जीवकांतक प्रति

राजमार्गपर चिड़ै
फेर घोदिया गेल अछि
मुदा, पहियातर पिचायल,
कोनो टुटल देहक लोभमे नहि
ओ ताकि रहल अछि
अहाँक बाट

गाछपर बैसल चिड़ै
भऽ गेल अछि शक्तिविहीन
ओकर पाँखि नहि फूजि रहलैए
ओकर कंठसँ नहि बहरा रहलैए
कोनो बोल, कोनो गीत
टकटकी लगौने अछि
धारक कछेरमे
ओ ताकि रहल अछि
अहाँक छाह


गाछक जे ठाढ़ि
जरि गेल अछियापर
ओकर ठुहरी जे
चढ़ि गेल पँचकठिया बनि
बुझलक अपन भाग्य
मुदा, ओकर पल्लव,
ओकर खुहरी, ओकर चेराक
देहक पानि
सुखा रहलैए ठोपे-ठोप
अहाँक विछोहमे

अहाँक परोछ होइतहि
अक्षरक अँकुसि
नमरि कऽ भऽ गेल अछि गोल
एकटा महाशून्य
ओ ताकि रहल अछि
अपन माट-साहेबकेँ
जिनकासँ सीखत
ओ लिखबाक अनुशासन

ठमकल कलम, गुम्म पोस्टकार्डकेँ
फुरा नहि रहलैए
की लिखत समाद,
ककरा कहत अपन मोनक
प्रमाद कि अवसाद

खटिया धेने मैथिली
भेल छथि असोथकित
हुनकर पुरना कुशासन
आब के बदलतनि,
के आब हुनकर लेसल दियारीक
ममरी हटौतनि,
के हुनका पहाड़सँ समुद्रधरिक
पर्यटन करौतनि
आब के हुनका एहि निर्जन गामसँ
जनारण्य'क सिंहासनधरि पहुँचौतनि
आब के हुनका
अपन आँखिसँ आकाश देखौतनि


धरती'क देलहा बाँगक सूतसँ
निर्मित तौनी ओढ़ि
समा गेलहुँ धरतीक कोरमे
आ देखू ने फेर कोनो परंपरावादी
चढ़ा गेल अछि अहाँक माथपर
तुलसीपत्र
किए चुप्प छी, किछु नहि कहबनि ?

हमरा एखनो विश्वास अछि
अहाँ एना चुप नहि रहब
बड़ी काल धरि
हम जनैत छी
अहाँ छी मग्न एखन
एहि चिक्कनि माटिमे
फेर कोनो 'बीज' रोपबामे
जकरा जगबय खातिर
उपस्थित हेताह सूर्य अपन तापक संग
मेघक खण्ड बजाओत हाजिरी
स्वयंसेवक बनि
बेर-बेगरता जुमैत रहत बसातो
धरती स्वयं पोसतीह ओहि बीजकेँ
आ लगले ओ बीज बनि जायत गाछ
भरि जायत फेर
गाछमे पात, पातमे बसात
बाजि उठत उत्सव
नाचि उठतीह पृथ्वी
गाबि उठत चिड़ै
भेटि जेतैक जखन ओकरा
अपन कंठक बोल
अपन कांतक बोल


— चंदन कुमार झा

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