बिनय भूषण केर किछु दोहा



कबिरा साखी, साखी छल, साखी जीवन सत्य ।
परिवर्तित जे नब्ज समय कें, यएह काव्य के लक्ष्य। 1।

साखी में जौं आगि नहि हो, शब्दक ई षड्यंत्र।
साखी सभटा रूढ़ी कें तोड़य, भूषण मुक्ति मंत्र। 2।

आजुक साखी साखी अछि, बेइमानक पर्दाफास।
इमानक रक्षा हित  समर्पित, भूषण सत्यक हास। 3।

सत्य सत्य आ सत्य एकटा, सत्यक हालत पस्त।
मुस्कानक संग झूठ जिबइए, झूठक हालत मस्त। 4 ।

वैश्वीकरणक चकाचौंध मे, साहित्यक हालत पस्त।
सज्जन सभ अन्हरायल छथि, दुर्जन सभ छथि मस्त। 5।

पद-पैसा-सौन्दर्यक फंदा . धरबय नर्कक बाट।
भोगवाद आ स्वार्थक चक्कर, कुसंस्कार केर  हाट। 6।

रंगदारक चलती सभ सं बेसी, परसय कारी रंग।
डेग-डेग पर पटकय लाठी, सज्जन सभ छथि तंग। 7।

राजनीति केर रंगमंच पर, दलबदली अछि सस्त।
पद-पैसा आ पदवी खातिर, सिद्धान्तक हालत खस्त। 8।

चमचम चमकय उज्जर कुरता, चमचा कें चम्मच पास।
चौक-चौबटिया बारूद बमकय, शांति केर नहि आस। 9।

साहित्यकारक कलम छिनायल, बलगर केर गोटी लाल।
फुसियाहा साहित्य पर काबिज, सुच्चा केर कटलैक भाल । 10।

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