मैथिली रंगमंच: युवा लेखक सब किए नै आबि रहल छथि?


विश्व रंगमंच दिवस - World Theatre Day 

नाटक पर एकटा सेमिनार मे प्रश्न कएल गेल छल जे युवा लेखक सब नाटक दिस किए नै आबि रहल छथि? जवाब हमरे देबाक छल त' हम उन्टे एकाध प्रश्न पूछि अपन वक्तव्य शुरू कएल...

गामेगाम रंगमंच केर परम्परा रहल छै. नेनहि सं पाट लिखब, अभ्यास देखब आदि काजराज मे लागल रहल छी. बाद मे चलि क' पाट खेलबाक सेहो सुअवसर भेल. गामक लोकप्रिय रंगमंच कलाकार ओ लेखक-निर्देशक राजेश चचा केर नाटक 'दारू' (2004) केर सम्पूर्ण प्रक्रिया ओहिना मोन अछि!

कलकत्ता अएला मासे दू मास भेल छल कि मैथिली नाटक देखबाक सुयोग लागल. ओहि सब दिन मे लिखबाक नव तरंग छल. विचारक अम्बार, उत्साह ओ उमंग छल. सालभरि जाइत-जाइत 2-3 गोट नाटक लिखि चुकल छलहुं. ओहि मे सं एकटा नाटकक किछु अंश एक निर्देशक कें पठा विचार मंगने छलहुं. फोनक कोनो सुविधा नै छल, चिट्ठी-पुरजी केर जुग मे जवाब अबैत-अबैत कएक साल बीति गेल. पछाति एकटा स्मारिका मे ओ नाट्य अंश छपल मुदा कलकत्ता रंगमंच लेल धनसन.

अनेक नामी नाटक, अनेक प्रस्तुति देखैत दशक डेढ़ दशक बीति गेल. एकटा सम्पूर्ण पीढ़ी एके रंग अभ्यास एके रंग काज करैत थाकि गेल. रंगमंच मे इंटरेस्ट रखनिहार अनेक युवा कोनो आन बाट तय क' गेल. मुदा कलकत्ता रंगमंच लेल धनसन.

से ओहि सेमिनार मे हमरा बजबाक जे अवसर भेटल से अचक्के किछु बात सब बजा गेल. फेर हमर ओहि 2-3 नाटक केर खोज शुरू भेल. 'कनफुसकी' जें कि एकठाम छपल छल, ओकर पुनर्लेखन सुगमता सं संभव भेल. ओकर मंचन केर प्रस्ताव एकटा नामी रंगमंच संस्था कें देल गेलै. ओहि सब दिन मे तेहन जोरगर संयोग रहलै जे ओ संस्था सदस्य लोकनिक आपसी कलह मे फंसल छल.

कलाकर्म कें धियान मे रखैत नवगठित 'नवआयाम' नाट्य मंचनक काज हाथ मे लेलक. 'कनफुसकी' अपन लिखल गेलाक डेढ़ दशक बाद मंच पर आबि सकल. 'कनफुसकी' केर मंचन कएक अर्थ मे एकटा नव दिशा, नव उत्साह लेने आएल.

ओना एखनहुं ओ प्रश्न ठामहि छै जे युवा लेखक सब आबि नै रहल छथि...

— रूपेश त्योंथ

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