गन्हाइत मंच

उज्जर रंग के
शांति,सद्भाव,सदाचार
आ' सत्यक प्रतीक मानैत छैक
सामान्य जनता,
आ' तइँ राजनेता सभ
आ' गोबरछत्ता जकाँ जनमल
समाजसेवी संस्थासभ सेहो
सदिखन ओछबैत छैक
उजरके चद्दरि,
पहिरैत छैक उजरके पाग,
उजर धोती उजरे कुर्ता
उजरा दोपटा पहिराय
एक-दोसराके
फेर सभमिलि
उजारैत छैक समाज के
चढ़बैत छैक उजरा कफन ।

तहू सँ जखन
मोन नहि मानैत छैक तऽ
लेसैत छैक दीप
माने समाज मे
बैमनस्यताक लुत्ती
आ' चाहैछ जे
ओकरे डहकल करेज सन
समाजो किएक नहि
धुआँइछ..धधाइछ...।

कहियो नागा नहि जाइछ
जे ई सभ कोनो मनीषी केँ
श्राद्ध नहि करैत हो
हुनकर सभक प्रतिमा बना
आ ओहिपर
किछु मौलायल फूल चढ़ा,
आ' फेर मंचक पाछाँ मे
रान्हि अरगासन
अपन पेट नहि भरैत हो,
प्रेत सदृश नहि हँसैत हो ।

अपना भरि तऽ
खूब प्रयास करैत अछि
ई सभ
अपन दुषित विचार सँ
गन्हाइत मंच के
सुरभित करबाक लेल
आ तइँ सभतरि देखबै
जे एकात मे जड़ैत रहै छै
धूपकाठी, सड़र......
मुदा,
ओहो सुगन्धित पदार्थ
श्मासनक अछिया के
कोना यज्ञाग्नि सन
सुंगन्धित करतै
आ से मंच गन्हाइते रहैछ ।

— चंदन कुमार झा

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