मैथिली हमर पहिचान अछि : विभा रानी

साहित्य आ कला क्षेत्रमे सामान रूपेँ सक्रिय विभा रानीसं विगत कलकत्ता यात्राक दौरान पश्चिम बंगाल सरकारक कला-संस्कृति विभागान्तर्गत मिनर्वा थिएटरमे रूपेश त्योंथ संग भेल बातचीतक अंश—



मैथिली लेखन दिस कोना झुकाओ भेल छल?
शुरूमे मैथिलीक प्रति तेहन लगाओ नहि छल. हम मधुबनीक वैश्य परिवारसं छी आ हमरा परिवारमे मैथिलीक प्रति सचेतनता ओतेक नै छलैक. आइयो हमरा घरमे सभ किओ हिन्दी बजै छै. सासुर भोजपुरीभाषी छै. मुदा हम अपनाकें मैथिलीभाषी कहै छी आ छी. मिथिलाक मैथिल! हम जखन आरके कॉलेज मधुबनीमे स्नातकमे पढ़ैत छलहुं, त' ओतय मैथिली भाखा बेस बाजल जाइत छल. ओतहि हमरा मैथिलीक प्रति झुकाओ भेल आ फेर लेखन दिस प्रवृत भेलहुँ. हमर प्रथम कथा 'कौआ हंकनी' 'मिथिला मिहिर' केर नवतुरिया लेखनक अंतर्गत प्रकाशित भेल आ राताराती ओ कथा आ हम प्रसिद्ध भ' गेलहुँ. एखनो पूरना लोक सभ हमरा 'कौआ हंकनी'क लेखिकाक रूपमे बेसी चिन्हैत छथि. ओतहिसं हमर मैथिली लेखन शुरू भेल. दड़िभंगामे एमए करैत सेहो लेखन करैत रहलहुं. रेडियोमे कैजुअल अनाउंसर, ड्रामा आर्टिस्टक रूपमे काज कैल, ओकर अनेक कार्यक्रम सभमे भाग लेल आ अइ तरहें मैथिलीसं जुड़ल रहलहुं.

काज-राज, पारिवारिक दायित्व आदिक संग लेखन कोना उसरइए?
परिवार प्राथमिकता त' रहिते छै. 1981सं लेखन शुरू कएल. फेर 84-86 कलकत्तामे, फेर 1989 धरि दिल्ली आ एखन मुंबइमे छी. एक महिला लेल ई सभ करब ओतेक सहज नै छै. मुदा अहांकें अप्पन प्राथमिकता सेहो तय करय पडै छै. महिला भेने हम अप्पन होयबाक अर्थ त्यागि दी, ई हमरा स्वीकार्य नहि छल. लगभग बीस बरख हम सक्रिय थिएटर स' दूर रहलहुं. बाल-बच्चा सभ नमहर भ' गेल, फेर सक्रिय थिएटर आरंभ कएल. तखन कलकत्तोमे हम साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन सभमे रुचि लेइत छलहुं. दिल्लीयोमे तहिना थियेटर सभसं जुड़लहुं. अखबारी लेखन सेहो करैत छलहुं. तखन ई कहि सकैत छी जे 2007सं हम पुन: सक्रिय भेलहूं थिएटरमे. हमारा सोझामे अपन रचनाधर्मिताकें बचेबाक प्रश्न छल. एकरा लेल लेखन  सहज भेल, किएक त' लेखनमे अहाँ समयकें अपना हिसाबे मैनेज क' सकइ छी.  नाटक समूह कर्म छै. एकरा लेल निर्धारित समय देबय पडै छै.

अहाँ कइएक भाखामे लिखैत छी. कथा सहित कोन-कोन विधामे रचनाशील छी?
हम कवितो लिखने छी, मुदा हमर कथा बेस प्रशंसित भेल आ तहियाक वरिष्ठ लोकनि हमरा कथे लिखबाक परामर्श देलनि. अभिनयक संग नाटक लेखन सेहो करैत छी. रहल भाखाक बात, त' हम अपनाकें विधे जकां एक भाखासं नै बान्हिक' रखने छी. जतबे मैथिली, ततबे हिन्दीमे लिखै छी. स्थिति एहन छै जे हिन्दीवला हमरा हिन्दीक लेखिका मानै छथि, मैथिलीबला मैथिलीक. कहियो काल अंगरेजीमे सेहो लिखै छी. हमर एकल नाटक "लाइफ इज नॉट ए ड्रीम" पहिने अंग्रेजीएमे भेल. कएकटा हिन्दी रचनाकार कहलनि जे हिन्दी लेखिका भ' अंगरेजीमे किए लिखै अथवा नाटक करै छी? (हँसैत) हमर मानी त' भाखा मात्र  एक गोट साधन छै पाठक धरि पहुंचबाक. हम अनुवाद काजमे सेहो संलग्न छी. हमरा जखन जे उसरइए, जाहि भाखामे मोन होइये, लिखै छी.

नाटकसं कोना जुड़ाव भेल आ एहि क्षेत्रमे की सभ भ' रहल छै?
पर्फोमिंग आर्टसं बचपने स' जुडाव छल. दरभंगामे रेडियोमे नाटक कएल.  कलकत्तामे नाटक आदि देखैत छलहुं आ रुचि बढ़ल. कलकत्तामे शिवमूर्तिक नाटक 'कसाईबाड़ा' कैल. एतयसं जखन दिल्ली गेलहुं त' ओतहु नाटक आदि स' जुड़लहुँ. ओतय श्री आर एस विकल जीक 'अनुकृति नाट्य मंच'क राष्ट्रीय  नाट्य महोत्सवमे भाग लेलहुं. डॉ. शंकर घोष केर पोस्टर, मणि मधुकर केर दुलारीबाई, शिवमूर्तिक कसाइवाड़ामे अभिनय कएल जकर बेस प्रशंसा भेल. 2007मे थिएटरमे अपन वापसी कएल नरेंद्र मोहन केर 'मिस्टर जिन्ना' सं. अहिमे फातिमा जिन्ना जे हुनक बहिन छलथिन, केर भूमिका भेटल आ आइयो लोक किरदारकें मोन रखने छथि. आइ-काल्हि मुंबईमे छी आ हिन्दी-मैथिली थियेटरसं जुड़ल छी.

नाटकक मंचन बेस कठिनाह भ' गेल छै. दर्शकक अभाव त' रहिते छै, दोसर मंचनकेर खर्च बढि गेलैक अछि. संकट नै बुझाइए नाट्य विधापर?
संकट त' छै. मुदा समाधानो त' हमरे देब' पड़तै ने! नाट्यप्रेमी छी. हं, महग त'  छैक नाटक करब. हॉलसं ल' क' सभ इंतजाम आदिमे बेस खर्चा होइ छै आ ई सभ मैनेज करब कोनो नाट्य संस्था लेल चुनौती भ' जाइ छै. एकर समाधानमे हम कम पात्रक नाटक लिखल. हमरा लेल चुनौती छल जे 20 बरस बाद घुरि रहल छी थिएटरमे त' हमर प्रेरणा आ चुनौती की अछि? हमरा लागल, जे एखनो लोक सभक ध्यान एकल नाट्य पर कम रहैत अछि. एकल नाटक बहुत चुनौतीपूर्ण छै, मुदा एक गोट कलाकार लेल अत्यंत संतुष्टिदायक. तैं एकल नाटक हम चुनल. कहि सकै छी जे आयोजक लेल कनेक सहज भ' जाइ छै इंतजाम करब, कियैक त' ग्रुपक आकार कनेक छोट भ' जाइ छै. दोसर एकटा कलाकारक रूपमे एकल नाटकक कलाकारकें एक गोट अलग पहिचान बनै छै. सिखबाक दृष्टिसं सेहो एकल नाटक बेसी सार्थक होइ छै. हमरा प्रसन्नता अछि जे आब एकल नाटक ट्रेंडमे आबि रहल छै. नाटक कम खर्चमे करबाक उद्देश्यसं हम 'रूम थिएटर' शुरू केलहुं अछि आ एकर नीक प्रचार भेल अछि आ आब कएक ठाम रूम थिएटर भ' रहल अछि.



की छै रूम थिएटर? कनेक एहि पर इजोत दी?
'रूम थिएटर' भेल जे एकटा रूममे अपन कलाक अभिव्यक्ति. कलाकार अथवा रंगप्रेमी सभकें कम खर्चमे नीक नाटक अथवा रचनात्मक प्रस्तुति देखयबाक प्रयास. दर्शक हमरा लग नहि आबि सकै छथि त' हम हुनका लग पहुंची, जाहिसं लोक आ नाटकक मध्य दूरी घटय वा मिटय. ई कोनो फ़्लैटमे, स्कूल-कॉलेज रूममे, कोनो साधारण हॉलमे, माने कत्तहु भ' सकैए. कोनो व्यक्ति चाहथि त' कमसं कम खर्चमे नाटक देखि सकै छथि. नाट्यदलकें बजा सकै छथि. मुंबईमे जेना हम रूम थिएटर चलबैत छी त' ततेक लोक जुटै छथि जे जगह कम पडि जाइए. रूम थिएटरक आयोजन आब कएक ठाम देखा-देखी शुरू भ' गेल अछि.

मैथिली नाटक कोन-कोन लिखल अछि आ मंचित भेल अछि?
मैथिली नाटकक बात करी त' 'जखन-तखन' पत्रिका हमर 'बालचंदा' नाटक प्रकाशित केने अछि आ मैथिली भोजपुरी अकादमी नव दिल्ली हमर फोक एकल नाटक  'नौरंगी नटनी' खेलने अछि. 'भाग रौ' पहिने 'अंतिका'मे छपलाक बाद आब पुस्तक रूपमे प्रकाशित अछि. 'मदद करू संतोषी माता' केर मंचन चेतना समितिक विद्यापति पर्वमे भेल अछि.  मैथिलीमे नाटक लेखन, प्रकाशन आ मंचन लेल ओतेक अवसर नै भेटल अछि. आन विधामे लेखन आ प्रकाशन धरिक काज रहै छै मुदा नाटक लेल मंचन सेहो होएब जरूरी भ' जाइ छै. मैथिली नाटक क्षेत्रमे सेहो नव-नव प्रयोग केर बेगरता अछि. अपना स्तरे हम क' रहल छी, जेना लोक नाटकमे एकल कें प्रयोग-  'नौरंगी नटनी'क रूप मे. 

अहाँ अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचपर विविध अनुष्ठानमे जाइ छी आ मैथिलीक प्रतिनिधित्व करैत छी. मैथिलीक स्थिति केहन बुझना जाइए?
मैथिली हमर पहिचान अछि. हम सीताक भूमिक छी, एहि पर गर्व अछि. छोट कस्बाक ललना छी, ई हमरा लेल हमर व्यक्तित्वक विकासमे बड्ड सहायक भेल. मंच साहित्यिक हुअए अथवा रंगमंचक, राष्ट्रीय हुअए अथवा अंतर्राष्ट्रीय.  मैथिलीकें हम अपना संग लेने जाइ छी. हमरा आश्चर्य लगइए जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार एखनो ततेक नै भेलैक अछि. हमरा सभकें कनेक बेसी उदार होमय पड़त. मैथिलीक आयोजन सभमे बाहरसं लोक सभकें सेहो बजयबाक चाही, हुनक विचार सुनबाक चाही. अपना सभक आयोजनमे अपने चारि गोटे बैसैत छी आ अपने कार्यक्रम करैत छी. केओ नै जनैत अछि. हम जहन चेन्नै मे 'सगर राति दीप जरय' केर आयोजन केने छलहुं त' आन भाषा-भाषी विद्वान लोकनिकें सेहो बजओने छलहुं. विचारक आदान-प्रदान जरूरी छै. हमरा सभक आयोजनक जे एकटा स्वरुप बनि गेल अछि ताहिसं आगू बढबाक चाही. एकटा आओर बात छै जे मैथिली छोडि जखने हिन्दी वा अंगरेजी केओ बजैत अछि त' ओकर आलोचना होमय लगैत छै. हमरा सभकें बुझबाक चाही जे जेहन मंच छै तेहन बात करय पडैत छै. हम कोनो मराठी वा तमिल आयोजनमे जाएब आ मैथिली बाजब शुरू करबैक त' के' बूझत. ओतय हमरा हिंदी अथवा अंगरेजी केर सहारा लेबैये पडत. मुख्य कथा ई जे हम बात क' रहल छी- मैथिलीक, मिथिलाक. हमरा सभकें एहि सभ बिन्दुपर सोचबाक चाही. आब स्थिति बदलि रहल छै. मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल पटनामे होइ छै जानि हरखित छी.

'सगर राति दीप जरय' केर आयोजनक बाद की मैथिली लेल कोनो आयोजनक इच्छा?
हं, हम चाहै छी जे मुंबई मे मैथिलीमे कोनो साहित्यिक, थिएटर फेस्टिवलक आयोजन करी, जे इंटरनेशनल लेवल केर हो. लागल छी. देखी, कहिया धरि संभव भ' पबइए.

नव पीढ़ी लेल किछु कहबैक?
नव पीढी हमर जिनगीक सांस अछि, हमर विश्वास अछि. त' हुनका सं नीक केर अपेक्षा सेहो अछि. जन जागरणक खगता छै. लोककें भाखासं जोड़य पड़तैक, तखने किछु संभव छै. हमर सभक इतिहास गौरवपूर्ण अछि. नवतुरिया सभ मैथिलीकें आगू ल' जाएत से आशा अछि. साहित्यिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक सभ बिंदु पर सोचबाक चाही आ अपना लोक आ अपन माटि लेल जतेक संभव हो अवश्य करू.

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विभा रानीक रचना संसार :
मैथिली : खोहसं निकसैत (लघु कथा संग्रह), भाग रौ, बालचंदा, मदद करू संतोषी माता, नौरंगी नटनी (नाटक) आदि.
हिन्दी : बंद कमरे का कोरस, चल खुसरो घर पने, इसी देश के इसी शहर में, कर्फ्यू में दंगा (कथा संग्रह), आओ तनिक प्रेम करें, अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो, दूसरा आदमी-दूसरी औरत, पीर परायी, मैं कृष्णा कृष्ण की, एक नई मेनका, बिम्ब-प्रतिबिम्ब, भिखारिन, लाइफ इज नॉट ए ड्रीम,  (नाटक), मिथिला की लोक कथाएँ, गोनू झा के किस्से आदि.
मैथिलीसं हिन्दी अनुवाद : कन्यादान (हरिमोहन झा), राजा पोखरे में कितनी मछलियाँ (प्रभास कुमार चौधरी), बिल टेलर की डायरी, पटाक्षेप, जिजीविषा, बिशाखन, संबंध (लिली रे) आदि.
एकर अतिरिक्त अनेक रचना विविध मैथिली, हिन्दी, अंगरेजी पत्र-पत्रिका सभमे प्रकाशित आ संकलित.

यूट्यूब पर विभा रानी : 
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