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स्वर वर्तमान

स्वर वर्तमान

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निर्भिकताक एक डेग सं
विजय प्राप्त कयल जा सकैत अछि
दृष्टि-निक्षेप सं  शेरो कें
वश मे कयल जा सकैत अछि
बिलाइ कें देखि जुनि परबा बनू
नहि त' बिलाइ झपटि लेत
बिलाइ शेर बनि गुम्हरैत रहत
आत्मविश्वासक डोर डगमगाय लागत
निराशा कमजोरी अछि
निर्भिकता अछि शक्तिपुंज
अस्तु ! निर्भिक आ आत्मनिर्भर बनू
नव-नव सृजन करैत दू डेग आगा बढ़ू

अछि रूपांतरण मे विद्रोहक बीज
नहि होइत अछि विद्रोहक कोनो अतीत
नहि होइत अछि ओकर कोनो इतिहास
होइत अछि मात्र ओकर वर्तमान
जाहि वर्तमानक बलें
सृजन करैत अछि ओ अपन भविष्य
रचैत अछि नव इतिहास
परिपूर्णता आ स्वतंत्रताक संग
आत्मनिर्भर आ निर्भिक  बनू
कर्म करैत बढैत रहू


— अशोक झा

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