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सृष्टि विकासक निर्मल चेतनाक प्रतीक वागीशा

सृष्टि विकासक निर्मल चेतनाक प्रतीक वागीशा

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या कुन्देदु तुषार हार धवला,या शुभ्र वस्त्रा वृता,
या वीणा वर दण्ड मण्डित करा, या श्वेत पद्मासना।
या ब्रह्मा च्युत शंकरः प्रभृतिभीः देवैः सदा वन्दिता,
सा माम् पातु सरस्वती निःश्सेष जाड्यापहा।।

"सरस्वती" शब्दक उत्पत्ति "सरस'' (प्रवाह) आ 'वती' (जाहि स्त्री मे प्रवाह हो) सँ भेल अछि. अन्य भारतीय भाषा मे हुनक भिन्न-भिन्न नाम अछि। तेलुगु मे "चडुवुला तल्ली" (Chaduvula Talli) आ "शारदा" नाम अछि. कोंणकणी में शारदा, वीणापाणी, पुस्तक-धारणी, विद्यादायिनी निर्दिष्ट अछि. प्रसिद्ध श्रॄंगेरी मंदिर पर शारदे, शारदाम्बा, वाणी, वीणापाणी आदि उल्लिखित अछि. तामिल मे कलैमंगल (Kalaimangal), कलैवाणी (Kalaivani) वाणी सेहो कहल गेल अछि. हिनक संबोधन में "शारदा" (जे शरद ऋतु पसंद करय), "वीणापुस्तक-धारणी" (जे बीणा आ पुस्तक धारण करय), "वाक्देवी", "वाग्देवी", "वाणी" (बोलीक देवी), "वरदायनी" (जे उदारता सँ वर प्रदान करय) इत्यादि प्रसिद्ध अछि.
सनातन धर्म में "सरस्वती" केँ ज्ञान, संगीत, कला आ विज्ञानक अधिष्ठात्री देवी मानल गेल अछि. ओ ब्रह्माक सहचरी आ हुनक शक्ति रुप मे परम पूजनीया छथि. त्रिमुर्ति, "सरस्वती", "लक्ष्मी", आ "पार्वती" मे सँ एक छथि. यएह त्रिमुर्ति, "त्रिदेव" केँ विश्वक सृष्टि, पालन आ संहार में मदति करैत छथि. सरस्वती पश्चिम आ मध्य भारतक जैन धर्मावलम्बीक लेल सेहो परम पूजनीय छथि. बौद्ध धर्म मे सरस्वती केँ "संरक्षक देवी" क रुप मे मानल जाईत छथि. सरस्वती वर्मा मे "थुराथाडी"(Thurathadi), मालदीव मे तिपितिका (Tipitika), चीन मे 'बिअनसीएतीअन' (Biancaitian), थाइ मे "सुरसावादी" (Surasawadee) आओर जापान मे "बेनजैतेन" (Benzaiten), नामे संबोधित भऽ संपूजित होइत छथि.
ऋगवेद मे सरस्वती केँ नदी रूप मे साकार देवी मानल गेल अछि. पश्चात् वैदिक युग (Post Vedik Age) मे हुनक अस्तित्व नदी रूप मे क्रमशः समाप्त होइत गेल आ साहित्य, कला एवं संगीत सँ जुड़ैत चल गेल. हिन्दू मान्यतानुसार, सरस्वती ज्ञान, चैतन्य, वृहत वा व्रह्माण्डिय ज्ञान, सृजन, ज्ञानोदीप्ति, संगीत, कला, वाक्शक्ति एवं सामर्थक देवी मानल गेल छथि. स्कंद पुराण मे सरस्वती केँ "शिवानुजा" अर्थात् शिवक छोट बहिन कहल गेल अछि. वेदान्तक अनुसार, हुनका ब्रह्माक "स्त्री-शक्ति" (Feminine Energy) मानल गेल अछि जे आदिशक्तिक एक रूप छथि. देवी-महात्म्य मे त्रिमुर्ति, "महाकाली", "महालक्ष्मी", "महासरस्वती" मे सँ एक मानल गेल छथि आ अष्टभुजा रूप मे वर्णित छथि. तंत्र सार मे "नील-सरस्वती केँ 'महातारा" क दोसर रूप सरस्वती जे वाक् सरूपा छथि, जे नादी रूप मे दृष्यमान होइत छथि, जिनका मे निरन्तर प्रवाहक प्रवेग अछि. वाक् रूप मे सरस्वती सृष्टिक पर्याय छथि. वाक् सँ सृष्टि संभव अछि. वाक मे प्रकाश आ ध्वनिक सम्मिश्रण अछि. वाक् केँ सृष्टिक प्रथम दिवसक रूप मे मानल गेल अछि. वैह तऽ प्रकाशक प्रथम विकिरण आ नादक पहिल स्फोट अछि.
आधुनिक वैज्ञानिक जकरा 'बिग-बैंग' (Big-Bang) कहैत छथि— सएह वाक् सृष्टिक उपोद्घात अछि. ॠगवेदक वाकसूत्र मे वाक्देवता स्वयं कहैत छथि— "अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां, चिकीतुषी प्रथम यज्ञियाम्". हमही एक-दोसरा सँ भेटै वला शोभा छी, हम समष्टि चेतनाक सौंदर्य, हम पृथ्वीक सभ अधिष्ठाता आ वस्तु केँ एक दोसरा सँ अभिमुख करऽ वाली शक्ति छी, जे अपन अज्ञानता, अपन अपूर्णता, अपन कमी केँ बुझऽ बला छथि आओर एहि कारण सँ पूर्णताक लेल अपन सूक्ष्मतर भावसत्ता सँ एकाकार होएबाक लेल यज्ञ करऽ बला, परस्पर भावक अनुष्ठान करऽ बलाक प्रेरक शक्ति हमहीं छी. ऋगवेदक ई रूपक वाक केँ 'गॅाड-पार्टिकिल' (God-Particle) सिद्ध करैछ. सूक्ष्मतर सभ भाव सत्ता केँ एकाकार करऽ बला ई तत्व सृष्टि सृजनक आधार अछि.
वाक् जखन सरस्वतीक रूप रचना मे अपन कल्पना कएलक तऽ सृष्टि विकासक निर्मल चेतनाक प्रतीक प्रतिमा बनि गेली. नदी बनि ई सत्वोद्रेकक प्रवाहक अंतरंग धारा बनली. ई धारा धवल अछि आओर एहि सँ अवगाहित होइ बला सेहो स्वच्छ आ निर्मल भऽ स्फटिकवत चमकऽ लगैत अछि, हुनक अंतरंग प्रोद्भासित भऽ जाइत अछि. कुंद, इंदु आ तुषार सभक कांतिक प्रतिरोपण कएलो पर वाक् सन प्रकाश चेतना केँ नहि पाओल जा सकैछ. वाक् देवीक आसन आधार श्वेत पद्म अछि. हुनक वाहन श्वेत हँस अछि. एहि सभ श्वेत आधार मे एकटा आंतरिक प्रवाह निरंतर अछि, जकरा सत्वोद्रेक केँ रूप मे ग्रहन कएल जा सकैछ। कमल पुष्प केँ समान एहि सृष्टिक मिलन भेल अछि. कमल पुष्पक फुलेनाइ कोनो सामान्य घटना नहि. एकरा खुलला सँ ध्वनी आ प्रकाशक विस्फोट होइछ. संपुटित पुष्प चटकारी दऽ केँ उन्मीलित होइछ. श्वेत रंग-लीलाक उन्मेश अछि. सृष्टिक विकाशक लेल जे भारतीय धारणा अछि ताहि मे विष्णुक नाभी सँ उत्पन्न होइ बला, कमल पुष्प पर ब्रह्माक आसन छनि. एहि सभ धारणा मे कोनो-ने-कोनो एकसूत्रता अछि. सरस्वती ब्रह्माक मानस पुत्री छथि. एहि आधार पर सृष्टिक संरचना मे सरस्वतीक अपन महत्व अछि. एहि सँ सरस्वती संगीत, साहित्य आ कलाक देवी रूप मे प्रतिष्ठित भेली. संगीत, साहित्य आ कला सृष्टि मे स्वतंत्रताक समर्थक अछि.
ब्रह्माक सृष्टि रचना मे जखन-जखन अन्हारक प्रतिछाया जीवनक उन्मुक्तिक लेल अवरोध करैछ, तखन-तखन कला-सृष्टि जीवनक उज्ज्वल संभावना बला स्वतंत्रताक देवी सरस्वतीक चित्रण श्वेत वस्त्र धारिनी, श्वेत कमल पर विराजित दिव्य स्त्री केँ रूप मे कएल जाइत अछि जे पूर्ण सत्य ज्ञानक प्रतीक अछि. श्वेत रंग शुद्ध आ सत्य ज्ञानक प्रतीक मानल जाइत अछि. सामान्यतया हुनका चतुर्भुजी दर्शाओल जाइत अछि जे मानवक मन, बुद्धि, सतर्कता आ स्वावलम्बनक द्योतक अछि. दोसर दिस ई चारू हाथ, चारि वेद केँ दर्शबैत अछि. वेद मे तीन तरहक साहित्य भेटैत अछि—
(1) काव्य - ऋगवेद मे स्तुति, (2) गद्य - यर्जुवेद मे गद्य आ (3) संगीत - सामवेद मे हाथक पुस्तक गद्यक, स्फटिक माला काव्य एवँ वीणा संगीतक प्रतीक चिन्ह अछि.
कुम्भ एहि तीनूक शुद्धताक प्रतीक अथवा हुनक शक्ति, जाहि सँ मानवक चिंतन केँ शुद्ध रखैत छथि. दोसर दृष्टिकोण अछि जे—
पुस्तक (वेद) सांसारिक, दैविक, अविनाशी आ सत्य ज्ञानक संगहि विज्ञान एवँ धर्मग्रन्थ मे हुनक सिद्धि केँ दर्शवैत अछि. स्फटिक माला ध्यान आ धर्म केँ चिन्हित करैछ. कुँभ सृष्टि एवँ शुद्धताक मानक अछि. वीणा हुनक कला एवँ संगीतक सिद्धिकप्रतीक अछि. "अनुराग" नाम हुनक संगीत-प्रेम केँ दर्शा स्पष्ट करैछ जे भावनाक अभिव्यक्ति संगीत सँ होईछ.
पएर लग हँस जे हुनक वाहन सेहो मानल जाइछ, ऒ नीर-क्षीर विवेकी अछि, ऒ नीक-बेजाय अथवा विनाशी-अविनाशीक बीच अन्तर करब सिखबैत अछि. कतौ-कतौ हुनक वाहन रूप मे मयूर केँ देखाऒल जाइत अछि. मयूरक सवारी शिक्षा दैछ जे वाह्य सौंदर्य सँ विलग भऽ अविनाशी सत्यक लेल बुद्धिमान बनी. हिन्दू हुनक पूजा मात्र शैक्षणिक ज्ञानक लेल नहि कऽ मोक्षक हेतु सेहो करैत अछि.
गोवा, महाराष्ट्र आऒर कर्नाटक मे सरस्वती पूजा, महासप्तमी केँ "सरस्वती आवाहन" सँ प्रारंभ होइत अछि आ विजया दशमी केँ "सरस्वती उव्दसन" सँ समाप्त होइछ. पुर्व आ पुर्वोत्तर भारत (त्रिपुरा, आसाम, उड़ीसा, प० बंगाल आ बिहार ) मे सरस्वती पूजा बसंत-पञ्चमी (सिरपञ्चमी) केँ मनाऒल जाइछ. दक्षिण भारत मे सेहो सरस्वती पूजा "नवरात्री" मे होइछ. अन्तिम दू अथवा तीन दिनक शक्ति उपासना सरस्वती केँ समर्पित कएल जाइछ. तमिलनाडु मे सरस्वती पूजा "आयुध पुजा" संग मनाऒल जाइछ जाहि मे अस्त्र-पूजन आ यंत्रक स्थापन होइछ. नवमी दिन पुस्तक, वाद्ययंत्र एवँ औजार केँ सरस्वती लग राखि पूजा होइछ. विजया दशमी दिन पुस्तक एवँ वाद्ययंत्रक पूजन सम्पन्न कए "विद्यारंभ" कएल जैछ. पुस्तक, काँपी आ लेखनी मे सरस्वतीक बास मानल जाइत अछि आ एकर आदर सम्पूर्ण भारत मे होइत अछि.  
संतोषी कुमार

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