युवा लेखक महोत्सव: अगरतला सं आबि क' (4)


एम्हर हमरा लोकनि होटल विदा भेलहुँ, ओम्हर मेघ सेहो घरमुँहा भेल. बरखाक आशंका निर्मूल साबित भेल. फ्लैग सेरेमनी छोड़ि कऽ अयबाक हमरा लोकनिक पश्चातापक आगिसँ प्रायः टेम्पूक ड्राइवरक हृदय पघिल गेलैक. ओ बिनु पुछनहि-आछने अपन गाड़ी अगरतलाक हेरिटेज पार्कक मुँहपर ठाढ़ करैत बाजल- ई पार्क घुमि लिअह, सभ किछु देख लेब. हम जाइत छी. अहाँ लोकनिक होटल एतयसँ मात्र पाँच मिनटक दूरी पर अछि. पयरहि चल जा सकैत छी.

हमरा लोकनि यंत्रवत् ओकर अनुदेशक पालन कयल. टिकट कटाय पार्कमे प्रवेश कयल प्राकृतिक सुषमा सम्पन्न ई पार्क वस्तुतः समस्त त्रिपुराक प्रतिबिम्ब अपना आँचरमे नुकओने छल. एतय राज्यक सभ प्रमुख पर्यटन स्थलक रिप्लिका निर्मित छैक. पार्क घुमैत-घुमैत बेस थाकि गेल रही हम सभ. मुदा मुखमण्डलपर ठेहीक बदला संतोषक भाव छल जे नहि असल तँ डुप्लीकेट तँ देखलहुँ!

साढे सात बजेसँ डिनर टेबुल सभपर चहल-पहल बढ़य लागल रहैक भरि दिनुका थाकल-ठेहिआयल हमहूँ विचार कयलहुँ जे सवेर-सकाल भोजन कए आराम करब. आठ बजे भोजनोपरान्त, रिसेप्सनक सोझाँमे बनाओल बैसकीपर बैसि अखबार उनटाबय लगलहुँ. हमरा ओतय बैसल देखि किछु जिज्ञासु साहित्यकार सभ सेहो आस-पासमे एकाएकी जुमय लगलाह. नओ बजैत-बजैत बेस जमघट लागि गेल रहैक. करीब पन्द्रहो भाषाक प्रतिनिधि ओतय बैसल रहथि. क्रमशः वातावरणसँ औपचारिकताक धोन्हि छँटय लागल. परिचय-पातसँ प्रारम्भ भेल सम्वाद, आत्मीयताकेँ अंगीकार करय लागल. दस बजैत-बजैत हँसी-मजाक, गप-ठहक्का आ गीत-नाद चारूकात अनुगुंजित होमय लगलैक. फेर तँ सुतलाहा सभ सेहो उठि-उठि अबैत गेलाह. गोलमे सन्हिआइत गेलाह. करीब अढ़ाइ बजे भोरबामे जखन बैसकी उसरल तँ “विभिन्न भाषाक प्रतिनिधि युवा साहित्यकार” सभ “भारतीय भाषाक युवा-साहित्यकार” बनि चुकल छलाह. गुजरातीक राम मोरी, सिन्धीक रेखा पोहानी, अंग्रेजीक आशिया जहूर, कोंकणीक गोरक सिरसत, बंगलाक प्रशान्त सरकार, नेपालीक पवित्र लामा, ओड़ियाक ज्ञानी देवाशीष मिश्रा, कश्मीरीक साबिर मागामी ओ कतिपय अन्यान्य भाषाक साहित्यकार हमर अभिन्न बनि गेल छलाह.

अगिला दिन 12.30सँ हमरा लोकनिक काव्यपाठक सत्र निर्धारित छल. असमिया, बोडो, बांगला, चकमा, मणिपुरी, मोग, नेपाली, पंजाबी आ सिन्धी भाषाक कविलोकनिक संग हमरा कविता-पाठ करबाक छल. बंगला कवि कल्याण गुप्ताक अध्यक्षतामे सत्र आरम्भ भेल. एक-एक कऽ कवि लोकनि कविता पढ़य लगलाह. भाषासँ अपरिचितो श्रोता-समाज भावक सूत्र धरबामे समर्थ छलाह. भाव-सम्प्रेषणीयताक बाटमे जँ कोनो बाधा अबैत छल तँ तकरा अनुवाद दूर करैत छल. हॉल थपड़ीसँ बेर-बेर अनुगुंजित होइत रहल. प्रायः सभ भाषाक कविता सुनलाक बाद हमरा गौरवबोध भेल जे समकालीन मैथिली कविता कोनो भाषाक समकालीन कवितासँ झूस नहि अछि.


सत्र-समापनक पश्चात भोजनोपरान्त सभ दहोदिस छिड़िया गेलाह. किओ होटलमे अराम करय गेलाह तँ किओ अगरतला भ्रमणपर बहरेलाह. हमरा आ शालूकेँ आइ फेर भारत-बंगलादेश बॉर्डरपर जयबाक छल. फ्लैग-सेरेमनी नहि देखि सकबाक क्षतिपुर्तीमे, आ ताहूसँ बेसी सीमा-सुरक्षाबलकेँ पुनः अयबाक देल वचनपूर्तिक लेल. आइ एहि यात्रामे राम, गोरक, आशिया, रेखा आ संस्कृत कवि हेमचन्द सेहो हमरा लोकनिक संग देलनि. उत्तराखण्डमे हेमचन्दक कएट टा ने गुरु मैथिल छथिन्ह आ हुनका सभक मुँहे ओ मैथिली सुनैत रहैत छथि तेँ हुनका हमर कविता बुझबामे कोनो भाङ्गठ नहि भेलनि से बड़ उत्साहपूर्वक जनौलनि. जे किओ बाघा-वॉर्डरक फ्लैग-सेरेमनी देखने छलथि हुनका लोकनिक लेल ई कोनो कुतूहल नहि छल मुदा हमरा लेल ई निश्चये अत्यंत कौतुकक विषय छल. सेरेमनीक बाद 'भारत माताक जय' कहबा काल जे स्वाभिमान-बोध भेल से वर्ण्य नहि. माटिसँ मनुक्खक सम्बंध कदाचित् एहने क्षण सभमे सोझराइत छैक.

आइ साढ़े आठ बजे सभ किओ डिनर हेतु पहुँचि गेल छलाह. भोजनोपरान्त किछुकाल हँसी-ठट्ठा आइयो चललै मुदा, बेर-बेर आगत वियोगक पीड़ा ओकरा मलिन करैत रहल. सभ किओ सम्पर्क-सूत्रक आदान-प्रदानक संग एक-दोसरासँ भविष्यहुमे सम्पर्कमे बनल रहबाक आश्वस्ति देमय लगलाह. मुँहपर मुसकी आ आँखिमे वियोगी भाव लेने सब अपन-अपन कमरा दिस विदा भेलाह. कन्नड़ कवि चिदानन्द शाली, मलयालम कवियत्री आर्याम्बिका, हिन्दी कवियत्री अर्चना भैसारे आ ओड़िया कथाकार आइपीएस देवाशीष पाणिग्रहीक सानिध्य एहि यात्राकेँ आरो उपलब्धिपूर्ण बनौलक. भाषा- साहित्य ओ कला ठिक्के लोककेँ जोड़ैत छैक!! (समाप्त)

— चंदनकुमार झा 

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