कवि नारायण झाक कविता 'अकनगर आँखि' ओ 'परिभाषा'

1. अकनगर आँखि

नील अकासकेँ
सुरूजक लालिमा
रक्तिम आभा सँ
रंगैत बढ़ैत
प्रस्फुटित भ$ 
होअय चाहैए साकार
भोर भेनाइ स्वाभाविके
अहाँ बुझैत रहु
जे एखन तँ
निशाभाग रातिये अछि 

लाल - पियर गेना - गुलाब
बेली - चमेलीक कोढ़ही
फुलाइ लेल
सुरूजक धाहक प्रतिक्षामे अछि 
अहाँ बुझैत रहु
जे ई अंडीक गाछ जकाँ
मात्र बढ़िये रहल अछि 

गाछ सभमे सहस्र टुस्सा
गेल छैक टुसियाय
शस्य - श्यामला वसुंधरा
गेल छैक हरियाय
क$ रहल छैक प्रतिक्षा वसंतक
अहाँ बुझैत रहु
जे एखन धरि पतझारे अछि 

हफियाइत मुँह सँ
लटपटाइत अछि अहाँक बोल
अधमुनल आँखि सँ
झलफलाइत अछि दृश्य
आँखि ताकि
ओहि फूल - कोढ़हीकेँ निंघाड़ु
गमकैत सुरभि सँ हृदय जुराउ
अपनहुँ हाथ - पएर लारू
चहुँ दिस पौरल
वातावरणक हरियरी सँ
साफ करु नजरि
बनाउ आँखिकेँ
अकनगर।


2. परिभाषा

एक दिस
अपन लक्ष्य संधानबा लेल
गाछक फुनगी तक
पहुँचबा लेल
श्रमस्वेद सँ तरवतर
चढ़ैत - पिछड़ैत
पिछड़ैत - चढ़ैत
हियासैत रहैत अछि
गाछक फुनगी दिस... 

दोसर दिस
अपन लक्ष्य संधानबा लेल
गाछक फुनगी पर
चढ़बा लेल
सीढ़ी लगा 
क्षणहि चढ़ि
करैत अछि गर्जना
चिकरि - चिकरि गढ़ैत अछि
सफलताक नव परिभाषा।

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