खुरचनभाइक कछमच्छी: कखनो बिठुआ कखनो कनैठी

नवकृष्ण ऐहिक (उर्फ़ रूपेश त्योंथ) द्वारा लिखल पोथी 'खुरचनभाइक कछमच्छी' (2015) गद्य साहित्य अंतर्गत व्यंग्य पोथीक रूप मे सामान्य सँ सामान्य ओ विशिष्ट सँ विशिष्ट पाठक धरि पहुंचि बनेबाक सामर्थ रखने अछि. युवा लेखन मे गद्य साहित्य नगण्ये जकाँ देखा रहल अछि, ओतहि एहि पोथीक आगमन हर्ष परसि रहल अछि.

एकठाम आदरणीय डॉ. भीमनाथ झा लिखने छथि – 'संसारक पहिल वाक्य जहिया बनल होइक , से रहल हेतैक गद्ये. कविता बुद्धि सँ बनैछ आ गद्य फुटैछ ठोर सँ. कविता विश्राम थिक, गद्य थिक श्रम. काव्य निश्चिंतता थिक, गद्य थिक बेगरता. प्राणी केँ जन्म काले सँ बेगरता सतबए लगैत छै कथूक - ने - कथूक. तकरा व्यक्त करबा लेल बोल फुटैछ अनायास, निर्बद्ध - से छन्द मे कोना संभव छैक?' ( विमर्श - डॉ. भीमनाथ झा; पेज न. 39) समाज, साहित्य आ सभ्यता-संस्कृति प्रायः संग-संग चलैछ. समाज केँ बेगरता छै गद्य साहित्यक आ एहि केँ अकानबाक.

लेखक ई व्यंग्य पोथी ल’ प्रस्तुत भेल छथि. व्यंग्यक महत्व ओहुना जीवन लेल अछि, किएक त’ आजुक मानव जीवन ओहुना बोझ त’र दबल अछि. भरिदिन सभ हाय-हाय करैत रहैत अछि. टाका बटोरबा खातिर हफसैत रहैत अछि. काजुल नारि आ कारिन्दा पुरुष त’ जानिये, मुदा गपक्कर जे भरिदिन हवा पर काज चलबैत अछि, ओहो अपसिआँत रहैत अछि जे कतहुँ हुसि ने जाइ हम. कतेक, कोना, कतय हवा मारब जे हमर वर्चस्व साबित होइत रहय. तेहन सन वातावरण मे माथ हल्लुक करबाक यंत्र छै एहि व्यंग्य सभ मे.

जखन अंधविश्वास पर जोरगर प्रहार करैत व्यंग्य ल’ अएलाह प्रो. हरिमोहन झा, तखन खूब स्वागत भेल छल ओहि साहित्यक. खट्टरकाका खूब हसेने छलाह लोक केँ आ आइयो प्रासंगिक छथि. हंसबाक कारण ई छल जे पहिने समाज खूब कानि-कानि नोर पोछि लेने छल. प्रस्तुत पोथी सेहो ओही रूपें स्वागत योग्य अछि.

खुरचनभाइक कछमच्छी विशेष प्रयोजन सँ स्तम्भ रूप मे मैथिली दैनिक मिथिला समाद लेल लिखल गेल छल आ खूब चर्चित भेल छल. तकरे लेखक एकठाम क’ जन सामान्य धरि पहुंचेबाक प्रयास केलनि अछि. एहि संग्रहक कथा सभ बेछप स्वादक संग आएल अछि. कथा कहबाक विशेष शैली एहि संग्रह केँ फराक परिचिती दैत अछि. प्रायः सभ कथा मे खुरचनभाइ रहैत छथि, जिनका आभामंडल मे कथाक वातावरण घुरियाइत रहैत अछि. ख़ास बात इहो अछि जे कथा सभ बेसी साहित्यिक अलंकरण, घुंघरू-फंदा सँ लादल, बान्हल नहि अछि. सोझ-सोझ गप्प कहैत अछि आ बीच-बीच मे बिठुआ कटैत रहैत अछि. गपे गप मे छोट-नमहर बात कहि सोचबा लेल मजबूर करैत अछि, जे व्यंग्य कथाक विशेषता रूप मे परिगणित कएल जाइत छै.

हम एतय संग्रह केर तीन गोट कथाक संग उपस्थित भेल छी. 'ह’वानगरी' संग्रहक पहिल कथा थिक. लेखक चिंता ओ चिन्तनक मध्य रहि सेहो बात कहैत छथि. त’ ओ चिंतित छथि ओहन हवाबाज कें ल. जे एहू युग मे ह'वे पर काज चला रहल अछि. ओ हवा देब अपन कर्म बूझि जतए ततए हवा देने फिरैत अछि. ठीके ह'वा नगरीक लोक अद्भुत होइत अछि. पुष्टगर कटाक्ष अछि एहि कथा मे. ओहन लोकक मोन मे जरूर ठहकतै पढ़ला उपरान्त.

अगिला कथा अछि, 'कमि गेल धाह' जाहि मे जतए, जेहन, जे रंगक मांग छलै, ततबे, तेना व्यंग्यक नीक रंग भरल गेलै. कथाक दृष्टिये नीक कथा कहल जा सकैए कारण जे संतुलन चाही नीक कथा मे, से स्पष्ट देखा रहल अछि. कथाक माध्यमे लेखक कहए चाहैत छथि जे आजुक जे समय अछि से हर तरहें बिखाह अछि. सांस लेब ओहो स्वस्थ नहि अछि हवा. अन्न-तीमन खाएब, ओहो खाद परहक. कपड़ा पहिरब ओहो केमिकल सँ रंगल टीपल. दवाइ पर्यन्त बिखाहे, एहना मे कथा नायक साइकिल सँ खसि पड़ैत छथि तँ गामक लोक बेरा-बेरी जिज्ञास मे अबैत छथिन जेना कि ओ लोकनि हिनक खसबाक बेर तकैत होथि. एतबा नहि, ओ लोकनि देखि-देखि तेहन ने बिख सन बात बजै छथिन जे बेचारा रोगी ओहन दर्दक हालति मे छटपट्टी आओर बढि जाइत छनि. कियो कहैत छथि – ओह! हे भगवान आब की हेतै, कियो कहैत छथि – आब तँ बुझू नदियो-लगिहियो नुए-वस्त्रे हेतनि, कियो कहैत छथि – आब ई तँ नहिए सम्हरता, कियो कहैत छथि – आब बचता की नहि? कहू तँ एहन समय मे कथा नायक लेल लोक कोना बजैत छथि! बेचारा एक तँ चोट सँ व्यथित, दोसर इलाज मे टाका खर्चक दिक्कत, तखन एहन एहन बात सुनि की बीतैत हेतनि समाज मे एखनो एहन हालति अछि, तकर स्पष्ट चित्रण भेटैत अछि एहि कथाक माध्यमे.

एहि संग्रहक 'किदन-कहांदन' नीक व्यंग्य कथा अछि. हमर अहांक समाज मे एहन घटना-चित्र देखाइ पड़ि जाइत अछि. लोक तँ आइ-काल्हि तेहन तन्नुक भ’ गेल अछि कि कनियो पुरबा-पछबा मे बेमार भ' जाइत अछि. बेमार होइते स्वाभाविक छै जे लोक जल्दी स्वस्थ होमय चाहैत अछि. गाम-घर मे एखनहुं झोड़ा-छाप डाक्टर सभ छथिए, जे समाज सेवाक संग संग अपनो नून रोटी जुमबै छथि, बेजायो नहि. जे बेमार पड़ैत छथि पहिने तँ हुनके शरण जाइत छथि. तहिना एहि ठाम दुनूक दुनू प्रति बेगरता देखल जाइत छै. रोगीक लेल इलाजक बेगरता आ डाक्टर लेल नून रोटीक जोगार. ओ डाक्टर तँ एहि समाजे सँ गुजर करत. जँ लोक बेमार नहि पड़तै तँ बलजोड़ी मुंह जाबि तँ सूइआ नै भोकतै आ नै मालजाल बला गोटी गिड़ेतै. ओकरा तँ रोगी ठीक करबाक छै आ टाका सेहो कमेबाक छै. ताहि क्रम मे रोगी हदिया लगै छथि जे एतेक गोटी, एतेक सूइया भोकि सभटा रुपया टनने जा रहल अछि. मन मसोसि क' रहि जाइत छथि करता की. किछु जँ देरी भ' जाइत छै रोग ठीक हेबा मे, ओ शहर जा इलाज करबए लगैत छथि. बड नीक अछि ई प्रसंग. आगू ओतहु त' वैह बात रहै छै 'जैह ढोरबा माय, सैह सुटबा पितियाइन'. चारि हजारक टेस्ट आ पांच सय केर दबाइ. कहू की करतै बेचारा. तेँ देखल जाइत छै, जतेक रोगी रोग सँ नै सोगायल रहै छै, ओहि सँ बेसी सोगायल रहैत छै, टाका खर्चक डरे. सत्य चित्रण कएल गेल अछि एहि कथा मे.

अपने सबहक लेल कथाक भाव मात्र सँ अवगत करेलहुँ जे कतेक नीक ढंगे कथा लिखल गेल अछि. एहि तरहें एहन कथाक संख्या बेसी अछि जे पाठकक ह्रदय मे स्थान बनबैक केर सामर्थ रखने अछि. गाम-घर, हाट-बाट, खेत-खरिहान, गाछी-बिरछी, अंगना-दलान, समाज सभठाम केर प्रसंग एहन लागत जे मने मन ठहकत जे ई तँ ठीके एना होइत अछि. बीतलो लागत, होइतो देखायत, जे पोथी केँ विशिष्ट बनबैत अछि.

संग्रहक पचास गोट कथा मे किछु कथा हल्लुक सन सेहो अछि, जे पाठक केँ अंत धरि बन्हने रहबा मे सफल नै रहल अछि. पात्रक दोहराओ खटकैत अछि तँ किछु कथा मे खूब कम पात्र छै जे कथा केँ उत्कर्ष मे बाधक बनैत छै. अंततः हम कहब जे ई संग्रह सफल व्यंग्य पोथी छी. पठनीय ओ संग्रहणीय पोथी अछि.

पोथी : खुरचनभाइक कछमच्छी
लेखक : नवकृष्ण ऐहिक
प्रकाशक : मैलोरंग प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष : 2015
मोल : 120 टाका

समीक्षाः नारायण झा


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