुवलुत्वर, वा वसबन्ना वा अल्लमप्रभुदेवक दक्षिण भारतीय राज्य मे अछि ताहि सँ कम उपस्थिति लक्ष्मीनाथ गोसाँइ केर नहि। जओ तथ्य आ सामाजिक मान्यता कें एक जग्गह पर राखल जाए तऽ मिथिलाक कोनो क्षेत्र मे बारहो वर्ण आ सभ संप्रदाय मे लक्ष्मीनाथ लेल अथाह सिनेह आ भक्ति सेहो छनि। बनगाँव केर बाबाजीकुटी पर ब्राह्मणेटा नहि सभ जाति आ धर्मक लोक जाइत छथि। एहने सब स्थिति लक्ष्मीनाथ गोसाँइ केर आनोआन कुटी सभ पर छनि। मुदा बनगामक बगले मे बरियाहीक कोनो मुसलमान व्यक्ति धरि बाबाजीक किरिया नहि खाइत अछि तकर कारण सेहो व्यापक हेतै जाहि पर विचार करबाक बेगरता अछि।

कविपूजक मिथिला समाज मे बाबाजी एकटा उपास्य देव छथि, उपास्य कवि बनेबाक कोनो ब्योंत मिथिलाक आलोचक लोकनि नहि केलनि अछि। हुनक कवि कर्म आ भाषा पर जतेक चर्चा हेबाक चाही से नहि भेल। किछुए महत्त्वपूर्ण विद्वान हिनकर कवि-कर्म पर चर्चा सेहो केलनि।

लक्ष्मीनाथक भाषा पक्ष पर विवेचन बेसी आवश्यक अछि। ब्रजबोली पर सर्वाधिक काज कएनिहार प्रोफेसर शैलेन्द्र मोहन झा ब्रजबोली कें अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान देलनि, मध्यकालीन साहित्य बुझबाक लेल। शैलेन्द्र बाबू लिखैत छथि "ब्रजबोलीक उ‌द्भवविषयक उपर्युक्त विवरण सँ इएह निष्कर्ष निकालल जा सकैछ जे ई बांग्लादि भाषाक संग मैथिलीक क्षेत्रीय समीकरण अछि। एकरा जे मैथिलीक प्रादेशिक प्रयोग कहल गेल अछि ओकर पाछू इएह धारणा छल।" लक्ष्मीनाथ गोसाँइ केर काव्य कें गंभीरतापूर्वक देखलाक पछाति इहो कहि दी तऽ अतिशयोक्ति नहि जे मैथिली आ खड़ी बोली मे लिखित हिनकर पद विशिष्ट तऽ छनि मुदा ई ब्रजबोलीक अंतिम कवि छथि एहि परंपरा मे। जाहि ब्रजबोली कें बांग्ला साहित्यक शीर्ष आचार्य डॉ० सुकुमार सेन मैथिली भाषा सँ उत्पन्न मानैत छथि- "ब्रजबोली मूलतः मैथिली भाषा सँ उत्पन्न भऽ कें बंगाली कवि द्वारा भाषा एवं बांग्ला साहित्य केर रस संचार सँ पुष्ट एवं परिवद्धित भेल अछि।"

एहि ब्रजबोली मे विकास यात्रा अछि। लक्ष्मीनाथ ताहि विकास यात्रा मे अपन अनुपम पद गढ़लनि। मैथिली मिश्रित साधुभाषा सेहो हिनकर पद लेल विद्वान लोकनि चिन्हित केलाह। लक्ष्मीनाथ पर सर्वाधिक काज केनिहार पं० छेदी झा द्विजवर 'विवेक पंचरत्न' केर भूमिका मे लिखैत छथि- "स्वामीजीक कविताक भाषा शुद्ध ब्रजभाषा नहि, मैथिली मिश्रित साधुभाषा अछि। अपनेक लिखल किछु महेशवानी शुद्ध मैथिलीमे अछि।"

द्विजवर जी 1959 मे "गोस्वामी लक्ष्मीनाथ परमहंस की वृहत् जीवनी" सेहो लिखलनि। 1960 में गीतावलीक संपादन कएलनि। गोसाँइजी पर सर्वांगपूर्ण शोधपरक काज करबाक श्रेय डॉ० ललितेश्वर झा कें छनि। हिनकर लिखल ग्रंथ हिन्दी मे छनि जाहि मे "मैथिली का कृष्ण-काव्य एक अध्ययन" आ गोस्वामी लक्ष्मीनाथ की पदावली"। ई दुनू ग्रंथ लक्ष्मीनाथक काव्य वैशिष्ट्य सँ हिन्दी वा मैथिली समाज कें पूर्ण परिचय कराओल गेल। मैथिली साहित्यक इतिहास ग्रंथ सभ मे सेहो गोसाँइ जीक परिचय भेटैत अछि। 1955 मे प्रो० कामेश्वर शर्मा "हिन्दी साहित्य को बिहार की देन" प्रथम खण्ड मे लक्ष्मीनाथक परिचय करओलनि। शिवपूजन सहाय जी "हिन्दी साहित्य और बिहार" शीर्षक सँ एकटा ग्रंथ संपादित कएलनि जे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद सँ 1960 मे छपल। एकर प्रथम खण्ड 1960 आ दोसर खण्ड 1963 मे गोसाँइ जीक नीक परिचय प्रस्तुत कएल गेल अछि। श्री कामेश्वर चौधरी 'कलाकार' 1960  मे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ पर पटना विश्वविद्यालय सँ शोधकार्य केलनि जिनकर निदेशक छलाह-आचार्य नलिन विलोचन शर्मा। ई लक्ष्मीनाथ गोसाँइ पर भेल पहिल शोध कार्य थिक।

गोसाँइ जी प्रथमतः आ अंततः कवि छथि। एकटा एहन कवि जिनकर गीत लोककंठ मे उतरल अछि। हिनकर कविताक भाषा पर विचार करैत कहल जा सकैछ जे जयदेव आ विद्यापतिक परंपरा मे लक्ष्मीनाथ अबैत छथि।

लक्ष्मीनाथक कविता ओहि सभ परंपराक विस्तार थिक जाहि मे गीत गोविन्द आ विद्यापति पदावली लिखल गेल। तथापि मैथिली आलोचना आ साहित्य मे लक्ष्मीनाथ मूल्यांकन नीक सँ नहि भेल। हिनकर भाषाक कारणें विद्वान लोकनिक कहब छलनि जे मैथिलीक अपेक्षा ब्रजभाषा आ अवधीक निकटता लक्ष्मीनाथक भाषा संग छनि। मैथिलीक विद्वान लोकनिक धियान हिनकर भाषा पर जेबाक चाही। लक्ष्मीनाथ मैथिली साहित्यक सूरदास छथि। ब्रजभाषा ब्रजबोली सँ निर्मित जे कृष्ण काव्यक परंपरा छै ताहि संदर्भ मे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ केर मूल्यांकन हेबाक चाही। कृष्णभक्ति काव्य-परंपरा, हिनका पर आओर नीक काज कएल जा सकैछ। डॉ० राम चैतन्य धीरज 'साक्षी लक्ष्मीनाथ' शीर्षक सँ एकटा पुस्तिका हिनका पर बहार कएलनि आ अरविन्द मिश्र 'नीरज' लक्ष्मीनाथ पर महाकाव्य लिखलनि अछि।

साहित्य आलोचना मे कतेको बेर मूल्यांकन संबंधी समस्या अबैत अछि। ताहि समस्या पर समधानि कऽ विचार देबाक चाही। लक्ष्मीनाथ गोसाँइ हमर भाषाक जरूरी कवि छथि, जिनकर साहित्य आ भाषा पर विद्वान लोकनि कें पुनर्विचार करबाक आवश्यकता अछि। मैथिली साहित्यक आलोचनाक पद्धति नीक सँ निर्मित नहि भेल अछि। मैथिली मे साहित्यिक आलोचनाक वैज्ञानिक प्रवृत्तिक आ समाजशास्त्रीय पद्धति दुनूक अभाव रहल अछि। एहि दुनू पद्धति सँ लक्ष्मीनाथ गोसाँइ केर बहुलतावादी दृष्टि पर नजरि देबाक आइ जरूरति अछि। हिनक बहुभाषी आ बहुलार्थी व्यक्तित्त्व आ कविकर्म मात्र पूजा आ उपासनाक वस्तु नहि बनि जाए, ताहि पक्ष सेहो समग्रता मे विचार हेबाक चाही। लक्ष्मीनाथ कें साहित्य मे पहिल बेर हिन्दी मे मिश्रबंधु लोकनि चिन्हलनि।'

साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा मैथिली मे लक्ष्मीनाथ गोसाँइ पर एकटा मोनोग्राफ प्रकाशित भेल। गोसाँइ जी हिन्दी मे डॉ० रमाकान्त झा अपन शोध ग्रंथ प्रकाशित कएलनि।'

लक्ष्मीनाथ गोसाँइ एकटा बहुभाषी कवि छथि। ओ हिन्दीक खड़ी बोली मे लिखलनि। ओ ब्रजभाषा मिश्रित मैथिली मे पद रचना कएलनि। ओ मैथिलीक खाँटी शब्दावलीक प्रयोग करैत लिखलनि। अवधी मे सेहो लिखलनि। एकटा समग्र संपूर्ण कवि जे अपन बहुलार्थ तत्त्वक प्रधानताक कारण सर्वस्वीकृत भेलाह। मिथिलाक लोकदेव रूप मे हिनक पहिचान भेल। एकटा साधक एकटा संत जे मिथिला मे सर्वपूजित भेलाह से छथि लक्ष्मीनाथ गोसाँइ। मैथिली आलोचना कें गोसाँइ जी पर सम्रगता मे विचार करबाक आवश्यकता अछि।

सन्दर्भ संकेतः
1. डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा ब्रजबोली साहित्य पृ.-16, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना-सं. 1988
2. डॉ. सुकुमार सेन - बंगाली साहित्य परिषद पत्रिका अक-3. प्र०-147
3. विवेक पंचरत्न, संपादक- पं. छेदी झा द्विजकर, द्वितीय संस्करणक भूमिका
4. मिश्रबन्धु विनोद चतुर्थ खंड-1934
5. डॉ. रमाकान्त झा - गोस्वामी लक्ष्मीनाथ साधना और सहित्य, 2001, जयभारती प्रकाशन, इलाहाबाद

— डॉ. अरुणाभ सौरभ

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डॉ. अरुणाभ सौरभ मैथिलीक प्रतिष्ठित साहित्यकार छथि। एनसीइआरटी, क्षेत्रीय शिक्षा संस्था, भोपाल मे सहायक प्राध्यापक रूप मे कार्यरत अरुणाभ साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार सहित अनेक सम्मान सँँ विभूषित छथि। मातृभाषा मैथिली सहित हिन्दी मे सेहो समान रूप सँ कलम चला रहल छथि।
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