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इजोत मे अपन लोक कतए!

इजोत मे अपन लोक कतए!

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मैथिलीक कथाकार माननीय अशोक झा (पटना) सं जनतब भेल जे आइ (3 नवंबर) चेतना समिति मे कार्यक्रम छै. आग्रह जे समय होअए त' आउ, बहुत रास अपन लोक सब सं परिचय भ' जाएत. कहने रहियनि जे कोशिश करबै जरूर. कार्यक्रमक आर कोनो सूचना नहि रहए. दिन भरिक दफ्तरी काजक पश्चात गेल रही. 

कार्यक्रम शुरू भेल नहि रहय, शुरू हुअ-हुअ पर रहै. बाहर मे 'गोर लगी मोर लगी' होइत रहै, सेलुट सेहो. बुझना गेल कार्यक्रम झमटगर छै. अशोकजी सं फोन पर गप भेल. ताबे विद्यापति पर्व समारोह 'जय भैरव असुर भयाउनि' शुरू भेल. 

कोलकाता मे छोट-पैघ मैथिली कार्यक्रम एहि गीत सं होइत छै. अंतर ई, जे ओत' एहि गीतक समय सभागार मे उपस्थित लोक सब सम्मान मे ढाढ़ भ' जाइत छथि, एत' नहि. 

ताबे एकटा सज्जन किछु लिखित-छपित पर्चा बटैत देखबा मे अएला. पर्चा देखि बुझना गेल जे कार्यक्रम त' सते झमटगर! पूर्व-अपूर्व महानुभाव सं भरल! किछु गोटे क सम्मान सेहो हेबाक सूचना रहै! तुरत-फुरत मे जे अकानल त' अभरल जे...जे भेलै से भेलै आब एहन सभा मे जाए सं बचबाक चाही जतय बुझबा-देखबा मे सम्मान पौनहार पर सम्मान देनहार अधिक झकास मे होथि. 

साहित्य सभा मे जओ राजसभा सन्हियाएल देखाए, त जल-थल विभ्रम सं बचनाइ मुश्किल! ई ठीक जे विद्यापति राजसभा मे छलाह, मुदा विद्यापति जे स्मरणीय छथि ओ राजसभा सं भिन्न छथि, भिन्न अ-भिन्न ठामहिठाम! 

वेदन-प्रतिवेदन शुरू भेलै. हाथ आएल लिखित-छपित पर्चा सब पढ़ल. अकानल पर कानब सं बचबाक चाही. मन मे आएल अशोकजी त' कहने रहथि बहुत रास अपन लोक सब सं परिचय भ' जाएत, मुदा एहन भव्य इजोत मे त' अपनो लोक आन सन देखाइ छै, के' जानि भैयो जाइत होइ! एहन इजोत मे अपन लोक कत! 

ई कार्यक्रमक खिधांस नहि, अपन लोकक तलाश!

— प्रफुल्ल कोलख्यान

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