मिथिला राज्यक मांग आ मैथिली भाषा

एम्हर किछु दिनसं सोशल साइट फेसबुक पर 'एमजे वारसी' केर ओ शोध आ रिपोर्ट पर खूब चर्चा भेल, जाहिमे मिथिलाक मुसलमान समुदाय द्वारा बाजल जाएबला भाखाकें मैथिलीक बोली नहि कहि उर्दूक बोली कहल गेल अछि. एही पर साहित्यकार उमा कांत झा 'बक्शी' केर टिप्पणी —

मिथिला राज्यक मांगमे भाषाक आधारपर फूट डालबाक घिनौना प्रयास शुरू भेल. कियो मानू बा नहि, जे एमजे वारसी द्वारा "प्रभात खबर" दरभंगामे देल गेल बयान, एकर स्पष्ट संकेत अछि. मैथिली भाषा पर जोर दैत, मिथिला राजक मांग, जतेक तेज होयत आ लोक भाषाक आधारपर एकजुट होयत, एहि आंदोलनकें कमजोर करबाक लेल एहन विवाद राजनैतिक हथियारक रूपमे उठाओल जायत. एतबे नहि यदि भाषा वैज्ञानिक मैथिली भाषाक स्वरूपकें  बचेबाक आंदोलन तेज करता तँ मिथिला राज विरोधी नेतागण, जतय मानक मैथिली भाषासँ लोकक  बोली अलग होयत, मिथिला राज आंदोलन मे फूट डालबाक, सीताक नाम पर जखन लोकक एकजुटता मिथिला राजक लेल बढ़त,  तखन एकर विरोधी, धार्मिक आधार पर फ़ूट डालबाक प्रयास करता.

जखन जनक, विद्यापति, मंडन, अयाची मिश्रक नाम पर मिथिला राजक लेल एकजुटता बढ़त, एकर विरोधी जातीय आधार पर फूट डालबाक घिनौना राजनीति करता. नेताक काज फूट डालू राज करू आइधरि सफल होइत रहल. कारण जनताक दुःख दर्द दूर करबाक संकल्प एहि तरहक सस्ता नारामे परिलक्षित नहि होइत छैक. एहि तरहक राजनीति करयबला कखनो जनताक हितैषी नहि भ' सकैत अछि.

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