पथिक मन’क सुखद अनुभूति अछि 'सुरुजक छाहरि मे'


आजुक समय मे जहन अधिकांश मैथिल, मैथिलत्वक अवधारणा सं च्यूत भए तथाकथित क्षद्म आधुनिकताक आ 'ग्लोबल विलेज'क नाम पर अपन भाषा आ संस्कृति सं कटि रहल अछि, ओहि ठाम किछु एहनो प्रवासी मैथिली साहित्यानुरागी आ मैथिली प्रेमी छथि जेकि मैथिली साहित्य मे कोनो ने कोनो रूपे बहुमूल्य योगदान द’ रहल छथि. एहने प्रवासी मैथिल मे एकटा सुन्नर नाम अछि मनोज शांडिल्य. महानगरी जीनगी जिबैत अपन भाषा आ संस्कृति कें अक्षुण्ण रखबाक ध्येय कें सदिखन धेनिहार मनोज शांडिल्यक समकालीन मैथिली साहित्यक चमकैत क्षितिज पर उदय/पदार्पण स्वागत योग्य आ सराहनीय अछि. “सुरुजक छाहरि मे" नवॊदित कवि मनोज शाण्डिल्यक पहिल काव्य-संग्रह थिक जाहि मे कुल 75 गोट सुन्नर आ भावपूर्ण कविता नैसर्गिक आनन्दक अनुभूतिक संगहि दगधल जीनगीक तप्पत बाट पर चलैत पथिक कें सुखद 'छाहरि' प्रदान क' रहल अछि. कुल मिलाकए, कविता सभ मे मातृभाषा प्रेम, नारी जीवनक विवशता, जीवन संघर्ष, निम्न ओ मध्यमवर्गीय परिवारक दयनीयता, श्रमक महत्व, देश-दशाक वर्तमान स्थिति पर दृष्टिपात कएल गेल अछि. किछु किछु कविता मे प्रगतिशीलताक विशेष तत्वक परिपाक सं हुनकर रचना पर यात्रीजीक छाप देखबाक भेटैत अछि.

मनोज जीक कविता मे मिथिलाक माटि-पानि सं सुवासित परिवेशक नीक अभिव्यक्ति भेल अछि. एक दिस मातृभाषाक प्रति प्रेम, ग्राम्य जीवन, पर्व त्योहरक माध्यमे सामाजिक समानताक सुन्नर भावनाक चित्रण भेल अछि त' दोसर दिस साहित्यिक ओ राजनीति-व्यवस्था पर कड़गर कटाक्षक शब्दवाण! एहि कविता संग्रहक आमुख मे “जीबैत रहबाक अवलम्ब”मे मनोज जी लिखने छथि— 

कविता हमरा लेल अपन भावनाक अभिव्यक्तिक एक सशक्त आ सरस माध्यम अछि. परिस्थिति, परिवेश, अपन आसपासक क्रियाकलाप आ ताहि सं उत्पन्न मन:स्थितिक अनुसारे भावना बद्लैत अछि आ तें कविताक रंग-रूप सेहो.

प्रस्तुत काव्य-संग्रहक पहिल कविता थिक 'उलहन'. एहि कविताक मादे कवि मातृभाषाक प्रति प्रेम ओ सम्मानक भाव व्यक्त-अभिव्यक्त भेल अछि. एकटा मैथिलानीक मुहे ई कहब जे "नहि बाजै छै अप्पन भासा/जीह गेल छै पाकि गे" वस्तुत: मिथिला मैथिली सं कटल समस्त लोकनिक कें उलहन आ उपराग देल गेल अछि. मिथिलाक ललनाक ई संवेदनशील उदगार आ मैथिलीक प्रेमक एकटा नीक मिसाल देल अछि एहि पांति मे –

जे नहि पुजतै माय के अप्पन
हैत ने हमर सांय गे
मां मैथिलीक सुच्चा पूतक
संग बान्हि दे माय गे...

दोसर दिस एकटा आओर मैथिली-परक कविता”‘मा मैथिली“मे मिथिला-मैथिलीक नाम पर शोषण क’ रहल लोक आ संस्था पर, साहित्यिक विद्रुपता आ साहित्य मे भाइ भतीजवाद पर चोट करैत कहैत छैथ—

क्यो गाछहि पर बैसल
चैन सं
चूसि रहल ओकर प्राण
क्यो लाज त्यागि
बेचि रहल गाछक
फ़ड़-फ़ूल
डारि-पात
क्यो सॊहि रहल छाल
क्यो अSढ मे
बना रहल
गाछहि कें
अपन अस्तित्वक ढाल…

मनोजजीक कविता मे युगीन परिवेशक मध्य राजीनीति, सामाजिक ओ साहित्यिक मूल्यक निरंतर अवमूल्यन पर करगर चोट कएल गेल अछि. जीवनक प्रत्येक क्षेत्र मे पारम्परिक रूप मे स्थापित जीवन मूल्यक ह्रास होयत देख़ि कवि हॄदय मे विक्षोभ अछि. साहित्य मे राजनीति सं उत्पन्न हुनक एहि विक्षोभ कें “गिद्ध” कविता मे देखल जा सकैत अछि—

माछी भनभनाइत
रचनात्मकताक लहास पर
गाछ पर लुधकल
निसान सधने गिद्धक हेंज…

मनोजजी समकालीन राजीनीतिक वातावरण सं क्षुब्ध आ व्यथित छथि. आजुक शासन व्यवस्था देश मे व्याप्त भिन्न प्रकारक समस्याक कोनो ठोस निराकरण करबा मे असफ़ल साबित भेल अछि. राजनीति  करयबला लोक सब अपन अपन स्वार्थक पूर्ति मे लागल छथि तें मनोजजी किछु कविता मे राजनीति कें खसैत स्तर पर चोटगर व्यंग्य सेहो केने छथि. एहने तीक्ष्ण कटाक्ष ‘पासा” कविता मे दृष्टिगोचर भेल अछि—

अहिना होइ छै
होइत रहलैए
होइते रहतै
ओमहर सगरो
लोक कनिते रह्तै
भीख मंगिते रहतै
एमहर सगरो
खेल होइते रहतै..

आधुनिक समय बाजारीकरणक समय अछि. सब किछु ग्लोबल भ' गेल अछि. वाणिज्यिककरण एहि अंध दौड़ मे आदान-प्रदानक वस्तुक संग-संग देश-प्रेम सेहो बिका रहल अछि. स्वदेशी मानसिकताक खगता भ' रहल अछि. विदेशी लोकक प्रभाव, विदेशी वस्तुक डेग डेग पर उपलब्धता भारतीयताक भावना कें मारि रहल अछि. ‘युग” देशक वर्तमान स्थिति पर दृष्टिपात करैत लिखैत छथि—

बुझबाक करु प्रयास
उन्नैस सय सैंतालिसक युगसं
एके सैंतालिसक युग धरि
बदलि गेल छैक
बहुत किछु
बिलटि गेल छैक 
बहुत किछु..

एहने स्थिति कें अवलोकन करैत मनोजजी अपन कविता मे बाजारवाद आ बढैत अमरीकी वा आन देशक प्रभाव कें निष्प्रभ करबाक चेष्टा कयलनि अछि. सैटायर प्रयोग करबाक हुनकर ‘करेक्टिव एप्रोच’ बुझना जा सकैत अछि. उदाहरणक लेल “पाहुन’ कविताक निम्न पांति देखल जा सकैत अछि—

आइ फ़ेर अएलाह अछि
मुकुटधारी व्यापारी पाहुन
वाशिंगटनक मालगाड़ी चलबैत
करबाक लेल
बजारक निरीक्षण
आ सुनबाक लेल
अपन गुप्त जयगान
लाल किलाक जयघोष मे.. 

संगहि, स्वतंत्र देश मे परतंत्रक बाजारबाद पर प्रत्यक्ष कटाक्ष कएल गेल अछि—

सुतल स्वतंत्रता मे मरैत सन जीबैत
भौंचक्क भS देखैत
बजारक आधुनिक खेल… 

कोनो देश, समाज ओ राष्ट्रक निर्माणमे कवि आ हुनक कृति केर महत्वपूर्ण योगदान होयत अछि. अपन लेखनीक माध्यमे समाज ओ व्यक्ति कें सजग ओ जागरुक बनेबाक हुनक सचेष्ट प्रयासक प्रतिफ़ले देश ओ समाजक सांस्कृतिक संस्कारक इतिहास बांचल रहैत अछि. मुदा वर्तमान परिदृश्य मे कवि ओ रचनाकरक स्थिति अति दयनीय अछि. मनोजजीक कवि-हृदय कवि-कर्मक महत्ता बुझैत हुनक दयनीयताक मार्मिक चित्रण केने छथि “सर्जक” कविताक निम्न पांति मे—

कवि जी!
किए रचै छी?
कलमक धोधि मे
मोसि भरै छी
आ एमहर
अपनहि
उदर टटैल.. 

कविक चिन्ताजनक स्थितिक बादो मनोजजी रचनाकरक हिम्मति बढा रहल छथि. ओ “सॄजन“ कविताक माध्यमे कवि कें सांत्वना आ उत्साहवर्द्धन करैत कहि उठैत छथि— “धरु धैर्य/करु विश्वास/ई मानसिक दर्द/किन्नहु नहि अछि व्यर्थ वेदना/दियौ ध्यान/ई थिक अहांक सुच्चा सृजन क्रीड़ा/ कवित्वक प्रसव-पीड़ा.”

मनोजजीक कविता मे नारी जीवनक विवशताक स्वर मुखरित भेल अछि. हुनकर रचना मे नारीक प्रति हुनक सही दृष्टिकोण आ सहानुभूति सम्यक रूपेण व्यक्त-अभिव्यक्त भेल अछि. समाजक सब सं पैघ कुरिति मे सं एकटा ज्वलन्त समस्या थिक- भ्रूण हत्या. मिथिले नहि, सम्पूर्ण देश मे भूण हत्याक भयंकर रूप देखबाक भेटैत अछि. मनोजजीक कवि-दृष्टि एहि समस्याक मार्मिक चित्रांकन क’ एकर निदानक पथ प्रशस्त क’ रहला अछि अपन कविता “ मोचरल कोखिक उपजा” मादे—

मनुक्ख नहि ने छी
हम तं छी मात्र
विभत्स मांउसक लोथरा
अशुद्ध
असिद्ध
अनिष्ट
जन्म सं पहिनहि घोषित
अवांछित! 

ई बड़का विडम्बना छैक जे नारी सगरो समाज मे प्रताड़ित होयत आबि रहली अछि. पुरुष-प्रधान समाज मे नारी दयनीय स्थिति पुरुषक लेल अभिशाप थीक. कविक भावुक हृदय अबला नारीक व्यथा-कथासं द्रवित अछि. हुनक कविता मे नारी जीवनक विविध परिवेशज चित्रण भेल अछि. सामाजिक सुधारक अलख जगेबाक उद्देश्य सं मनोजजी अपन कविता “सींथि” मे विधवाक वेदना आ करूण क्रन्दनक मर्मस्पर्शी दृश्य समुपस्थित कएने छथि—

हमरहि सन सSख- मनोरथ
स्वप्न- कल्पना- कामना
प्राण मे तरंग
जीबैत रहबाक उमंग
सब किछु हमरहि सन
अन्तर बस एतबे-
ओकर विश्व झरकल छै
ओकर सींथि उजड़ल छै...

एहि कविताक आगुक पांति मे स्त्रीक स्वीकारोक्ति कोनो पाथर-सदृश्य हृदय कें व्यथित करबाक माद्दा रखने अछि- “कथीक दुख?/ भरि जीनगी/ प्रतिक्षण/ भोगितहुं नारी-पीड़ा / से एक्कहि बेर/ जे भेल से भेल/ नीके भेल/ अहाक संसार मे/ कुहरब सं पहिनहुं/ बना देल गेलहुं/ मोचरल कोखिक उपजा/ सहजहि मुक्त!”

मनोजजी अपन कविता सभ मे सामाजिक यथार्थक बात रखैत रखैत कखनो कखनो सूक्ष्म बात सेहो कहि देने छथि एहने एकटा कविता अछि “प्रतिबिम्ब’ जाहि मे ओ अपन व्यक्तिगत द्वन्दक समीचीन चित्रण कएने छथि. एहि चित्रण मे जीवनक दार्शनिकता अछि—

सुति-उठि कs
भोरे-भोर/भेंट होइत अछि
अएना मे
एक अपरिचित

मनोजजीक कविता मे श्रमक महत्वक प्रधानताक अभिव्यक्तिकरण समीचीन रूपे कएल गेल अछि. कृषक आ दीन-हीन, शोषित, अपेक्षित वर्गक प्रति हुनक सहानुभूति मानवतावादी दृष्टिकोण कें बता रहल अछि. ई मानवतावादी दृष्टिकोण हुनक अहम काव्य विशेषता थिक. जन-जीवनक चित्रण, लोकजीवनक अभिव्यक्ति समाजिक सुधारक लेल पर्याप्त थिक. बेर बेर “घाम”क महत्व आ विशेषता कें रेखांकित कएल गेल अछि. हरेक दू-तीन गोट कविताक बाद “घाम” शब्दक प्रयोग एहि बातक द्योतक अछि जे हुनक लेखनी मे प्रगतिशीलताक “ईंक’ अत्यधिक मात्रा मे अछि. “सुरुजक छाहरि मे"कविता मे मनोजजी किसानक जीवन-व्यथाक सजीव चित्रण केने छथि—

हमर जीवित रहबाक
सबसं पैघ अवलम्ब
उदराग्निक हविष्यान्न
देहक झहरैत घाम सं
सिक्त करइए माटि के
माटिक पूत...
ओ की डरत ताप सं
जे जीबइए
सीना ठोकि कs
सुरुजक छाहरि मे… (48)

मनोजजीक कविताक प्रमुख विशेषता थिक कविताक माध्यम सं देल गेल प्रेरणा, अभिप्रेरणा, उत्साह आदिक व्यक्त भाव. “उत्पात”- कविता मे मनोजजी जीवन संघर्ष सं लडबाक सीख द’ रहल छथि ओ बाझल अछि—

माटि-पानिक सेवार्थ
लागल अछि
इतिहासक उर्वर माटि खोदि
भविष्यक गाछ रोपय मे
किछु टांग-खिचनिहार छै
बानरक उत्पात छै
तैं की? (44)

शहरी जीवनक बढैत प्रकोप सं मानवतावादी सोचक ह्रास भ’ रहल अछि. हृदयक मधुरता तीक्त भ रहल अछि. लोकजीवन सं संवेदना पलायन क’ रहल अछि. एहि कटु अनुभूति कें मनोजजी अपन कविता “अलकतराः”, “संत्रास” आदिक माध्यमे व्यक्त केने छथि. ओ विषाद आ क्षोभ व्यक्ति करैत कहै छथि—
शून्य चेतना, शून्य वेदना 
संत्रासक आघात 
कहू ई केहन शहर छै!

हुनक कविता मे छोट-मोट परिवारिक प्रहसन आ दृटांष्टक माध्यमे पैघ पैघ बात कहि देल गेल अछि. “दुलार” कविता मे मनोजजी कम शब्द मे पौत्री आ पितामहीक आपसी मेल, मान मनौअल आ आपसी प्रेम आ सौहार्दक संबंध पर बड्ड संवेदशील चित्र अंकित कएने छथि—

छोटकी
बड्ड तंग करैछ
पितामही कें
एह!?
एक्कहु क्षण
चैन नहिं..
आ जखन कखनहुं
फ़राक होइछ दुनू
तखन
मोन लगैत छैक
ने एकरा
तंग करय मे
ने ओकरा/
तंग होमय मे! (51)

एहि प्रकारे हम देख सकैत छी जे मनोज जीक काव्य-संग्रह “सुरुजक छाहरि मे” प्रस्तुत समस्त कविता कवि हृदयक अनुभूतिक समीचीन अभिव्यक्ति अछि. भावक व्यापकता, अनुभूतिक तीव्रता, सामाजिक चेतनाक मुखरित स्वर हुनक रचनाक विशेषता मे प्रखरता आनि देने अछि. देश-दशा आ सामाजिक यथार्थक सजीव चित्रण पाठक कें कवित्त भावक दिस आकृष्ट करबा मे सफ़ल बुझना जा रहल अछि. तीक्ष्ण व्यंग्य आ कटाक्षक साधल प्रयोग सफ़ल लागि रहल अछि. “भावुक मोन/ कने डोलल/ आखर झहरल/” आ “गढगर भावक/ रस बरसल/ कविता जनमल” जेहन सुन्दर अभिव्यक्ति मनोज जीक कविताके लेल सटीक लागि रहल अछि. कविताक भाषा आ प्रस्तुत शैली सरल, सहल, प्रभावशाली आ विचारोत्तेजक अछि. कविता मे प्रयुक्त विभक्तिक प्रयोग मे ‘यूनिफ़ॉर्मिटी” रखबाक आवश्यकता छल. संगहि, किछु किछु “टाइपिंग मिस्टेक” भेल अछि. संक्षिप्तत: काव्य-संग्रह बड्ड रोचक, भावोत्तेजक, पठनीय  आ संग्रहनीय अछि.
                                                                    
पोथी : सुरुजक छाहरि मे (कविता) 
रचनाकार : मनोज शांडिल्य 
प्रकाशक : मैलोरंग प्रकाशन (2015)
मोल : 150 टाका मात्र 



समीक्षा: भास्करानंद झा भास्कर

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