हाय रे ओकर भाग्य

जिनका कनहा पर हर-पालो रहैत छनि
हाथ मे खुरपी रहैत छनि
तन पर गुदरी रहैत छनि
तरहत्थी पर छाला रहैत छनि
ललाट पर भूख, पियास
ओ तनावक रेघा रहैत छनि
पयर मे फाटल बेमाय रहैत छनि
कांटक वेदना सं 'इस्स' कहि चुप रहय वला
ओहि अभागलक पेट आ पीठ एक रहैत छनि
ओ आओर कियो नहि किसान रहैत छथि
जिनका लेल लाल बहादुर शास्त्री बाजल छलाह
जय जवान ! जय किसान !!
आइ ओ नंदीग्राम, सिंगूर,
गरबेताक पहिचान बनल छथि
परिवर्तनक नारा देनिहार माटि-माय
आ मानवताक प्रतिक बनल अछि
बदलल परिस्थिति अछि
बदलल अछि परिवेश
मुदा! अपरिवर्तित अछि ओहि
क्खेतिहर जनक चोटकल गाल
थमकल अछि ओकर जीवनक विकासक रथ
नहि छनि हुनका लेल कृष्ण सन सारथी
जे देखओतनि हुनका नव बाट
खिचतनि हुनक जिनगीक रथ
आखिर हुनक एहन भाग्य किएक छनि
हुनक किलोल आखिर कियो
किएक नहि सुनैत छनि
भाग्यक खेल बुझि ओ स्तब्ध छथि
नित भोरे उठि भाग्यक भरोसे
ओ अइयो जीबैत छथि
आजादीक वर्षो बाद
ओ जतय छलथि ओतहि छथि
परिवर्तनक कंटकमय बाट पर
अइयो ओ चालित छथि
हाय रे ओकर भाग्य ! 

— विवेक कुमार झा
(कवि आइआइएम केर छात्र छथि)

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