KB SERIES #5: बाह रे बाह जमाना!

जमाना हुहुआ कऽ भागि रहलए, मुदा केऽ देखलक अछि जमाना कें. हमरा सँ भेंट होइतै तऽ कहि दितियै, एना जे हुहुआ कऽ भागि रहल छह से ठेसो लागि सकैत छह! मुदा जमाना कें मुँह कान तऽ छैके नै, जे ओ भेंट होयत! मुदा भागबाक लेल ने जानि कतए सँ ओकरा पएर भ' गेल छै.

ई तऽ पक्का अछि जे ओकर पएर बेस मजगूत अछि जाहि सँ ओ बेधड़क भागि रहल अछि...भागि रहल अछि. एहि मे किछु लोक एकर पाछां-पाछां चलैत रहैत अछि आ किछु लोक एकरो सँ आगू भागि जाइत अछि. ई बात छै जे जमाना लोक सभ सँ घेरायल रहैत अछि. कारण कतेको गोटे तऽ जमानाक हाथ मे हाथ मिला भागैत रहैत छथि, किछु लोक पाछां भागैत रहैत छथि, किछु ओकरो सँ आगूए भागल रहैत छथि आ किछु लोक पाछां छूटि जाइत छथि. एहू मे लोकक दोख अछि....जमानाक नहि!

लोके कएक प्रकारक रहैत अछि मुदा जमाना तऽ जमाने अछि! ओ अपन चालि सँ नहि हटि सकैत अछि. ओकर धर्म छैक भागब आ से ओ निमाहि रहल अछि. मुदा मनुक्खे अपन धर्म पर अडिग नहि रहि सकैत अछि. मौसमक हिसाब सँ ओकर मिजाज बदलैत रहैत छैक. धर्म निमाहत से सकबे नहि करत, कारण ओकरा जमानाक हाथ मे हाथ मिला कऽ भागबाक मोन जे रहैत छैक! 

ई जमानाक संगे भागए मे कोन मजा छै से ने जानि! हम सभ जमाना सँ बहुत पाछां रहि गेल छी आ जे ओकरा संग हाथ मे हाथ मिला भागि रहलए सएह कहि सकैत अछि जे ओकर हुलिया केहन छैक! आ जे जमानाक संगे भागि रहलए तकरा लग पहुँचए मे हमरा सन लोक कें ने जानि कतेक डिबिया तेल जरि जाएत आ लालटेन मे की जराएब सेहो चिंता बढ़ि जायत, दोसर ब्लैक सँ कीनब से सामर्थ्य हमरा कहां...मोन मसोसि कऽ रहि जाए पड़ैत अछि. ओहुना हमरो लालटेन तेल बिनु बेसी काल कनिते रहैत अछि!

जमाना बेस बेइमान अछि. हम कोनो दोष नहि दऽ रहल छियै मुदा एकरे कारण सँ मनुक्ख मनुक्ख मे भेद उत्पन्न भऽ जाइत छै. कहल जाइत छै जे, जे बेसी विकास कऽ लैत अछि ओकरा पर अविकसित सभ केँ दबएबाक आरोप लगैत छै. आ फेर शुरू होइत छै झंझटि आ फसाद! 

जमाने कें दोष छै ने जे संविधान मे आरक्षणक व्यवस्था कएल गेल आ ओहि पर नेता लोकनिक घृणित राजनीति एखन धरि चलि रहल अछि देश मे! गांधीजी शाइत बेसी सज्जन छलाह जे एकर दुष्प्रयोगक आभास अगाते हुनका नहि भऽ सकलनि. मुदा जमाना सँ के जीतत...जीति सकैत अछि एहि लोकतंत्र मे नेता!

वएहटा जीति सकल अछि जमाना कें जे ओकर पंज मे देश ओझराएल अछि आ जारी अछि राजनीति. मुदा ओहि नेता सभ कें ई नहि बुझल छनि जे समय सँ केओ नहि जीति सकलए आ जमाना तऽ मात्र ओकर दास मात्र अछि! असल मे जमानो पर नेताक कोनो तेहन वश नहि रहैत अछि...भ्रम अबस्से रहैत छै जे ओ जमाना केँ मुट्ठी मे क' लेने अछि!

खुरचनभाइ जमाना पर अपन विचार व्यक्त कऽ रहल छलाह हमर दलान पर बैसि. हमरा हुनक भाषण बेस बोर कऽ देलक तऽ हुनका कहलियनि, पहुँचि ने गेलहुँ जमाना पर सँ नेता पर! अहॉं कें तऽ नेता पर फोकस देबऽ बेसी अबैत अछि. आब बंद करू अपन गीता-रामायण! बुझि गेलहुँ हम जे अहॉं चाह पीबिए कऽ दम लेब. एतेक कहि हम गुलटन कें चाह लेल कहि अंगना पठा देलियै. खुरचनभाइ मुसकिया देलनि, जेना हमर बात सत्ते हो!

— रूपेश त्योंथ

मैथिली दैनिक 'मिथिला समाद' मे अगस्त 2008 सं दिसम्बर 2009 धरि दैनिक रूपें प्रकाशित धारावाहिक व्यंग्य 'खुरचनभाइक कछमच्छी' केर एक अंश. ज्ञात हो जे रूपेश त्योंथ अखबारक एहि लोकप्रिय कॉलम मे लिखबा हेतु छद्म नाम 'नवकृष्ण ऐहिक' केर प्रयोग केने छलाह.


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