रामलोचन ठाकुर केर कविता 'गामक खोज'


हमरो एकटा गाम छल
देशक बहुतो गाम सन
एकटा शिव मन्दिर
एकटा डीहबारक थान
एकटा सलहेलक गहबर 
एकटा मसजिद...
कतेको टोल
कतेको जाति-धर्मक संयोग सँ बनल
हमर गाम
हमरा सभक गाम छल

हमरा गाम मे
कोनो वीर दम्पतिक 
शास्त्रालाप नहि भेल छल
नहि भेल छलाह अवतरित
कोनो महापुरूष
आ जहाँधरि प्रश्न अछि
कविशेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुरक
गाम अपरिचित छल

भोरे जाइत चरवाह केर पराती
आ साँझ मे दूर नदी कात सँ
बाध-बोन सं भासल अबैत
चौमासा-बारहमासाक स्वर
आँगन सँ
ढेकी जांतक संगीतक संग
लगनीक स्वर
कहियो सोहर, कहियो समदाओन
कहियो तिरहुत, कहियो मलार
हमर गामक परिचिति छल

बरखा मे विलम्ब देखि
गमैया पूजाक संगोर
जट जटिन खेलबा मे व्यस्त
महिला समाज
तजियाक संग
झरनी पर झुमैत किशोर दल
फगुआक अबीर
आ जूड़शीतलक कादो-माटिक संग
हमर गाम जीबैत छल

कोजागरी पूर्णिमाक राति
नैसर्गिक सौन्दर्यक अवलोकन करैत
पान-मखान चिबओबैत
कौड़ी भँजैत
आ जड़काला मे
घूर तर बैसि तमाकू चुनबैत
महराइ सुनैत सगर राति
हमर गाम जगैत छल

जोतला खेत मे
सामा-चकेबा कें
भाव विह्वल विदा करैत
पुनि अगिला साल एबाक
आमंत्रण देइत हमर गाम 
अगुआइत छल

राति-बिराति
कतहु कोनो आहटि पाबि
लाठी-ठेंगा ल' दौड़ब
कोम्हरो कने इजोत देखि
घैल बाल्टी ल' दौड़ब
ककरो अरथी मे कान्ह देबाक लेल
बाले-बच्चे ढेंगरि जाएब
हमर गामक शक्ति छल

गामक नहि होइतहुँ
कोनो बहिरा देवान जी
वा मास्टर रामशरण महतो
अथवा गुरे जरे खाइ जोग
नीमन दही बेचनिहार
सतहत्तरि बरखक बूढ़
रामलाल गोआर कें अपना लेब
हमर गामक सौजन्य छल

हम ताकि रहल छी ओएह गाम
अपन गाम...