एकटा मिथिला राज

सभ्यताक नामपर पशुता-बर्बरता
प्रेम-समन्वय हीन, स्पंदन-शून्य जड़ता
असह्य उत्पीड़न, नहि चाही ढ़ाढ़स-प्रलेप
बिहारी नहि, मैथिल थिक पहचान हमर ।

शेष बिहार आ मिथिला-
दूटा भिन्न संस्कृति प्रवाहमान परस्पर
नहि संभव हित संवर्धन,उत्थान परस्पर ।
दृष्टि भिन्न, दिशा भिन्न, जीवनशैली भिन्न
भिन्न भाषा, भिन्न भाव अछि,
भिन्न चाही अधिकारो ।

छह करोड़ गुजराती पूरा देशपर भारी ?
छह करोड़ मैथिल, किए छथि अपराधी ?
षडयंत्रकेँ हम दबा देब, चक्रब्यूह सब भेद देब
मैथिली भाषे टा नहि,
अछि अस्मिताक प्रतीक-चिन्ह
हमर वैभव, हमर पराक्रम
हमर जीवन तत्व अछि मैथिली ।

मिथिलाक एहि पुष्प मनोहरकेँ
सजा सकी, हमरा सुन्दर बाग चाही
शुद्ध बसात, शुद्ध सरिताक नीर चाही
हमरा चाही द्वेषरहित सूर्यक रौद
मैथिली अधिकार क्रांतिक आह्वान
हमरा फराक मिथिला राज चाही ।

जन-चेतनाक उत्कर्ष, मैथिलीक हुंकार प्रबल
हम लेब अपन अधिकार
मिथिला-मैथिलीक पहचान
आइ मांगि रहल छी, काल्हि छीन लेब
भारतक मानचित्रपर हम पारि देब-
एकटा मिथिला राज ।

— अजय कुमार झा 'तिरहुतिया'

Advertisement

Advertisement