एखन धरि भाँज पुराओल गेल: कुमार शैलेन्द्र

बहुआयामी प्रतिभा संपन्न आ' 'मिथिला आवाज'क समाचार संपादक कुमार शैलेन्द्र सँ चंदनकुमार झाक ऑनलाइन साक्षात्कारक प्रमुख अंश—



अहाँ साहित्यकार, पत्रकार हेबाक संगहि रंगकर्मीक रूपमे सेहो जानल जाइत छी. एतेक रास विधा मे एकसंग काज करबाक प्रेरणा आ उर्जा कतए सँ भेटल?
उर्जा हमरा मोन सँ भेटैत अछि. मेक्सिम गोरकीक जीवनी पढ़लाक बाद हमरा लागल जे हम केहनो परिवेश सँ अबैत होइ, अपन मेहनति सँ अपन बाट बना सकैत छी. उर्जा अपना केँ फिट रखला सँ भेटैत अछि आ' इच्छाशक्ति तैमे सहयोग करैत अछि.

सभसँ पहिने अहाँ कोन विधा सँ जुड़लहु आ किएक ?
हमर जन्म पटनामे भेल अछि. हमर पिता, स्व. शिवकान्त झा पत्रकार आ रंगकर्मी दुनू रहथि. हमर गाम भौर हनुमान नगर मे ७६ साल सँ अनवरत रंगमंच कायम अछि. तैँ नेनहि सँ पत्रकारिता आ' नाटक सँ जुड़ि गेलहुँ. नाटक तऽ प्रायः १५ बरख सँ करऽ लागल रही आ' मिथिला मिहिरमे किछु-किछु लिखि पठाबऽ लागल रही. सभकिछु अनायास भेल किछु सोचिकेँ नहि केलहुँ.

रंगमंच सँ कोना जुड़लहुँ ? अपन रंगमंच-यात्रा सँ संबंधित किछु जनतब दिअ '?
पटनामे हम सुप्रसिद्ध रंगकर्मी आ फिल्मकार प्यारेमोहन सहाय जीक मोहल्लामे रहैत छलहुँ. हुनक पुत्र सभ हमर मित्र छल. तैँ अनायासे हिन्दी रंगकर्म सँ जुड़ि गेल रही. ई १९७८के गप्प थिक. ता' हम मंचक पाछाँ रहैत रही. हमर पिता १९८४सँ पहिने पैँतीस बरखधरि आकाशवाणी पटनाकेँ मैथिली रेडियो नाटकमे मुख्य स्वर रहल रहथि, तै नाटक दिश रूझान छल. पटना मे चेतना समिति दिससँ सालमे एकबेर नाटकक आयोजन होइत छल, बस. ओहिठाम हमरा लोकनिक लेल कोनो स्थान नहि छल. १९८२मे कौशल कुमार दास कोलकाता सँ पटना अएलाह. २८ फरवरी १९८२ केँ पटनाक हॉर्डिंग पार्कमे हम, कौशल कुमार दास, सुबोध भाइजी, आ' अरुण कुमार झा मीलिकेँ एक संस्था "अरिपन" गठित केलहुँ. एहिठामसँ हमर आ' कौशल कुमार दासक पटनाकेँ मैथिली रंगमंच पर रंगयात्रा आरंभ भेल. अरिपनक पहिल प्रस्तुति छल “बेचारा भगवान” नाटक. मूल रूपेँ मराठीक एहि नाटकक हम हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद कएने रही. एकरा अहाँ हमर पहिल रंगलेखन मानि सकैत छी. ई अनुवाद हम “शैलेन्द्र पटनियाँ”क नामसँ केने रही. ताहि समयमे हम एही नामसँ लिखैत रही. १९८४ धरि हम "अरिपन"मे सक्रिय रही. एहि वर्ष कोलकाता सँ कुणाल पटना अएलाह. अपन पहिल संपादक विभूती आनंद जीक कहला पर हम नवमैथिली संस्थाक गठनक कोशिशमे जुटलहुँ. जाहि क्रम मे हम आ' विनोद कुमार झा मूख्य रूप सँ आयोजनक ओरियान केलहुँ आ' अगस्त १९८४ केँ कुणाल आ' विभूती आनंद द्वारा गठित संस्था "भंगिमा"मे शामिल भऽ गेलहुँ. ओहिदिन सँ २००२ ईस्वी धरि हमर रंगकर्म "भंगिमा" पटनाक संगमे चलैत रहल. जून २००३ मे हम दिल्ली आबि गेल रही आ' तकरबाद नओ सालक सक्रियता दिल्लीक अछि.



मैथिली रंगमंच के खास कऽ ग्रामीण क्षेत्र मे पुनर्जीवित करबाक हेतु की कएल जेबाक चाही ?
गाममे दिनक रंगमंच किंवा नुक्कड़ नाटकक प्रवल संभावना छैक. तीन फेजक लाइनक अभावक कारणेँ ओहिठाम सभटा प्रकाश योजना गड़बड़ा जाइत छैक. मिथिलाक ग्रामीण रंगमंच असलमे छुट्टीक रंगमंच छैक. आब गाम सभ युवा सभसँ वीरान अछि. तथापि जँ गाममे खेतीक समय छोड़िके दिनक रंगमंचक कल्पना कएल जाए तऽ रंगमंच जीबि उठत. संगहि गीत-संगीत शामिल करक चाही. शहरक रंगकर्मी लोकनिकेँ चाहियनि जे ओ अपन ग्रामीण भाइ लोकनिकेँ रंगकर्मक आधुनिक नुक्कड़ तकनीक सँ परिचित कराबथि. जाहि गामक लोक सक्षम होथि ओ शहरक रंग संस्था सभकेँ गाममे मंचन आयोजित करथि. एहिसँ ग्रामीण युवाकेँ प्रेरणा भेटत. सभसँ जरूरी बात जे लोककेँ बुझेबाक अछि जे रंगमंच आब रोजी-रोटी देबाक जरिया बनि सकैत अछि. एकबात और जे मैथिल उपयोगी कूली वा सिपाही नहि बनि सकैए मुदा ओ कलाकार बेजोर होइए. कलाकेँ सम्मान देनाइ आ' कलाकार बनब लोककेँ सिखबऽ पड़त. तखने ग्रामीण रंगमंच सुधरत.

कहल जाइत छैक जे रंगमंच सभके दर्शक नहि भेटैत छैक । एहिमे कतेक सत्यता छैक आ' दर्शकक संख्या मे कोना वृद्धि हेतैक ?
मैथिली रंगमंचके सामने दर्शकक समस्या नहि छैक. पटना हो कि दिल्ली सभ संस्थाक मंचनमे सयसँ बेसी लोक निच्चामे बैसल देखाएत. जे समय सँ नहि अबैत छथि तिनका घूरय पडैत  छनि . हम स्वयं कएक खेप दिल्लीमे हॉलक बाहरे छुटि जाइत छी. प्रस्तुति जँ नीक होयत तऽ आब तऽ टिकट पर सेहो शो हाउसफूल जाइत छैक. 

सौभाग्य मिथिला सँ अपने सेहो जुड़ल छलहुँ ? मैथिली मे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किएक नहि स्थापित आ' सफल भऽ रहल अछि ?
सौभाग्य मिथिला हमर कन्सेप्ट पर आरंभ भेल छल. हम ओकर पहिल आ' एकमात्र मैथिलीभाषी प्रोड्यूसर रही. शुरू भेलाक बाद आन लोक सभकेँ राजेन्द्र धमिजाजी अनलनि. धमिजा जी हिन्दीमे सौभाग्य डिवोशनल चैनल चलबैत रहथि. ओ दू साल बाद ओकरा बंद करऽ चाहैत रहथि. चैनलकेँ बचेबाक लेल ओकरा मैथिलीमे कऽ देल गेल. असलमे ओ चैनल जोगार कऽ मैथिली बनाओल गेल रहइ. धमिजाजी लग पर्याप्त बजट नहि छलनि. टाकाक अभावमे ओ चैनल प्रतिभाशाली लोक सभकेँ नहि राखि सकल ने जोड़ि सकल. जे काज भेलै से ततबा विपन्नतामे भेलैक जे कोनो इंप्रेशन नहि बना सकल. सौभाग्य मिथिला मजबूरीक चैनल छल. ओकरा आधार कोनो सफलता वा असफलताक आकलन नहि कएल जेबाक चाही. ओकर जे हालति हेबाक छेलै से भेलै. आजुक समयमे बिनु टाकाक किछु नहि भऽ सकैत अछि. दोसर बात जे चैनल केहन लोक चला रहल अछि ताहू पर ओकर छवि बनैत छैक. अहीँ कहू एखनजे लोकसभ ओहि चैनल सँ जूड़ल छथि ताहिमे के एहन अछि जकर मिथिला-मैथिली किंवा देशक आन कोनो क्षेत्रमे एहन कोनो योगदान हो जाहि कारणे ओ जानल जाइत हो. एहनामे केहन कार्यक्रम बनत ? सुनबामे आयल जे ओ चैनल आब न्यूज चैनल अछि, तखन ओहिठाम कोन एहन पत्रकार अछि जकरा अहाँ जनैत होइ से कहू ? जा क्षेत्र विशेषक विशेषज्ञ लोक नहि जूड़त ओकरा मौलिक प्रोग्राम बनेबाक छूट नहि देल जेतैक, ता कोनो चैनल सफल कि प्रभावी नहि भऽ सकत.



मैथिली मे आन-आन भाषाक नाटकक अनुवाद आ' मंचन तऽ भऽ रहल छैक मुदा मैथिली नाटकके आन भाषामे किएक नहि अनुवाद होइत छैक ? की एकर स्तर तेहन नहि होइत छैक ?
बात मात्र स्तरक नहि छैक. बात हीन मानसिकताक छैक जे मैथिलीभाषी युवक कोनो आन भाषामे रंगकर्म करैत अछि से अपन भाषाकेँ हीन बुझैत अछि. एखनधरि दर्जनसँ बेशी मैथिल रंगकर्मी एन.एस.डी. सँ डिग्रि लऽ चुकल छथि मुदा, ओ मैथिलीमे रंगकर्म नहि करैत छथि तैँ आनोठाम हुनका मोजर नहि भेटैत छनि. आन मातृभाषा संगे एहन बात नहि छैक. आनठाम रंगकर्म केनिहार लोककेँ अपन रंगकर्मकेँ बारेमे पता सेहो नहि छैक. दोसर जे मैथिलीमे एहन अभिनेता आ' रंगकर्मी सभकेँ बुझाइत छैक जे आन भाषामे रंगकर्म केनिहार मैथिल लोक सभ नीक हालति मे अछि. ओकरा सभकेँ तकर खौंझ सेहो छैक. तैँ ओ सभ मैथिली भाषाकेँ नाटकक अनुवाद नहि करैत अछि. पछिला नओ बरखक भारत रंग महोत्सब देखलाक बाद तऽ हमरा इएह लगैत अछि जे मैथिली रंगमंच बहुत पाछाँ नहि अछि. किछु रंग संस्था तऽ विश्व स्तरक अछि. जँ सत्य पूछी तऽ मैथिलीमे रंगकर्म कम भऽ रहल अछि. दोसर बातजे मैथिली एहन संस्कृति क्षेत्रक भाषा अछि जकर मंचन सभक लेल संभव नहि. तैँ आन भाषा-भाषीक एहिदिस धेयान नहि जाइत छैक. आ' मैथिल रंगकर्मीकेँ तऽ बारीक पटुआ तीत लगैत छैक. हम स्वयं मलंगिया जीक ओकरा आंगनक बारहमासाक हिन्दी अनुवाद कएने छी आ' तकर मंचन जनसंस्कृति मंच पर पाँच दिनधरि पटनाक कालीदास रंगालयमे भेल रहय.

पत्रकारिता सँ कहिया जुड़लहुँ आ' एहि सँ जुड़बाक कोनो खास प्रयोजन बुझायल ?
१९८७मे हम आर्यावर्त पटनामे प्रशिक्षु भऽ गेल रही. पिता पत्रकार रहथि तै इएहटा बाट देखाएल रहय तैँ । १९८८मे हम मैथिलीक भाखा प्रकाशन सँ जुड़ि गेल रही. ओना मैथिली पत्रकारिता सँ हमर पहिल जुड़ाव माटि-पानि संग रहय. ओकर संपादकीय विभागमे हम नओ अंकमे काज केने रही । मैथिली मासिक भाखा बंद भेलाक बाद ओ पाक्षिक भाखा टाइम्स भऽ गेल रहय जकर हम मुद्रक, प्रकाशक आ' संपादक रही. बादमे हम पाटलीपूत्र टाइम्स, पटनामे सब-एडिटर भऽ गेलहुँ. ओतऽ सँ राष्ट्रीय नवीन मेल डालटनगंज चलि गेलहुँ जतय सालभरि संपादकीय प्रभारमे रही. फेर पटनाक हिन्दी मासिक वानगीमे आपस आबि गेलहुँ. वानगी सँ फेर हिन्दी साप्ताहिक न्यूजब्रेकमे आबि गेलहुँ, जतऽ मूख्य उप-संपादक रही. ओतहिसँ प्रभात खबर, पटना चलि गेलहुँ. २००३मे हम दिल्लीक प्रथम प्रवक्ता आबि गेलहुँ, विशेष संवादाताक रूपमे. ओहिठाम हमर संपादक रामबहादुर जी रहथि. २००९मे मैथिली चैनलक प्रभारी बनिकऽ सौभाग्य टी.भी. चलि गेल रही. फेर न्यूज देलहीक मेट्रो लाइव हिन्दी साप्ताहिकमे न्यूज कॉर्डिनेटर भेलहुँ. आ' आब १ जुलाई २०१२ सँ मिथिला आवाजमे समाचार संपादककेँ रूपमे कार्यरत छी.

करीब १०० बरखक इतिहास रहितो मैथिली पत्रकारिता जगजियार नहि भऽ सकल. अहाँक नजरिमे एकर की कारण छैक ?
एखनधरि मैथिलीमे पत्रकारिताक भाँज पुराओल गेल अछि. तैँ सभठाम असफलता भेटल. "मिथिला आवाज''क माध्यमे पहिल खेप युवाशक्तिक आरंभ भेल अछि. एकरा सफल हेबाक आशा करू. एहिसँ पहिने जे पत्रकारिता भेल से अपन नाम कमेबा लेल. से उद्देश्य जखन पूरा भऽ जाइत छलैक तऽ प्रकाशन ठप भऽ जाइत छलैक. लागत सेहो तेहन नहि रहैत छलैक जाहिसँ सफलताक बाट खुजैत. तै सभतरि सभकेँ असफलता भेटलैक. मुदा मैथिलीकेँ एहने प्रयास सब जीयाकेँ रखलकै तैँ ओकरा खारिज नहि कएल जा सकैत अछि. जैँ मैथिलीमे काल्हि पत्रकारिताक दीप टिमटिमाइत रहलैक तैँ अहाँ आइ चारि बजे भोरबा धरि हमरासँ गप्प कऽ रहल छी ।

अहाँक पत्रकारिताकेँ असफल हेबाक हमरा कोनो कारण नहि देखाइत अछि. आब समय बदलि गेल छैक. मुदा एहिक्रममे कोलकाता सँ मिथिला समाद लगातार चारि बरख सँ प्रकाशित भऽ रहल छैक मुदा मिथिला सँ एतेक दिनमे कोनो समाचार पत्र नहि बहरेलैक तकर की कारण बुझैत छी ?
मिथिला सँ बहुत दिनधरि स्वदेश, मिथिला मिहिर आ' समाद दैनिक निकलैत रहल अछि आ' एकर लोकप्रियता सेहो खुब छलैक. मिथिला-मिहिर बंद भेलाक बाद एकटा गैप छलैक जकरा मिथिला समाद भरलक. ई सराहनीय काज अछि मुदा, सौभाग्य मिथिले जकाँ एत्तहु वित्तक अभाव अछि.

कहल जाइत छैक जे मैथिलीमे पाठकक अभाव छैक. अहाँ एहिसँ कतेक सहमत छी आ' पाठकक संख्या बढ़ैक ताहि लेल की कएल जेबाक चाही ?
मैथिली पढ़बाकेँ लोकके आदति नहि छैक तैँ पाठकक अभाव भऽ रहल छैक. ओना टेलीविजन आबि गेलाक बाद सभ भाषामे पाठक कमलैक अछि. मुदा, आब पोथी दिश लोक घुरि सेहो रहल छैक. मैथिलीमे लोकप्रिय साहित्यक अभाव सेहो रहलैक अछि. मिथिला क्षेत्रक अदहा आबादी एखनो अनपढ़ अछि ताहि हिसाबेँ देखि तऽ अपना भाषाक पाठक कम नहि अछि. साक्षर लोकमे महिला कम पढ़ल छथि तैँ पाठक आर कम भऽ जाइये. जेना-जेना साक्षरता बढ़त तेना-तेना पाठक बढ़ल चलि जाएत. पाठक बढ़ल नहि तऽ "विदेह" आ आन-आन आब ई-पत्रिका सभ किएक आबि रहल अछि ? हमरा मैथिलीमे पाठकक संख्या निराश नहि करैत अछि. आइयो प्रो.हरिमोहन झाक पाठक नहि घटल अछि.

अहाँ वर्तमानमे "मिथिला आवाज"क समाचार संपादक बनाओल गेलहुँ. कोनो खास योजना मोनमे अछि?
योजना अछि, ताहि पर काज कऽ रहल छी । दरभंगामे टीमके प्रशिक्षण चलि रहल अछि. ओहिठाम न्यूज रैप पर काज होयत. छओ पेज रंगीन अछि. नीक अनुवादक चुनौती अछि. संगहि इलाकामे मैथिली लिखऽ बला पत्रकार तैयार करबाक अछि.  ई सभ काज हमर टीम १ जुलाई सँ करबामे जुटल अछि. मिथिला आवाजक संग आर बहुत रास महत्वाकांक्षी योजना सभ अछि जे समय एला पर अपने सभक सोझाँ आओत.


मिथिला आवाज मैथिली पत्रकारिताक उत्थान करत. एहिबात सँ अपने कतय धरि आश्वस्त छी ?
हमरा भरोस अछि तैँ नओ सालक दिल्लीमे अपन जमाओल रोजगार आ' रंगकर्मकेँ छोड़िकऽ ओहिठाम गेल छी. हमर जे-जे डिमांड छल से सभ अजित आजाद जी पूरा कऽ देलनि. आब मैथिलीकेँ एकटा सनगर अखबार देबाक चुनौती हमरा सोझाँ अछि. आ' हमरा भरोस अछि जे हम सफल होयब. ई एकटा एहन आरंभ होयत जतऽ से बहुत रास नव बाट खूजत आ' मैथिलीक इतिहासमे चंद्रमोहन झा आ अजित आजादक नाम सुरक्षित भऽ जाएत.

एकटा साहित्यकार के रूप मे अपन-यात्राक संबंध मे जनतब दिअ'?
हम कविता सँ शुरूआत केलहुँ. मिथिला मिहिर साप्ताहिक आ' दैनिकमे कविता, गजल, लघुकथा आ' बहुत रास व्यंग्य रचना प्रकाशित अछि. कोशी-कुसुम, स्वाती, मैथिली अकादमी पत्रिका, भाखा, मिथिलांगन, परिछन आदि पत्रिकामे सेहो रचना सभ प्रकाशित अछि. आरंभ आ' अंतिकामे सेहो कविता सभ छपल अछि. पहिल सहयोगी काव्य संकलन अंतर्व्यथा १९९०मे आएल छल. ओहीसाल हिन्दीमे “पर्यावरण शिशु गीत” आएल. २०००मे चेतना समीति, पटना सँ "अग्नि पथक सामा" आएल. एकर अतिरिक्त भंगिमाक कोनो अंकमे हमर नाटक मुद्रा यज्ञ छपल रहय. हेमनिमे दिल्ली सँ प्रकाशित "परिछन"मे हमर नाटक "नैका-वनजारा" सेहो छपल अछि. हमर मंचित आ' अप्रकाशित नाटक सभ अछि -१. मोर मन मोर नै पतियाए २. मुद्रा यज्ञ ३. लोरिकायन ४. देसिल बयना ५. उगना हॉल्ट ६.नैका वनजारा ७. मलाहक टोल. एकर अतिरिक्त आकाशवाणी पटनासँ हमर दर्जन भरि रूपक प्रसारित अछि. दस बरखसँ बेसी ओहिठाम मैथिली समाचार वाचन कएने छी. मैथिली नाटकमे बी. हाइग्रेड कलाकार रहल छी. १५०सँ बेसी नाटकमे अपन स्वर देने छी जाहिमे सिंहासन बतीसीक ३४ प्रकरणमे राजा भोजक लेल स्वर देने छी. एकर अतिरिक्त सौभाग्य टी.भी.क लेल "दीयर-भौज"क १५५ एपीसोड लिखने आ' निर्देशित कएने छी.

अहाँ अभिनय, मंच संचालन आ' अनुवादक क्षेत्रमे सेहो काज केलहुँ. एहि विषयमे किछु जनतब दी ? ई सभ मात्र एकटा संयोग छल वा कोनो खास कारण आ'कि मजबूरी रहल जे कतहु एकडारि पकड़ि नहि रहि सकलहुं ?
ई सभ मैथिलीक जरुरति छलैक तैँ हमर वरिष्ठ लोकनिकेँ जतऽ हमर जरूरति होइत छलनि  हमर उपयोग करैत छलाह. रंगमंचक विभिन्न इलाकाक काज करय पड़ल कारण ओतऽ विशेषज्ञ लोकक अभाव छलैक.  तै मेकअप, लाइट,सेट, संगीत संग अनुवाद सेहो किएक तऽ मैथिली भाषाक लिखय बला लोक कम छल.

अंतमे युवावर्गके किछु कहए चाहबनि?
बस अपन मोनमे ठानि लिअ' जे करऽ चाहब से अहाँ कऽ लेब. कखनो भगवान भरोसे नहि रहू. अहाँक मदतिकेँ लेल कियो नहि आओत. अपन मदति अहाँकेँ अपनहि करऽ पड़त. तै केहनो खराब परिस्थिति हो अहाँ हिम्मति नहि हारू. एकदिन सभकेँ स्वीकार करऽ पड़तैक जे अहाँ बड्ड काजक लोक छी आ' कोनो लक्ष्य पाबि सकैत छी.

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