हऽवानगरी

ओहि दिन अचानके शीतलहरी बढि गेल छल. एना कऽ एहि भरि सीजन मे कहियो शीत नहि खसल छल. लोक सभ ओढना बिछओना तऽर मे रातिये पैसल से निकलबाक नामे नहि लैत छल. मुदा बूढ आ बच्चाक आँखि मे निन्न तऽ रहैत छैक नहि. से बच्चा सब सेहो एम्हर सँ ओम्हर दौड-धूप कइये रहल छल. हमरो किछु नहि फुडा रहल छल. से कने टहलि गेलहुँ खुरचन भाइक दलान दिस. हाथ-हाथ नहि सुझैत छल. जयबा काल भेल जेना कोनो साइकिल बला कोम्हर सँ ठोंकि देत तकर कोनो ठीक नहि से असथिरे-असथिरे चलैत छलहुँ. बेस चौकन्न भेल. जे देखतियैक सैह. कान तऽ तेना ने बन्हने छलहुँ जे हऽवा कनियो नहि पैसि सकैत छल.
आ जँ हऽवा नबि पैसत तऽ ध्वनि कान मे कोना पडत. हऽवे पर ने सभ किछु. हऽवा नहि तऽ ध्वनि सुनायत कोना. ओनाहू अपना मिथिला मे हऽवा पर बेसी काज होइत छैक. कतेकोक जिनगी बीति जाइत छैक हऽवे देबा मे मुदा तइयो हऽवा देबाक ओकर ड्यूटी समाप्त नहि होइत छैक आ मरय काल पछताइत प्राण छुटि जाइत छैक. फेर लिलसा लागल रहि जाइत छैक जे हऽवा देबाक अछि. आ फेर ई हऽवा नगरी मे जन्म लेबय चाहैत अछि. मिथिला महान अछि तकर नाना कारण अछि. आन आन कारण तऽ अछिये संगहि हऽवाक सेहो अपन दोसरे महत्व अछि. मिथिलाक नाम जँ आजुक युग मे हऽवानगरी धऽ देल जाय तऽ हमरा जनैत कोनो जुलुम नहि बीति जायत. हऽवा छोडि ओहि ठाम रहिये की गेल छैक. जनता हऽवा देबय मे माहिर, नेता हऽवा देबय मे माहिर. एहि मे एक ठाम पैघ युद्धक संभावना बनि जाइत छैक. जेना नेताक काज हऽवा देब छैक आ जनताक काज सुनब. मुदा मिथिला मे सुनय तऽ क्यो चाहबे नहि करैत अछि, सभ हऽवा देबय लगैत अछि. आ बनि जाइत अछि नेता. आ सब जँ नेते भऽ जायत तऽ ओहि क्षेत्रक की हाल होयतैक से अनुमान लगाओल जा सकैत छैक. देश मे पूरा जनसंख्याक नाममात्र भाग नेता अछि ताहि सँ पूरा देश तबाह भेल अछि आ जँ मिथिला मे सभ नेते अछि तऽ तबाह की सुड्डाहो होयबा मे विलंब नहि लागि सकैत अछि. विलंब लगितो अछि तऽ से मिथिलाक महानते ने अछि.
से हऽवा आ शीतलहरि सँ जान बचबैत हम पहुँचि गेल छलहुँ खुरचन भाइ ओतय. ओ सेहो मोटका चद्दरि ओढने, देह हाथ झपने बैसल छलाह दलान पर. हमरा देखि कने हर्षित सन बुझयलाह. हुनको हऽवा देबय मे बेस मजा अबैत छनि ने. से एकसर मे ककरा हऽवा देताह. हऽवो लेबऽ लेल क्यो चाही ने. से हम आबि गेल छलहुँ. हऽवा देबय मे खुरचन भाइ सँ माहिर शाइते क्यो दोसर होयत. असल मे एही माटिक हऽवा बसात मे ओ पैघ भेल छलाह. मुदा हऽवाक बल पर ओ नेता नहि बनि सकलाह तकर कचोट हुनका सदति रहैत छनि. जकरा लग हऽवाक मात्रा प्रचूर रहैत अछि, नेता बनबाक उमेद बेसी रहैत अछि मुदा भाइ केँ एहि दिस निराश होमय पडि गेलनि. हमरा देखिते भाइ उठि गेलाह आ अंगनाक मुँह पर चाहक लेल कहि अयलाह. हम हुनक दलान पर हाथ पएर समेटि बैस गेल छलहुँ. ओ तकर बाद चाहे नहि हऽवा सेहो पीयओलाह प्रचूर।
— नवकृष्ण ऐहिक

'मिथिला समाद' मे अगस्त २००८ सं दिसम्बर २००९ धरि दैनिक रूपें प्रकाशित धारावाहिक व्यंग्य 'खुरचन भाइक कछ्मच्छी' केर एक अंश.

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