बड्ड गर्मी छै नइ पीब चाह !

हे यै ! कतय गेलहुं ? कने घरसँ बहराउ ने
हे यै कोमहर छी ? कने भनसाघर दिस आउ ने

ओ नाक-कान धुइनते, पैर पटकिते घरसँ बहरेली
हे ! की भेल यौ ? अहाँ एना किए चिचियाइ छी ?
दोष त' सभ छल हुनके मुदा हमहीं कयलहुं निहोरा
हम एतेक प्रेमसँ सोर केलहुँ, अहाँ किए खिसियाइ छी !

एक भोर जे बाध गेलहुँ कहि पटबय लेल गहूम
मुनहरि सांझ भेल तक्खन जा क' अंगना पैर देलहुं
बहिकिरनी बनि घरक सभटा काज करय छी हम
अहाँ बनि क' मुखिया चौक-चौबटिया भाषण दै छलहुं

चलू बेस, दोष हमरे सभटा, बाजू की कान पकड़ि ली ?
कन-कन्नीसँ देह ठिठुड़ि गेल चिपरी जोड़ि जराउ ने,
ऐ पछवा पर ई विषविस्सी गजबे हाल कएने अछि
हे ! सांझ सेहो पड़ि गेलै एक कप चाह पीयाउ ने

ई गप्प सुनिते देरी त' आर तिलमिला गेलीह ओ
एना गुड़रिक' तकलीह, हमर करेजा हिला गेलीह ओ
चारि दिनसँ भूकि रहल छी चिन्नी साफ़ ख़तम छै
बड्ड-सँ-बड्ड अदहा कप बनत चाहोपत्ती कम छै

बेस चलू की हेतैक आइ बिनु चीन्निये चाह बनाउ
आ चाहोपत्ति कम अछि तैं बस कनिये चाह बनाउ
एतबा कहि चाहक ओरियान आगू बढ़ा देलहुं हम
अपनेसँ चूल्हा पजारि क' सस्पेन चढ़ा देलहुं हम

ओ पित्ते आन्हर भेल छली लत्ते मे आगि धरा देली
माहुर मोने की चाह बनत दूधक लोटे ओंघरा देली
तैयो अप्पन दोषे नहि, ओ मूँह फुला क' बजली
जाउ आब सस्पेन उतारि क' घर क' धेने आउ
जओं ललका चाहक छौंक एखनो शेष होअए त'
जा' क' जल्दी बारीसँ अहाँ नेबो लेने आउ ।

बारी गेलहुं नेबो अनलहु काँटों हाथ मे गड़ि गेल
चाहक सनकी हम्मर तखने ठामहि घुसरि गेल
नेबो देखिते फेर चिकरली ऐं यौ, कोन मनुख छी ?
एत्ते कतउ होअए बहु कें पेरब अहाँ केहन पुरुख छी ?

गोंहछल मोने चाह बनेली आ तै पर एत्तेक दाबी 
अप्पन हारल बहुक मारल ककरा व्यथा सुनाबी 
दोसर दिन फेर वैह बेर मे चाह पीबाक उद्वेग उठल
बारीसँ झट अंगना अयलहुं भनसा घर दिस डेग उठल

आ कि तखने मोन छिनगि गेल ! नमहर डेग ठमकि गेल
कल्हुका दुर्गति मोन पड़ल, सभ चस्की कण्ठ अटकि गेल 
आदंक सँ हमर करेजा ई चौंकलहि सन रहि गेलै
आ चाहक छौंक ओ ओहिना छौंकलहि बस रहि गेलै

माघ-मास मसुआएल देह ताकै सीरक आ' कि घूड़क धाह
नै जानि किए तैयो ई फूरायल, आइ बड्ड गर्मी, नै पीब चाह !
आइ बड्ड गर्मी छै नइ पीब चाह !

— पंकज चौधरी 'नवलश्री'

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