बिनय भूषण केर किछु आओर दोहा - मिथिमीडिया
बिनय भूषण केर किछु आओर दोहा

बिनय भूषण केर किछु आओर दोहा

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कविता कें काया अछि काटल, तुकबंदी कें फेर।
कान-पाति कें देखे दुनिया, कूटनीति कें खेल ।1।

शब्द-शब्द आ शब्द एकटा, शब्दक प्राणक अंत ।
कूड़ा-कचरा सगरे पसरय, सत्-साहित्यक हालत मंद ।2।

भूषण ताकय शब्द आइ, शब्दक भेल अकाल।
मोन मारि कें सज्जन बैसल, दुर्जन बजबय गाल।3।

साहित्यक बाजार मे, पद-पैसा कें मोल ।
छुच्छे कविता भूषण कें, साबित भेल मखौल।4।

निर्लज्जक दुनिया अति दुर्गंधित, लाजक प्राणक अंत।

चोर मध्य नै जीबि सके अछि, ज्ञानी, साधू, संत।5।

चारू कात अछि हंता दुश्मन, बांचल नै कनियो आस ।
संदेहक अन्हार मे, भूषण भेल हतास।6।

जनकवि कें भेटि रहल अछि, भाँटक आइ सम्मान।
जन सं जतबे दूर रहब, ततबे भेटत मान।7।

भूषण कविता लिखि रहल अछि, षडयंत्रक पर्दाफाश।
सुच्चा शब्दक खातिर ओ, भ' रहल छथि कात।8।

चक्रव्यूह मे बाँचब मोश्किल, कुहरब जीवन सत्य।
स्वाभिमान धुह-धुह कें धधकै, मानू हुनकर कथ्य।9।

अपमानक जहर घोंटि-घोंटि ओ, रक्त कें कयलनि विषाक्त।

सत्-शब्दक खातिर हुनका सं, जरय शैव आ शाक्त।10। 

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