नै जानि कहिया

कविता,
माने ई नहि जे,
ओ भरने होइक अपनामे,
कोनो दर्शनकेँ,
आ ने वएह जाहिमे
गंध हो कोनो अप्सराक
देह-वर्णनक,
ई त’ निश्छंद, निर्मल निर्झर,
चलैत अछि,
कोनो सधबाक अविचल अहिबात जकां,
अचल रहैत अछि,
कोनो गवार नेन्नाक,
निश्छल, निष्कपट बात जकाँ,
हरदम खिलखिलाइत
हँसैत रहैत छैक,
आ ताहि कविताकेँ
हम बुझ’ चाहैत छी,
बात जे मोन मे अछि,
तकरा एही माध्यम स’,
कागत पर धुन’ चाहैत छी,

प्रिये !
कहिया पूर होयत सेहन्ता,
कवि हेबाक,
आ अपन लेखनीक
जोड़ल आखरसँ
अहाँक मनोहारी छवि बनेबाक,
नै जानि कहिया .....

— गुंजन श्री

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