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'जेना गामहि बसै हमर प्राण'

'जेना गामहि बसै हमर प्राण'

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मोनक चिड़ैयाँ उड़ि जा बैसइ 
गाामक अपन दलान 
जेना गामहि बसै हमर प्राण

 जाहि माटि लोटि-लोटि काटल हपकुनियाँ 
गिरि-परि चलब सिखल धय गुरूकुनियाँ 
पवन ओहि आँगन मे कोढ़ फाड़ि कानइ 
सिसकइछ बैसल दलान
जेना गामहि बसइ हमर प्राण

कखनहुँ गाछी तअ कखनो शिसबन्नी 
चौक परक खरचल चोरौका चौवन्नी
चेत कबड्डी नइ करिया झुम्मरि 
ने कित-कितक घर टपान
जेना गामहि बसइ हमर प्राण

बाबा ने बाबी ,नय कक्का ने काकी  
भाइ बसै दूर देश  केकरा हम ताकी  
गाम शहरिएल प्रेम-भाव सब बिलाएल 
मरुथल भअ गेलइ बगान
जेना गामहि बसइ हमर प्राण

— विजय इस्सर 'वत्स'

[08.02.2015 कें लिखल ओ कोलकाता पुस्तक मेला मे 'अकासतर बैसकी' मे गाओल गेल]

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