बिसरब नहि मिथिला-मैथिली

मीता चल, चली मिथिला नगरी,
जत'क कविकोकिल छथि अभिमान 
घुमलहुँ अमेरिका आ' घुमलहुँ रसिया,
किंतु नहि घुमलहुँ ओ नगरी 
जतय केर छी हम संतान 
मीता, सिखलहुँ बड़ रसियन भाषा
पर नहि अबैछ निज मातृभाषा
कोइलीक बोली सन अछि मैथिली
बाजल जाइछ देश-विदेश 
काल्हि जखन जाइ छलौँ ऑफिस
तखन देखल अद्भुत चमत्कार
एकटा विदेशी बाजय मैथिली
आर करै छल मिथिलाक गुणगान
तखने ठनलहुँ हमहुँ मीता
घुमि आयब ओ धरती
जतय जनमली जानकी सन बेटी
आँखि नै जानि किए डबडबाएल
लागै जेना बरखोक बाद भेटल हो
ममताक साया
हे मातृभूमि
माफ कऽ दिअ'
एकबेर पुत्रकेँ क्षमादान दिअ'
'आशा' प्रतिज्ञा चाहैछ सभसँ
चाहे बसैछी देश-विदेश
बिसरब नहि मिथिला-मैथिली
निज मातृभूमि, निज मातृदेश 
 
— नवीन कुमार 'आशा'

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