हमर देश पर-गत्ती-सील !!

जेमहर देखू बीले-बील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

भ्रष्टाचार उजागर भेल त' पोखरिसँ बढि सागर भेल
आतंकक से पंक पड़ल सभ छै बलिक छागर भेल
फूसि बजै त' ठेहुन-छाबा जे सच बाजल बागर भेल
कतरि रहल छै सभके जेबी खांकी खादी आर वकील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

जनता आगाँ छुच्छ सोहारी नेताजीक छनि भरल बखारी
सरकारेक भाग जगै छै जँ बनल योजना कोनो सरकारी
पाँच बरख धरि कुर्सीक माया मतदानक बेर खोजपुछारी
निर्धन लाचारक के पूछत खटैत-खटैत छै ढोढी ढील।
हमर देश पर-गत्ती-सील !

धिया कंठ लागल की करतै टाका छापि कत'सँ अनतै
सभटा खेत जँ एखने गेलै बांकी धिया बेर की गनतै
नोरसँ भीजल माएक आँचर नुका-नुका कते ओ कनतै
धिया बापक डीह बिकेलै ब'रक बापक झोड़ा सील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

घूसे पर काटै घुसकुनिया करिया धन सभके चाही
दलमलित छै दल-दलित संरक्षण सभके चाही
प्रतिभाक प्रतिकार करए आरक्षण सभके चाही
व्यथा कथा के कहतै ककरा सगर व्यवस्था सोहरल पील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

— पंकज चौधरी 'नवलश्री'

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