कवि विद्यानंद झा केर चर्चित कविता 'भरदुतिया'


भाइ आ बहिन
एक्के आमक दू कतरा
एक्के गाछक दू ठाढ़ि
एकहि मायक रक्त आ मज्जा सँ
बनलनि जिनकर शरीर
एक्के माय बापक डी एन ए सँ 
बनलनि जिनकर मन प्राण
एक्के माटि मे लोटेला जे सब
एक्के बसातक सिहकी लगलनि जिनका सबकेँ
एक्के बरखाक बुन्न जुड़ौलकन्हिं जिनका
खेलेला एक्के संग कनियाँ पुतरा
खेलनि एक्के संग आमक झक्का
देखलनि एक्के संग खड़होरिक पार
सीटी बजबैत ट्रेनकेँ
हेलला एक्के संग सेमार लागल पोखरि मे
कटलनि जाड़क राति एकेटा फटलाहा सीरक मे जे
भिजलाह चुबैत चार बला एक्के घर मे जे
भोगलन्हिं एक्के संग
कैकटा उत्सव आनंद
कैकटा अभाव अभियोग
लागनि जे एकगोटेँकेँ कुसोक कलेप
चँछा जानि दोसरक भरि मन भरि प्राण
भरि नेनपन मे।

एकटा समय एलै
बसलीह बहिन सासुर
देसनिकाला
बेदख़ली
गेली एहन ठाम लागि जाइत छलनि देसाँस जत'
लगै छलनि बसात 
लगै छलनि बरखा
अनभुआड़ अनचिन्हार
रहै छलीह सासुक कैद मे
ननदिक नजरि मे
सुपुतहु बनबाक चेष्टा मे अपस्याँत।

आर पानि बहलै कमलाजी बाटे
आर कैकटा दाही
आर कैक टा रौदी
बितलै
बितलाह ओ सब।

आब मन मे त' रहिते छलखिन्ह
मुदा जत' रहैत छला भाइ
ओतेक दूर त' समादो ल' जेबा मे
कौओ सब होइत छल नचार
बिसरि जाइत रस्ता
टकराइत अनगिन मोबाइल टावर सँ
नहिं ल' जा पबै छलन्हिं
समाद भाइक एबाक
नहिं कुचरै छल कौआ आब।
जैब कहाँ पार लगैत छलनि आब?
मालिकक चाकर छलाह भाइ
हजारन कोस दूर कोनो ठाम
लागल कोनो गुनधुन मे
पोसैत अपन पेट
जैब कहाँ पार लगैत छलनि आब?

फ़ोन पर लगलनि
पूसक कनकनीक हल्लुके सन आभास
बजलखिन्ह जखन बहिन हल्लो
की भेल?
गुम
मात्र बाझल हिचुकी 
एक क्षणक लेल मात्र
किछुओ त' नहिं
बकौर लागि जाइत छन्हि भाइकेँ
दहो बहो नोर
देखि लैत छनि संगक लोक
आ फेरि लैत अछि मुँह
दोसर दिस
लाजेँ 
बचेबा लेल हुनका एहि
असहज स्थिति सँ।

नीके ना रहब
जुग जुग जीबह
चिन्ता नहिं करब
बौंसै छथि ओ सब
एक्के आमक दू फाँक
एक्के गाछक दू ठाढ़ि
एक दोसराकेँ।

बीतल
आर एकटा
भरदुतिया
बितलाह ओ सब
अपस्याँत अपन अपन
संसार मे
असमर्थ करक लेल किछु
एक दोसराक लेल
नुकौनेँ प्रेम, निछच्छ प्रेम 
एक दोसरा लेल
बितलाह ओ सब।

(मैथिली पत्रिका 'अंतिका' सं साभार)

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