महासंकटक एहि विकलांग दौर मे मोन पड़ैत छथि ‘अष्टावक्र’


छोट-छोट समस्या, बाधा, अवरोध आदि अबिते हम सब विचलित होमए लगैत छी. सामान्य मनुक्ख एहिना करैत अछि. एखन समूचा विश्व कोरोना महामारी सं त्रस्त अछि. ई संकट छोट नहि अछि, हम सब एहि सं जूझि रहल छी. घोर दुखक स्थिति मे लोक पहिने निराश आ फेर हताश भ’ जाइछ. आशा सं संसार चलै छै आ से जखन टूटैत छै त’ सब किछु छिरिया जाइत छै. मिथिला छिरियाएल वस्तु कें समेटबाक पर्याय रूप मे जानल जाइछ. एहि ठाम एकटा प्रचलित प्रसंग मानस पर अबैत अछि, जखन मिथिलाक राजा एकहकटा अन्न स्वयं बीछैत देखल गेल छलाह. आशाक बून्न-बून्न समेटब आ हरखक ओरियान मे लागब हमरा लोकनिक सहज स्वभाव रहल अछि.
   
लोक साहित्य पर एकटा फेसबुक लाइव सेशन मे तारानन्द वियोगी अपन विचार राखि रहल छलाह. हुनक कहबाक अभिप्राय यएह छलनि जे हम सब उपरे-उपर करैत रहैत छी, संस्कृतिक त’ह मे बड़-बड़ गुण, बड़-बड़ बात सब छै...ओकरा ठीक सं बुझल जाएब एखनो शेष अछि! सत्ते मिथिलाक संस्कृति जीवन कें पोषित करैत अछि, खनहन करैत अछि. एहि घोर निराशाक समय मे जखन हम सब विकलांग दौर सं गुजरि रहल छी. घर-घर हाथ-पाएर समेटि बैसल छी. एहना मे हमरा अष्टावक्र मोन पड़ैत छथि! 

मिथिलाक ज्ञान परम्परा मे अष्टावक्रक एकटा निजगुत स्थान छनि. हुनक स्मरण मात्र सं केहनो अपतकाल मे लड़बाक शक्ति अर्जित कएल जा सकैत अछि. एहि कठिन समय मे हम मिथिलाक एहि मनीषीक किछु प्रसंग एहि ठाम शेयर करब जे रोचक त’ अछिए, संगहि सोचबाक एकटा नव एंगल सेहो फोलैत अछि.
  
अद्वैत वेदान्त केर महत्वपूर्ण ग्रन्थ 'अष्टावक्र गीता'क रचयिता ऋषि अष्टावक्र केर शरीर आठ ठाम सं टेढ़ छलनि. असल मे हिनक नामकरण केर आधार हिनक एहन विचित्र विकलांगता छल. एतेक शारीरिक विकृतिक बादो ई अपन प्रतिभाक बल पर जग समादृत विद्वान बनलाह. जखन ई गर्भ मे छलाह त' अपन पिताक कोप-भाजन बनलाह आ शापित शरीरक संग जन्म धारण केलनि.

पिता गर्भहि मे किए देलनि सराप?
बेस रोचक किन्तु आश्चर्यजनक प्रसंग अछि ई. उद्दालक ऋषि कें अपन शिष्य कहोड़ केर प्रतिभा सं बेस प्रसन्नता छलनि. कहोड़ जखन सम्पूर्ण वेदक ज्ञान हासिल करबा मे सफल भेलाह त' ओ अपन रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता केर विवाह अपन प्रिय शिष्य कहोड़ सं करा देलनि. समय बीतल आ कहोड़क पत्नी गर्भवती भेलीह. किछु मास उपरान्त कोनो दिन कहोड़ अपन गर्भवती पत्नी लग वेदपाठ क' रहल छलाह. तखने सुजाता केर गर्भस्थ बालक बाजि उठल– ‘अहां वेदक गलत पाठ क' रहल छी.’

कहोड़ बेस गौर केलनि जे बीच-बीच मे के' एना टोकैत अछि, ओ पित्ते लाल भेल गेलाह. जखन निजगुत भेलाह जे केओ आओर नै, सुजाताक गर्भस्थ शिशु वेदपाठ मे अवरोधक बनि रहल अछि, हुनक तामस आओर बढि गेलनि. जे गर्भहि सं पिताक सोझां एहन दुस्साहस क’ रहल अछि ओ बाद मे की करत! कहोड़ कुपित भ’ सराप द' बैसलाह. अपनहि पुत्र कें सराप देइत कहोड़ बजलाह– ‘गर्भहि सं तोहर बुधि वक्र छौ आ तों हमरा अपमानित करबाक साहस केलह अछि, तू आठ स्थान सं वक्र देह नेने जन्म धारण करबह.’

एहि घटनाक कुछ दिन बाद कहोड़ मिथिलाक राजा जनकक दरबार मे बंदी नामक एक पंडित सं शास्त्रार्थ करबाक लेल गेलाह. ओतय हुनका पराजित होमए पड़लनि. शास्त्रार्थ केर जे नियम छल, ओहि अनुसार कहोड़ कें जल-समाधि लेबए पड़लनि. एहि घटनाक बादे अष्टावक्र केर जन्म होइत अछि.

अपन नाना कें बुझैत रहलाह पिता, फेर एक दिन... 
बालक अष्टावक्र जन्मक बादे सं पिता-प्रेम सं वंचित भ' गेल छलाह. एहना मे ओ अपन नाना उद्दालक कें पिता आ मामा श्वेतकेतु कें बड़का भाइ बुझैत रहलाह. एक दिन हुनक मामा हुनका बुझएबा मे सफल रहलाह जे ओ जिनका पिता बुझैत छथि से हुनक नाना छथि आ हुनक पिता घटनाक शिकार भेल छथि. बालक अष्टावक्र केर तन्नुक हृदय पर एहि यथार्थ सं बेस चोट लगलनि. ओ अपन माय सं पिता कें ल' सम्पूर्ण बातक जिज्ञासा केलनि आ मामा संग मिथिलाक राजदरबार दिस विदा भ' गेलाह.

अष्टावक्र बंदी सं शास्त्रार्थ करबाक लेल सोझे राजा जनकक यज्ञशाला मे पहुंचलाह. द्वारपाल लोकनि जखन हुनका नेना बूझि रोकबाक चेष्टा केलनि त' अष्टावक्र तर्क देलनि जे पाकल केश आ उम्र भेने केओ काबिल नै भ' जाइछ. जकरा वेदक ज्ञान हो, जे बुद्धिमान हो, वएह पैघ होइछ. हुनक उमेर कें नै देखैत हुनक ज्ञान कें सम्मान करैत राजा समक्ष हुनका जाए देल जेबाक चाही. एकर बाद ओ राजा जनक केर सभा मे प्रवेश पबैत छथि आ बंदी कें शास्त्रार्थ लेल ललकारैत छथि. मुदा नान्हिटा बालक अष्टावक्र कें देखि सभासद लोकनि जोर-जोर से हंसए लगैत छथि.

अपन पांडित्य सं सब कें केलनि मुग्ध
अष्टावक्र कें देखि सभासद लोकनि लगातार हंसि रहल छलाह. हुनका लोकनिक हंसी रुकबाक नाओ नै ल’ रहल छल. असल में आठ ठाम सं टेढ़ अष्टावक्र कें चलैत देखि ककरो हंसी छूटि सकैत छल. सब कें हंसैत देखि अष्टावक्र सेहो हंसब शुरू केलनि. ओ अपन विकलांगता कें अपन कमजोरी कहियो नै बुझलनि आ एहन व्यवहार कें सहज लेइत रहलाह. सभासद अष्टावक्र कें देखि हंसि रहल छलाह आ अष्टावक्र सभासद सब कें हंसैत देखि हंसि रहल छलाह. राजा जनक सेहो अपन हंसी रोकि नै सकलाह. बड़ा विचित्र दृश्य भ’ गेल छल. एहन स्थिति मे राजा जनक अष्टावक्र सं पूछैत छथि– बौआ! सभासद सब जे हंसैत छथि, तकर अर्थ त’ लगैत अछि, मुदा अहां किए हंसि रहल छी?

मात्र बारह वर्षक बालक अष्टावक्र राजा जनक कें जे जवाब देलनि से सब कें सोचबा लेल मजबूर क’ देलक. पूरा सभाकक्ष एकदम शांत भ’ गेल. अष्टावक्र कहलनि– ‘हमर हाड़-मांस केर वक्रता पर हंसनिहार लोकनिक वक्र-बुद्धि पर हम हंसि रहल छी. ई सब चाम देखि एतेक रास प्रतिक्रिया द’ रहल छथि जाहि सं ई निजगुत होइछ जे ई लोकनि ज्ञानी नै, चामक विपणन केनिहार (चमार) जकां छथि. हिनका लोकनिक मानसिक वक्रता पर हमरा एकरत्ती हंसा गेल, आओर नै किछु!’

बालकक बड़का-बड़का बात पर राजा जनक अपना कें संयमित करैत बजलाह, ‘अगत्ती बालक! तोहर अभिप्राय की छौ?’ अष्टावक्र जवाब देलनि, ‘ई लोकनि चाम चिन्हबा मे माहिर छथि, हिनका नजरि मे ज्ञानक कोनो महत्व नै! मन्दिर जओ टेढ़ छै, तखनो ओतय पूजन होइते छै. घैल फुटने मेघ नै फूटैत छै. मेघ निर्विकार अछि आ ज्ञानी मेघ सदृश निर्विकार होइत छथि. हमारा होइत छल जे मिथिलाक ई सभा ज्ञानी लोकनि सं सज्जित होएत मुदा...!

राजर्षि जनक नेनाक लेलनि परीक्षा
एहि प्रकरणक बाद राजा जनक अष्टावक्र केर स्वयं परीक्षा लेलनि. अष्टावक्र बेस गंभीरता सं हुनक एक-एक प्रश्न कें चकित करएबला जवाब सब देलनि. एहि मध्य बंदी जे हुनक पिता कें शास्त्रार्थ मे पराजित क’ दण्डित केने छल, अष्टावक्रक सोझां नतमस्तक भ’ गेल. बंदी जखन हारि मानि लेलक त’ अष्टावक्र राजा सं निवेदन केलनि जे हुनक पिताक जे गति कएल गेल छल, तेहिना बंदी कें सेहो दण्डित कएल जाए, ओकरो जल-समाधि देल जाए!

बंदी प्रणाम निवेदित करैत अष्टावक्र कें कहैत छथि जे ओ वरुण देवताक पुत्र छथि आ ओ पराजित ब्राह्मण (ज्ञानी) लोकनि कें जल-समाधि द्वारा वरुणलोक पहुंचओलनि अछि, हुनका सब कें आपस बजाओल जाएत. किछु क्षण बाद बालक अष्टावक्र कें पिता कहोड़ सं भेंट होइत छनि, ओ असीम हर्ष सं परिपूर्ण भ’ जाइत छथि.
 
बाद मे पिता हुनका समंगा नदी मे स्नान क’ शारीरिक विकलांगताक शाप मुक्तिक बाट देइत छथि. राजा जनक ज्ञानी त’ छलाह मुदा आत्मज्ञान केर शिक्षा अष्टावक्र सं लेलनि. अष्टावक्र केर कथा हमरा लोकनि कें धैर्यवानक संग-संग गुण-आग्रही बनबाक सीख देइत अछि.

— रूपेश त्योंथ

(प्रस्तुत आलेख 'अनुप्रास' पत्रिका मे प्रकाशित भेल अछि. मिथिमीडिया पाठक हेतु सामग्री साभार लेल गेल अछि.)