विजय इस्सर 'वत्स' केर दू गोट टटका मैथिली कविता


(1) 

लिलसा 

हमरा नहि अछि 
लिलसा मुखाग्निक 
आ ने कोनो मतलब 
स्वर्गक भ्रमजाल सं
हमरा लोभ नहि 
श्राद्ध आ तर्पणक
हम जीविते जिनगी 
मरि चुकल छी
देखने छी अपन मृत्यु 
बहुतेक बेर

की हेतै? 
पंचतत्वक मोटरी छिरिया जेतै
आगि मे जरतै, बचल-खुचल 
पानि मे बहाओल जेतै
हवा संग धुआं बनि 
उड़ि जेतै अकास मे
पांचों ज्ञानेन्द्री सं भोगल 
सुख पाओल तृप्ति, सकल अनुभूति 
छाउर बनि फेर सं 
मिलि जेतै माटि मे
मटियामेट भ' जेतै 

ने जानि, हमर ई चोटाह प्राण
कतेक दिन धरि उड़तै 
भसियाइत रहतै हवा-बसात मे
आकि बनि माटि रहतै नदी-कात मे
जओ माटि बनै, बस फूले उपजै
कांट उपजि ने गरै ककरो गात मे

(2)

मृत्यु धरि

हम किए करब चिंता
ओहि मृत्युक जकरा
जनितो रहै छै सब अनजान
केओ देखियो कहां पबैत छै
जिनगी भरि मृत्यु कें
कहियो कतहु भेलैए
जिनगी सं मृत्यक मिलान!

हम त' अनभिज्ञ छलहुं
अपन जन्महु सं
हमरा कहां सुधि छल
समय आ काल केर 
तैं किए कएल जाए 
चिंता अपन भविष्यक
हम सब खेलौने त' छी 
किछु कालक, तत्कालक

आ एहि तत्कालक 
नाम छै जिनगी
संघर्षक पर्याय ई जिनगी
आरंभहि सं झोंकने रहैछ 
प्राणीमात्र कें संघर्ष मे 
उत्पत्ति लेल संघर्ष 
जनक सं जननी धरि संघर्ष
शुक्राणु सं डिंबस्थ होएबा हेतु 
गर्भहि मे नर-मादा बनबा लेल संघर्ष
अवतरित होएबा लेल संघर्ष
एहि मृत्युभूमि पर जीबाक लेल 
प्रतिपाल, शिक्षा, काजराज 
किछु करबा लेल, आगू बढ़बा लेल संघर्ष
ई संघर्ष चलैछ अनवरत 
जनम भरि, मृत्यु धरि 

 विजय इस्सर 'वत्स'

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