रूपेश त्योंथ केर मैथिली कविता 'हे काबिल-कहबैका'


जिनगी पटकत जुआ
  
कखन पटकत के' जनैए 
केओ नै जनैए एकर खेला-बेला 

कनेक गति पबिते 
कूदब जे केने छी शुरू 
से सुनू हे काबिल-कहबैका 
नै भेटत सभतरि एकरंग बाट 
बदलै छै सरूप घाट-घाट 
कखनो हुच्ची, कखनो ढिमकी 
कखनो अबूह होइ छै सहज गतियो 
सम्हार नै रहने होइ छै उनार 
चौपट भ' सकैछ सब बेपार
 
बाटे नै, वाहन सेहो द' सकैए धोखा 
ई जे बेधड़क गुड़केने जा रहल छी चक्का 
से राखब खियाल लुब्रिकेंटक 
जओं गति मे अटकब अचक्के
फेंका जाएब जत्र-कुत्र

तखन शिकाइत नै करबै
ओहि पाछां छूटल संगी-साथी सं
जे चाहियो क' नै पहुंचि सकताह 
अहांक रक्षा करबाक लेल 
इहो धियान राखब जे दैबो 
एहने बेर पर उनटबैत छथि 
पुरना बकियओताक ब'ही  
करैत छथि एक-एक हिसाब 
एक-एक ओसूली
 
तैं हे काबिल-कहबैका
नै कूदू एतेक जे धंसि जाए जमीन
फाटि जाए असमान
नै पार करू रेघा 
नै छोडू सर-समांग
ई जिनगी पटकत जुआ  
कखन पटकत के' जनैए

— रूपेश त्योंथ

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