एकटा उत्कृष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति अछि 'धरतीसँ अकास धरि'


समकालीन मैथिली साहित्य मे युवा कवि लोकनि मे चंदनकुमार झा विशिष्ट ओ सशक्त हस्ताक्षरक रूप मे द्रुत गति सं उभरिकए समुपस्थित भेलाह अछि.  कवि चंदनकुमार जीक पहिल कविता -संग्रह "धरतीसँ अकास धरि" मानवीय संवेदना मूल्य कें सुस्थापित करबाक समीचीन आह्वान, मानव हृदयक विविध भाव-भंगिमा, भाषा, समाज, संस्कृतिक संरक्षण आ अनुरक्षण पर चिन्तन -मनन, सामाजिक सरोकारादिक एकटा उत्कृष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति अछि. हुनकर कविता मे सहजता, सरलता, भाव-सम्पृक्तता, स्वाभाविकता, प्रेम-पल्लवक कोमलता, मिथिला माइट-पाइनक सुगंध, समय सं लड़बाक अभिरुचि, विषम परिस्थिति कें स्वीकार करबाक क्षमता आदि व्यक्त-अभिव्यक्त कयल गेल अछि. मोन मे उठैत भाव कें सहजे कहि देल गेल अछि.

चंदनजी अपन कविताक माध्यमे धरती पर पसरल जंगल आ जंजालक मध्य ससरैत 'भ्रम'क'गनगोआरि', ललकारा दैत 'भय'क 'बिहाड़ि'क बादो 'फ़ेर हेतैक भोर'क 'आस'केर 'दीप' जरा कए रखने छथि. सुन्नर भविष्यक सपना कें साकार करबाक वास्ते कविमन मे 'पोथी पतरा पढैत कालो' 'आत्माक विलाप', 'मोनक बात', 'मोनमे उठैत प्रश्न'क उत्तर तकबाक प्रयास मे हुनक दृष्टि कखनो मिथिलागाम दिस त' कखनो मुम्बई महानगरीक चौक-चौराहा 'मरीन ड्राइव' चलि जायत अछि. बदलैत ग्राम्य- व्यवस्थाक बादो, मातृभूमिक रक्षार्थ सदति तैयार सपूत कें 'शत शत नमन'क लेल नतमस्तक चंदनक मोन मे 'कर्मफ़लक प्राप्ति', 'जीवन-यात्रा' नीति संग प्रारंभ करबाक  नैतिकताक बोध करा रहल छथि. कविता संग्रह आद्योपान्त पढला पर एहन बुझना जा रहल अछि जे  संवेदनशील कवि चंदनजी 'जीवन पथ' पर चलबाक क्रम मे 'करजा', 'बालु' ' अनधन अनेरुआ' सबकें आत्मसात-स्वीकार करैत, जीवनक कटु यथार्थ सं समझौता करैत अपन वेदना कें संवेदनशीलताक संग 'छटपटाइत कविता' मे उत्सर्ग क' देने छथि. कविमन मे बेर बेर उठैत 'जीवन-कथा'क 'अनुत्तरित प्रश्न' 'महाप्रकाशक प्रति' जागल कवित्त भावक अभिव्यक्तिक संग उत्तरित भ' गेल अछि. कबित्तक बोध भ' गेला पर कवि 'बंद कलम' कें खोलि क' भोरका कथा'क लेल मानवीय मूल्यक अवमूल्यन, वर्ग-संघर्ष, वहु-विषमताक विरुद्ध  'विद्रोह' स्वर मुखरित क' रहल छथि. चेतना जागरणक वास्ते हुनकर मोन मे 'जरैत अछि दीप' जाहि सं 'डरबैछ राति'क अन्हरिया कें भगाकए,  सत्यमेव जयतेक महागानक संग'  'सुखद भविष्यक आस' जागल बुझना जा रहल अछि. सामाजिक,साहित्यिक, आर्थिक, राजनीतिक विद्रूपताक तथाकथित 'विदूषक' केर 'लौल' कें' अकान' करैत'लोकतंत्रक परिधि मे' सेन्ह मारिक' भ्रष्ट जनतंत्रक तमाशा देखाओल गेल अछि 'धरती सं अकास धरि'. अपन कविताक मादे जीवनक मर्मस्पर्शी अनुभूतिक संगहि नारी-मात्रृप्रेमक बात धएने चंदनजी 'धिया-पुता केर/ आंग-समांगक चिन्ता मे मग्न ''मैय्या'क बहन्ने बूढ-पुरैनक दयनीय स्थिति पर अपन चिन्ता सेहो व्यक्त करैत छथि.

अर्थबाद ओ बाजारबादक बाढि सं कटि रहल मिथिला, मधुर  मैथिली, मैथिली भाखाप्रेमी आदि कें ठामेठाम रोकबाक सचेष्ट प्रयास अछि चंदन जीक "धरतीसँ अकास धरि". कविता-संग्रह मे समाहित रचना सामयिक, संवेदनशील, मर्मस्पर्शी, प्रभावशाली आ सकारात्मक अछि. किछु खांटी मैथिली शब्दक प्रयोग पाठक मन मे सहजे मिथिला कें समुपस्थित क' दैत अछि. ग्राम्य-परिवेशक खींचल प्राकृतिक दृश्य मनोहारी अछि. कविता मे भाव-गाम्भीर्यक परिदर्शन होयत अछि. अपन अपार शब्द-सम्पदा, वाक्य-विन्यास, बिम्ब-विधान, भावाभिव्यक्तिक क्षमताक, सरस, सरल, प्रांजल भाषाक अभिनव प्रयोगक ब'ले चंदनक नाम मैथिली साहित्य मे स्वर्णाक्षर मे अंकित-प्रत्यंकित अबस्सेटा होयत, ई हमर पूर्ण विश्वास अछि.

पोथी : धरतीसं अकास धरि (कविता)
रचनाकार : चन्दन कुमार झा  
प्रकाशक : नवारम्भ  (2013)
मोल : 100 टाका मात्र 

समीक्षा: भास्करानंद झा भास्कर

Advertisement

Advertisement