निवेदन एकटा

हे सज्जन जन अनुरोध हमर
करबनि आग्रह सभ प्रियजनसँ
नेना-भुटका पर ध्यान रहय
सद्भाव रहय सदिखन सभसँ ।

सब मिलि सोचू सखा,सुता-सुत,
कोना सुसंस्कृत जन-जन बनता
के छथि मैथिल, की थिक मिथिला,
महिमा महान बुझता, गुनता ।।

बहय बयार जक्खन जहिना
तहिना अपनाकेँ ओ ढ़ालथि
नहि तऽ रहताह हाथ मलैत
पुनि कतबो खुरछारी काटथि ।।

पर उन्नतिसँ हो प्रसन्नता
हो उन्नति कोना अपन सोचथि
नै देखि जड़थि पर-सम्पतिकेँ
परनारि देखि नै माथ ठोकथि ।।

नहि थिक आदेश, उक्ति थिक ई
जँ सहज लागय तऽ अपनायब
नहि जाति-पाति केर भेद फँसब
सब मानव छी एतबे जानब ।।

— चन्द्रमोहन झा

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