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'हंसोथि रहल छी, हंसोथू'

'हंसोथि रहल छी, हंसोथू'

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हे यौ श्रीमान, 

जे जे लिखै छै से लिख' ने दियौ!

कवि, लेखक कोनो बड़द नहि ने छै जे जिमहर हाँकि देतै, हँका जेतै. बेसी सँ बेसी आइ धरि जे मैथिली मे होइत रहल अछि सएह अपने क' सकैत छी, अपन लगुआ-भगुआ कें सरकारी गोष्ठी मे बजबैत छी. सभटा सम्मान, पुरस्कार गोल-गोलैसी सँ हँसोथति छी.

मुदा ई जघन्य काज जे अहाँ लोकनि प्रारंभ केलहुँ अछि ताहि सँ एकटा निराशा आ हतोत्साहक वातावरण बनेबाक जे एकटा अभियान आरंभ भेल अछि, बन्न करू!

ई नै बुझियौ जे हमहीं छी एहि संसार मे.

अहाँ जाहि लेल छी से हँसोथि रहल छी, हँसोथू.

मुदा मोन राखब माटि पर काज कर'बला कें जनताक तागति छै. किएक त' ओ जनताक बात लिखै छै!

जे केओ सुच्चा साहित्य लेखन मे छी, कोन मे दुबकल छी. एहि गिरोहबन्दी सँ आक्रान्त छी. 

चिन्ता नहि करू सभक हिसाब छै लोक लग, समाज कखनो कृतघ्न नहि होइछ!

— दिलीप कुमार झा

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