बिनय भूषण केर किछु गजल


आजादी आइ बनल खेलौना, भ्रष्टाचारी खेलि रहल अछि।
मेहनतकश के फाँका जीवन, तयौ बलगर ठेलि रहल अछि।

आतंकक दहशत अछि सगरे, जनता टघरल डगरे-डगरे।
बाढि भीत के उमरल-उमरल, नि्हबूधन सभ हेलि रहल अछि।

मँहगी के माया अछि नभरल, मेघ निराशी धुमरल- धुमरल।
भुखल जनता प्यासल जनता,अन्न-पानि आइ टेब रहल अछि।

कनिया मांगय साड़ी  नीमन, बेटी मांगि रहल अछि कुर्ती।
बेटा के फाटल अछि अंगा, दर्द विषादक झेलि रहल अछि।

शीशा सन सपना अछि चनकल, हिय नारी के बरकल-बरकल।
दैत्याकार पूरुख बनल अछि, पुरूखारथ ओ फेलि रहल अछि।

इर्ष्या-द्वेषक जंगल घनगर, इमानक हालत अछि बद सँ बदतर।
परिवर्तन के कामी सभ आइ, पल-पल पापर बेलि रहल अछि।

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