कवि नारायण झाक 'अविरल-अविराम' मे सं 3 गोट कविता


1. गाम-शहर

आब गाम हकोप्रत्यास
गरदनि उठा-उठा
तकैत रहैए बाट दिस
सोचैत रहैए गाम
नहि रहत केयो मरद
जनानाक कहाओत गाम
कि ओहो धरत गाड़ी
के बुझैए 

शहर थिक विकासक नाम
लोक शहर दिस
उठा चुकल कहिया ने डेग
कतेक नगर
बसा चुकल लोक
अरजै खातिर ढौआ
कS चुकल अछि
साम्राज्यक विस्तार
गामक हवा-पानि
हुनका लेल मरखाह

खेती-पाती,चास-समार
ताहि पर जोत तेखार
धन रोपनी आ कदबा पखार
छीटब खाद ,पटायब खेत
बिसरि चुकल अछि
गामक लोक

बिधक बास्ते बाँसक बासन
माटिक बासन काज-उदेम
टेटिआइत रहैए
कारीगर करीन्दा
जीबै लेल कतेको आसन
नहि भरै छै तखनो पेट
काटय कतबो घेंट
नहि बनैए सूच्चा सेठ

एखनुका लोक अछि पड़िकल
पगाड़ पबै मे,पन्नी बीछैमे
ईटा-गारा खूब उघैमे
किलाक-किला जीरी काटय
धोकरा-धोकरी खूब सीबैमे
होटलक बासन खूब मलैमे।

आब गाम हकोप्रत्यास
गरदनि उठा-उठा
तकैत अछि बाट दिस।


2. ई केहेन हूलि-मालि

बनल छै छोट-छोट
खोपड़ी आ कपड़ाघर
रहैत छै मास करबाक लेल
स्त्री आ पुरूख
सार्थक करै लेल जीवन
अरजै खातिर धर्म 

एक दिस घाट पर
राखल छै लहास
जकर कयल जेतै गति
अन्तिम यात्राक पूर्ण विराम हेतु
जे भेटि पओते मोक्ष 

एक दिस पतियानीमे
बैसल छै
लुल्ह-नांगर, बहीर-आन्हर 
तकरा कप्पा पर
फेकल जाइत छै
टाका आ अन्न
भरय लेल पेट
कमयबा लेल धर्म 

एम्हर गंगाक बीचोबीच पैसि
किछु सन्त
पढ़ि रहल छै निरंतर मंत्र
लगबाक लेल सुठाम
जीवनसँ पएबा लेल उद्धार 

धर्रोहि लागल छै लोकक
डूब देबय लेल 
आ कटएबा लेल 
जन्म-जन्मांतरक पाप 

एम्हर काते-कात 
लागल छै दोकान
जाहिमे नहा-नहा सभ
खाइत छै चूड़ा-दही, जिलेबी
ओ बेचि रहल छै
चलएबा लेल पेट
अरजबा लेल अर्थ 

किछु पतित कामी
आँखि गड़ेने छै
नहाइत स्त्री दिस
करबा लेल पूर्ण काम 

जीवनक ई केहेन हूलि-मालि 
देखि रहल छी 
से मोने-मोन 
गुनि रहल छी।


3. टीस

तकैत छथि कवि
बैसि ऊँचका चबूतरासँ
मिस्स पड़ैत महानगरमे
गामक गोइठबीछनी
मुरेठा बान्हल माथ 

अकानै छथि कवि
शहरक ध्वन्यालापमे
दुखनीक दु:ख
फेकनीक संगे जे घटलै  

करै छथि कवि गणित
एसी घरमे
रौदी-दाही पर
माछ-मखानक लगता पर 

ठठै छथि कवि
अट्टालिकामे रहि
मड़ैयाक ठाठ, कोनियाँ
आ बुनै छथि टाट-फरक 

लेबै छथि कवि
शीशमहलसँ
घरक दाबा
नीपै छथि
गोबरसँ अंगना-ओसार ।

कविक सिहरै छनि देह
पड़ले-पड़ल
सुनलाक ढ़ोलिया जकाँ
धोइध बढ़ा कवि
मारै छथि अर्राहटि
प्रसव-पीड़ासँ
लिखै छथि व्यथा-कथा-स्रष्टाक 

कवि लिखै छथि गठूल्लासँ
समुद्रक ज्वार-भाटा
करै छथि कवि
लाइवटेलिकास्टिंग व्हाइट हाउसक
अन्तर्ध्यान भS
देखै छथि कवि
घरक कोनटासँ तीनू भुवन।

कवि लिखैत छथि
लिखिये रहल छथि
कल्पनाक अनन्त अकास
जोड़ै छथि
भावनाक पैघ-पैघ महल
तखन
डेगाडेगी डेगे यथार्थक रस्ता पर
दौगबै कहिया
आ पुरबै बाँहि सभहक संगे
कहिया।


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